अंधेरे आकाश के नीचे
तारों के साथ
लंबी बात करना
तुम्हे अच्छा लगता है अभी भी
यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है।
जब दुनिया में घिसावट
का दौर चल रहा हो
तब तुम्हारी संवेदना बनी रहे अक्षत
इसे मैं सौभाग्य ही कहॅूगा।
पर विश्वास रखो तुम
तुम्हारा कहा ही नहीं
अनकहा भी समझ लेता हॅू मैं।
वेदना स्वत: एक संवाद है।
तुम शांति से निकल कर शोर में
गुम हो जाती हो
मैने शेार में ही अपनी शांति पा ली है।
एक दिन जब हम शांत हो जाएंगे
नहीं होंगे शिकवे-शिकायत
पर शोर मचेगा चारेां ओर
शायद
और हम रहेंगे नि:शब्द
चिर मौन।
26 फ़रवरी, 2008
25 फ़रवरी, 2008
मेरी कविता हो तुम
अश्रु पूरित ऑखों से
हमेशा क्या सोचती रहती हो तुम
लगता है
जैसे कोई समुद्र मंथन हो रहा हो
तुम्हारे भीतर
सब कुछ कहकर भी
जैसे कुछ न कह पाने की विवशता
क्यो झलकती है
बार-बार तुम्हारे भीतर
तुम भरोसा करो
मैं बिना बोले ही तुम्हारे
जान जाता हॅू
बात की गहराई तुम्हारी ।
आसॅू अच्छे होते हैं
आत्मा को पवित्र बनाने के लिए।
इसलिए रोना आए तो रोओ
और पवित्र होओ तुम
बिना किसी संकोच के।
हमेशा क्या सोचती रहती हो तुम
लगता है
जैसे कोई समुद्र मंथन हो रहा हो
तुम्हारे भीतर
सब कुछ कहकर भी
जैसे कुछ न कह पाने की विवशता
क्यो झलकती है
बार-बार तुम्हारे भीतर
तुम भरोसा करो
मैं बिना बोले ही तुम्हारे
जान जाता हॅू
बात की गहराई तुम्हारी ।
आसॅू अच्छे होते हैं
आत्मा को पवित्र बनाने के लिए।
इसलिए रोना आए तो रोओ
और पवित्र होओ तुम
बिना किसी संकोच के।
24 फ़रवरी, 2008
माणिक मुल्ला की दावत
आजकल माणिक मुल्ला पीठासीन हैं।वे तक्षशिला के देव हो गए हैं। इन्द्रसभा की कुर्सी के इर्द-गिर्द अप्सराऍ नृत्य कर रही हैं। अन्य देवतागण मुग्ध हैं। वे विरही देवता हैं। दावतें हो रहीं हैं। देवता दावत उड़ा रहे हैं। देवकुमार इस आयोजन से प्रसन्न हैं। यह घोर आश्चर्य का विषय है कि इस गरीब देश में दावत और नृत्य के सिलसिले बढ़ते जा रहे हैं। माणिक मुल्ला थे तो जनवादी आदमी लेकिन अब देवता हो गए हैं। उनकी प्रेम कथा नए रूप में प्रकट हो रही है।सत्ता की महत्ता वे पहचान चुके हैं। उन्हें पता नहीं कि जनता कितनी परेशान हैं। वे अपने रिएलटी शो के इंतजामात में व्यस्त हैं। लोकतंत्र का तकाजा है कि शो ज्यादा दिन तक नहीं चलते।
यह कथा एक पहेली है। बूझने वाले को इनाम मिलेगा। खास तौर पर अप्सराओं का नाम बताने वाले को।
यह कथा एक पहेली है। बूझने वाले को इनाम मिलेगा। खास तौर पर अप्सराओं का नाम बताने वाले को।
23 फ़रवरी, 2008
कॉरपोर्रेट जगत और हिंदी
भाषा और साहित्य का गतिशास्त्र उस भाषा-भाषी समूह के आर्थिक कार्य व्यापार पर भी निर्भर करता है. अर्थतंत्र और व्यावसायिक प्रतिष्ठान साहित्य और भाषाओं के संचरण के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराते हैं. व्यावसायिक प्रसार के साथ साहित्य और भाषा के प्रवास भी सुनिश्चित होते हैं. प्रवास की इस प्रक्रिया में भाषा में नए आयाम जुडते जाते हैं और परिणामत: उसकी संप्रेषण क्षमता में इजाफा भी होता है. आधुनिक कार्पोरेट जगत ने हिन्दी भाषा के नव्यतर आयाम और रूप प्रकट किए हैं. यही कार्पोरेट संसार भाषा को तकनीक के साथ भी संपृक्त करने में अग्रणी रहता है, जिससे भाषा अपनी प्रासंगिकता बचाए-बनाए रखती है.
लेकिन कार्पोरेट जगत की मूल चिंता और सरोकार मुनाफा और आमदनी ही होते है. इनके अभाव में उनकी सरंचना नष्ट हो जाएगी. ऐसे में भाषा और साहित्य का अपने हित में इस्तेमाल कर ले जाना भी कारर्पोरेट संस्थानों के लिए सहज स्वाभाविक ही रहा है. तो भी इस प्रक्रिया से अभिव्यक्ति की नयी शैलियों का निर्माण होता है. विज्ञापनों की भाषा इस संदर्भ में द्ष्टव्य है. आम आदमी तक अपनी बात पहुंचाने की सघन चुनौती इस भाषा निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा करती है.
तकनीकी अनुकूलन, साहित्य के नए मानदंड, भाषा की विविध वर्णी शैलियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस युग में भाषा साहित्य को जीवनदान देने का कार्य कारर्पोरेट जगत करता है, लेकिन इसके पीछे जो समूची ताकत और उर्जा स्रोत छिपा है वह उस भाषायी समूह का आम आदमी ही है. हिन्दी और कारर्पोरेट जगत का संबंध आधुनिक युग के साथ आरंभ हुआ और पत्रकारिता के क्षेत्र में कारर्पोरेट समुदाय ने निर्णायक भूमिका निभायी. जनसंचार माध्यमों के नेटवर्क को बनाने में और हिन्दी को नए सरोकारों की भाषा बनाने में निश्चय ही कारगर भूमिका रही है. आदर्श स्थिति तब होती जब भैंस और बगुले जैसे संबंध बन पाते. जिसमें बगुला अपना आहार भी ग्रहण करता और भैंस कीटमुक्त होकर स्वस्थ होती. यह कितना संभव हो पाया है इसी बहस को इस सत्र में जानने समझने का यत्न होगा.
लेकिन कार्पोरेट जगत की मूल चिंता और सरोकार मुनाफा और आमदनी ही होते है. इनके अभाव में उनकी सरंचना नष्ट हो जाएगी. ऐसे में भाषा और साहित्य का अपने हित में इस्तेमाल कर ले जाना भी कारर्पोरेट संस्थानों के लिए सहज स्वाभाविक ही रहा है. तो भी इस प्रक्रिया से अभिव्यक्ति की नयी शैलियों का निर्माण होता है. विज्ञापनों की भाषा इस संदर्भ में द्ष्टव्य है. आम आदमी तक अपनी बात पहुंचाने की सघन चुनौती इस भाषा निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा करती है.
तकनीकी अनुकूलन, साहित्य के नए मानदंड, भाषा की विविध वर्णी शैलियों के अतिरिक्त भूमंडलीकरण के इस युग में भाषा साहित्य को जीवनदान देने का कार्य कारर्पोरेट जगत करता है, लेकिन इसके पीछे जो समूची ताकत और उर्जा स्रोत छिपा है वह उस भाषायी समूह का आम आदमी ही है. हिन्दी और कारर्पोरेट जगत का संबंध आधुनिक युग के साथ आरंभ हुआ और पत्रकारिता के क्षेत्र में कारर्पोरेट समुदाय ने निर्णायक भूमिका निभायी. जनसंचार माध्यमों के नेटवर्क को बनाने में और हिन्दी को नए सरोकारों की भाषा बनाने में निश्चय ही कारगर भूमिका रही है. आदर्श स्थिति तब होती जब भैंस और बगुले जैसे संबंध बन पाते. जिसमें बगुला अपना आहार भी ग्रहण करता और भैंस कीटमुक्त होकर स्वस्थ होती. यह कितना संभव हो पाया है इसी बहस को इस सत्र में जानने समझने का यत्न होगा.
21 फ़रवरी, 2008
डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी की क्लास

साभार-जागरण जोश 23/10/2007
नॉलेज व लैंग्वेज पर हो कमांड तो जर्नलिज्म की राह होगी आसान
अधिकतर स्टूडेंट्स के सामने यह समस्या आती है कि वे किन बातों पर गौर करें, जिससे अपने विषय/कोर्स पर उनकी अच्छी पकड़ बन सके और वे नॉलेज हासिल करने के साथ-साथ परीक्षा में टॉप भी कर सकें। अपनी इस उलझन को सुलझाने के लिए इस बार अटेंड कीजिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बी. आर. अंबेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठयक्रम के समन्वयक डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी की क्लास.
हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार मीडिया जगत के विस्तार की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कोर्स है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के चार कॉलेजों-अदिति, बी. आर. अंबेडकर, श्री गुरुनानक देव खालसा और रामलाल आनंद कॉलेज में यह कोर्स ग्रेजुएट (ऑनर्स) स्तर पर पढाया जाता है। इस कोर्स में बेहतर प्रदर्शन के लिए इन बातों का ध्यान रखें :
मास कम्युनिकेशन के लिए आपका इंट्रा-पर्सनल और इंटर-पर्सनल कम्युनिकेशन ठीक हो। सामयिक मुद्दों पर सोच-विचार करें तथा साथियों से चर्चा-बहस भी करें।
क्लास नियमित अटेंड करें और प्राध्यापकों के लगातार संपर्क में रहें।
व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए मीडिया संस्थानों का भ्रमण करें और फील्ड में काम करने वाले लोगों के संपर्क में रहें।
क्वार्क, यूनिकोड, पिनाकल, वीसीडी कटर और साउंड रिकॉर्डिग से संबंधित सॉफ्टवेयर्स की जानकारी हासिल करें।
सेमिनार, फिल्म फेस्टिवल, डिबेट, प्रदर्शनियों के लिए समय निकालें।
हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में लिखने-पढने और बोलने की क्षमता का विकास करें।
सिलेबस से हों रू-ब-रू
इस कोर्स के फर्स्ट इयर के सिलेबस में तीन प्रश्नपत्र शामिल हैं। पहला-हिंदी भाषा, दूसरा-भारत : सामान्य परिचय और तीसरा-संचार सिद्धांत और ऐतिहासिक विकास। पहला पेपर हिंदी भाषा के इतिहास से संबंधित है। हिंदी भाषा एवं शब्द के उद्भव एवं विकास के साथ ही इसके भौगोलिक विस्तार के संबंध में भी आपको पढना होगा। इस पेपर में दूसरा टॉपिक हिंदी की बोलियों और शैलियों से संबंधित है। खडी बोली, अवधी, ब्रज, भोजपुरी बोलियों के साथ हिंदी भाषा में फारसी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी के मिश्रण का भी अध्ययन करना होगा। हिंदी भाषा के मानकीकरण की संकल्पना और मानक हिंदी के स्वरूप को समझना अनिवार्य है। आधुनिकीकरण हिंदी भाषा और समाज की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। हालांकि, आधुनिकीकरण में समस्याएं भी बहुत हैं, इन्हें भी जानें। हिंदी आज अनेक प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाई जा रही है, जिनमें शिक्षा, सूचना और विज्ञापन प्रमुख हैं। हिंदी में अभिव्यक्तियां और शब्द रोज जुड रहे हैं, इन्हें जानें-समझें। ध्वनि और लिपि के कोड (स्वर और अक्षर) में आए परिवर्तनों को भी आपको जानना होगा। पहले प्रश्नपत्र का अंतिम टॉपिक अखबारी हिंदी पर केंद्रित है, जो भविष्य में आपके प्रोफेशन से ही पूरी तरह जुडा हुआ है। अखबारी हिंदी के लिए आपको विभिन्न अखबारों में प्रयुक्त की जा रही हिंदी भाषा की शैली को जानना-समझना होगा। ये पांचों टॉपिक 20-20 अंकों में विभाजित हैं और सामान्यत: इनमें से प्रत्येक पर एक प्रश्न अवश्य पूछा जाता है।
दूसरा प्रश्नपत्र भारत के सामान्य भूगोल, इतिहास (आधुनिक काल), संविधान, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संस्कृति (धर्म, दर्शन, वर्ण-व्यवस्था), भारतीय भाषाओं तथा वैज्ञानिक, कलात्मक एवं खेलकूद संबंधी विषयों पर केंद्रित है। इसमें भी कुल पांच टॉपिक हैं, जिनको 20-20 अंकों में बांटा गया है। इस पेपर का उद्देश्य आपकी सामान्य जानकारी को बढाना है। भारत की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों का लेखा-जोखा, जलवायु बहुलता एवं उपयोगिता तथा प्रमुख व्यापारिक केंद्रों को जानना न केवल इस पेपर के लिए जरूरी है, बल्कि आगे भी यह आपके काम आएगा। संविधान की विशेषताओं, मौलिक अधिकारों, कर्तव्यों के साथ-साथ नीति-निर्देशक तत्वों की जानकारी भी आपको हासिल करनी होगी। आधुनिक भारत के इतिहास को देखें, तो औरंगजेब के पतन के बाद नई स्थितियों के उदय, 1857 का स्वाधीनता संग्राम, भारत में मुद्रण और अखबारों का विकास, खडी बोली का आविर्भाव, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं विभिन्न समाज सुधार आंदोलनों की अनुगूंज का अध्ययन जरूरी है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के नायकों-महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि के योगदान को भी पढें। विभाजन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, भारत छोडो आंदोलन आदि को जानकर ही आप आधुनिक भारत के प्रति अपनी समझ को और बेहतर कर सकते हैं। नब्बे के दशक के बाद भारत के बदलते परिदृश्यभूमंडलीकरण, उदारीकरण और उपभोक्तावादी स्थितियों को समझे बिना आप आज के समय से रू-ब-रू नहीं हो सकते। इसी प्रकार संविधान, अर्थव्यवस्था और संस्कृति से संबंधित विभिन्न आयामों का अध्ययन भी करना चाहिए। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्रमुख भारतीय भाषाओं की जानकारी भी प्राप्त करें। तीसरा पेपर संचार की थ्योरी से जुडा है। इसके तहत कम्युनिकेशन, इसकी परिभाषा, विशेषताओं, प्रकार और विकास को समझें। पत्रकारिता और समाचार पत्रों की स्थिति और उसकी विभिन्न समस्याओं-आर्थिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक पक्षों का ज्ञान हासिल करें। हिन्दी सहित प्रमुख भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों का ढांचागत अध्ययन भी करें। इस पेपर का अंतिम टॉपिक आधुनिक संचार प्रणाली पर केंद्रित है। पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा और इंटरनेट जैसे जनसंचार माध्यमों का विकास, प्रसार, प्रभाव और इनके नियंत्रण के प्रयत्नों को जानना-समझना इस पेपर के लिए अपेक्षित है। प्रमुख संचार संगठनों यानी मीडिया समूहों की कार्यविधि और प्रभाव के बारे में जानना बेहद जरूरी है। फीडबैक की अवधारणा और तौर-तरीके व लाभ-हानि को भी जानें। जनमत संग्रह-फीडबैक के संबंधों की भी तलाश करें।
नोट्स भी बनाएं
प्राध्यापकों के लेक्चर्स को ध्यान से सुनें और उसके मूल बिंदुओं को नोट करें।
पढाए गए टॉपिक्स को दो-तीन किताबों से कंसल्ट करें और फिर नोट्स बनाएं।
तथ्यों और आंकडों को नोट करते समय विशेष सावधानी बरतें और समय-समय पर उनको अपडेट करते रहें। इनकी क्रॉस चेकिंग भी जरूरी है।
टॉपिक से संबंधित ताजा जानकारी मिले, तो उसे नोट्स में तत्काल जोडें।
जरूरी नहीं कि हर नोट्स विस्तृत रूप में बनाया जाए। महत्व को ध्यान में रखते हुए डिटेल्ड और शॉर्ट नोट्स बना सकते हैं।
नोट्स को हमेशा अपने प्राध्यापकों से चेक करवाते रहें।
अखबार
दैनिक जागरण,
जनसत्ता, द हिन्दू
मैगजींस/जर्नल
विदुर, संचार, माध्यम, मीडिया विमर्श, फ्रंट लाइन, रंग-प्रसंग, हंस, इंडिया टुडे, दीवान-ए- सराय, मीडिया नगर लाइब्रेरी हैं खास
कुछ अच्छी लाइब्रेरियों में विजिट करना भी आपके लिए लाभदायक साबित हो सकता है। इनके नाम हैं : सेंट्रल लाइब्रेरी, डीयू
रतन टाटा लाइब्रेरी,डीयू
मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर की लाइब्रेरी, जामिया मिलिया इस्लामिया,
ब्रिटिश काउंसिल, कनॉट प्लेस
साहित्य अकादमी लाइब्रेरी, मंडी हाउस
सफलता का मूल मंत्र
क्लास नोट्स को घर पर रेगुलर देखें। अगली क्लास में पढाए जाने वाले टॉपिक को पहले से पढ कर जाएं।
टीवी, रेडियो के कार्यक्रमों को देखें-सुनें और इनका मूल्यांकन करें। फिल्म समीक्षा भी करें।
इंटरनेट पर सामग्री की तलाश करें, लेकिन संयम भी बरतें, वरना फालतू की साइट्स सर्च करने में आपका बेशकीमती समय नष्ट हो जाएगा।
अच्छे लोगों से संपर्क बनाएं। उनके साथ उठने-बैठने से आपकी प्रतिभा विकसित होगी। नए अवसर बनेंगे और आपका आत्मविश्वास भी बढेगा।
अंग्रेजी भाषा में भी लिखने और बोलने का अभ्यास करें।
प्रमुख अनुशंसित पुस्तकें बुक्स लेखक
हिंदी भाषा का इतिहास धीरेंद्र वर्मा
भाषा और समाज राम विलास शर्मा
सूचना, संप्रेषण एवं समाज बी.एस.निगम
पत्रकार और पत्रकारिता प्रशिक्षण अरविंद मोहन
नए संचार माध्यम और हिंदी अचला शर्मा, सुधीश पचौरी
भारत की समाचार पत्र क्रांति रॉबिन जेफ्री प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास जयशंकर मिश्र
वैष्णव धर्म का उद्भव एवं विकास सुवीरा जायसवाल
भारतीय संस्कृति गोविंद चंद्र पांडेय
ग्रोथ ऐंड डेवॅलपमेंट ऑफ कम्युनिकेशन इन इंडिया जे.वी.विलानियम
मेकिंग न्यूज उदय सहाय द्वारा संपादित
कम्युनिकेशन रेमंड विलियम
कुछ अच्छी वेबसाइट्स
www.jagran.com
http://www.webdunia.com/
http://www.bbchindi.co/m
www.ddindia.com
http://www.indiantelevision.com/
www.hindimediaglobe.wordpress.com
http://www.hi.wikipedia.com/
प्रस्तुति
मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव
नॉलेज व लैंग्वेज पर हो कमांड तो जर्नलिज्म की राह होगी आसान
अधिकतर स्टूडेंट्स के सामने यह समस्या आती है कि वे किन बातों पर गौर करें, जिससे अपने विषय/कोर्स पर उनकी अच्छी पकड़ बन सके और वे नॉलेज हासिल करने के साथ-साथ परीक्षा में टॉप भी कर सकें। अपनी इस उलझन को सुलझाने के लिए इस बार अटेंड कीजिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बी. आर. अंबेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठयक्रम के समन्वयक डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी की क्लास.
हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार मीडिया जगत के विस्तार की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कोर्स है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के चार कॉलेजों-अदिति, बी. आर. अंबेडकर, श्री गुरुनानक देव खालसा और रामलाल आनंद कॉलेज में यह कोर्स ग्रेजुएट (ऑनर्स) स्तर पर पढाया जाता है। इस कोर्स में बेहतर प्रदर्शन के लिए इन बातों का ध्यान रखें :
मास कम्युनिकेशन के लिए आपका इंट्रा-पर्सनल और इंटर-पर्सनल कम्युनिकेशन ठीक हो। सामयिक मुद्दों पर सोच-विचार करें तथा साथियों से चर्चा-बहस भी करें।
क्लास नियमित अटेंड करें और प्राध्यापकों के लगातार संपर्क में रहें।
व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए मीडिया संस्थानों का भ्रमण करें और फील्ड में काम करने वाले लोगों के संपर्क में रहें।
क्वार्क, यूनिकोड, पिनाकल, वीसीडी कटर और साउंड रिकॉर्डिग से संबंधित सॉफ्टवेयर्स की जानकारी हासिल करें।
सेमिनार, फिल्म फेस्टिवल, डिबेट, प्रदर्शनियों के लिए समय निकालें।
हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी में लिखने-पढने और बोलने की क्षमता का विकास करें।
सिलेबस से हों रू-ब-रू
इस कोर्स के फर्स्ट इयर के सिलेबस में तीन प्रश्नपत्र शामिल हैं। पहला-हिंदी भाषा, दूसरा-भारत : सामान्य परिचय और तीसरा-संचार सिद्धांत और ऐतिहासिक विकास। पहला पेपर हिंदी भाषा के इतिहास से संबंधित है। हिंदी भाषा एवं शब्द के उद्भव एवं विकास के साथ ही इसके भौगोलिक विस्तार के संबंध में भी आपको पढना होगा। इस पेपर में दूसरा टॉपिक हिंदी की बोलियों और शैलियों से संबंधित है। खडी बोली, अवधी, ब्रज, भोजपुरी बोलियों के साथ हिंदी भाषा में फारसी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी के मिश्रण का भी अध्ययन करना होगा। हिंदी भाषा के मानकीकरण की संकल्पना और मानक हिंदी के स्वरूप को समझना अनिवार्य है। आधुनिकीकरण हिंदी भाषा और समाज की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। हालांकि, आधुनिकीकरण में समस्याएं भी बहुत हैं, इन्हें भी जानें। हिंदी आज अनेक प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाई जा रही है, जिनमें शिक्षा, सूचना और विज्ञापन प्रमुख हैं। हिंदी में अभिव्यक्तियां और शब्द रोज जुड रहे हैं, इन्हें जानें-समझें। ध्वनि और लिपि के कोड (स्वर और अक्षर) में आए परिवर्तनों को भी आपको जानना होगा। पहले प्रश्नपत्र का अंतिम टॉपिक अखबारी हिंदी पर केंद्रित है, जो भविष्य में आपके प्रोफेशन से ही पूरी तरह जुडा हुआ है। अखबारी हिंदी के लिए आपको विभिन्न अखबारों में प्रयुक्त की जा रही हिंदी भाषा की शैली को जानना-समझना होगा। ये पांचों टॉपिक 20-20 अंकों में विभाजित हैं और सामान्यत: इनमें से प्रत्येक पर एक प्रश्न अवश्य पूछा जाता है।
दूसरा प्रश्नपत्र भारत के सामान्य भूगोल, इतिहास (आधुनिक काल), संविधान, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संस्कृति (धर्म, दर्शन, वर्ण-व्यवस्था), भारतीय भाषाओं तथा वैज्ञानिक, कलात्मक एवं खेलकूद संबंधी विषयों पर केंद्रित है। इसमें भी कुल पांच टॉपिक हैं, जिनको 20-20 अंकों में बांटा गया है। इस पेपर का उद्देश्य आपकी सामान्य जानकारी को बढाना है। भारत की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों का लेखा-जोखा, जलवायु बहुलता एवं उपयोगिता तथा प्रमुख व्यापारिक केंद्रों को जानना न केवल इस पेपर के लिए जरूरी है, बल्कि आगे भी यह आपके काम आएगा। संविधान की विशेषताओं, मौलिक अधिकारों, कर्तव्यों के साथ-साथ नीति-निर्देशक तत्वों की जानकारी भी आपको हासिल करनी होगी। आधुनिक भारत के इतिहास को देखें, तो औरंगजेब के पतन के बाद नई स्थितियों के उदय, 1857 का स्वाधीनता संग्राम, भारत में मुद्रण और अखबारों का विकास, खडी बोली का आविर्भाव, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं विभिन्न समाज सुधार आंदोलनों की अनुगूंज का अध्ययन जरूरी है। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के नायकों-महात्मा गांधी, सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि के योगदान को भी पढें। विभाजन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, भारत छोडो आंदोलन आदि को जानकर ही आप आधुनिक भारत के प्रति अपनी समझ को और बेहतर कर सकते हैं। नब्बे के दशक के बाद भारत के बदलते परिदृश्यभूमंडलीकरण, उदारीकरण और उपभोक्तावादी स्थितियों को समझे बिना आप आज के समय से रू-ब-रू नहीं हो सकते। इसी प्रकार संविधान, अर्थव्यवस्था और संस्कृति से संबंधित विभिन्न आयामों का अध्ययन भी करना चाहिए। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्रमुख भारतीय भाषाओं की जानकारी भी प्राप्त करें। तीसरा पेपर संचार की थ्योरी से जुडा है। इसके तहत कम्युनिकेशन, इसकी परिभाषा, विशेषताओं, प्रकार और विकास को समझें। पत्रकारिता और समाचार पत्रों की स्थिति और उसकी विभिन्न समस्याओं-आर्थिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक पक्षों का ज्ञान हासिल करें। हिन्दी सहित प्रमुख भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों का ढांचागत अध्ययन भी करें। इस पेपर का अंतिम टॉपिक आधुनिक संचार प्रणाली पर केंद्रित है। पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा और इंटरनेट जैसे जनसंचार माध्यमों का विकास, प्रसार, प्रभाव और इनके नियंत्रण के प्रयत्नों को जानना-समझना इस पेपर के लिए अपेक्षित है। प्रमुख संचार संगठनों यानी मीडिया समूहों की कार्यविधि और प्रभाव के बारे में जानना बेहद जरूरी है। फीडबैक की अवधारणा और तौर-तरीके व लाभ-हानि को भी जानें। जनमत संग्रह-फीडबैक के संबंधों की भी तलाश करें।
नोट्स भी बनाएं
प्राध्यापकों के लेक्चर्स को ध्यान से सुनें और उसके मूल बिंदुओं को नोट करें।
पढाए गए टॉपिक्स को दो-तीन किताबों से कंसल्ट करें और फिर नोट्स बनाएं।
तथ्यों और आंकडों को नोट करते समय विशेष सावधानी बरतें और समय-समय पर उनको अपडेट करते रहें। इनकी क्रॉस चेकिंग भी जरूरी है।
टॉपिक से संबंधित ताजा जानकारी मिले, तो उसे नोट्स में तत्काल जोडें।
जरूरी नहीं कि हर नोट्स विस्तृत रूप में बनाया जाए। महत्व को ध्यान में रखते हुए डिटेल्ड और शॉर्ट नोट्स बना सकते हैं।
नोट्स को हमेशा अपने प्राध्यापकों से चेक करवाते रहें।
अखबार
दैनिक जागरण,
जनसत्ता, द हिन्दू
मैगजींस/जर्नल
विदुर, संचार, माध्यम, मीडिया विमर्श, फ्रंट लाइन, रंग-प्रसंग, हंस, इंडिया टुडे, दीवान-ए- सराय, मीडिया नगर लाइब्रेरी हैं खास
कुछ अच्छी लाइब्रेरियों में विजिट करना भी आपके लिए लाभदायक साबित हो सकता है। इनके नाम हैं : सेंट्रल लाइब्रेरी, डीयू
रतन टाटा लाइब्रेरी,डीयू
मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर की लाइब्रेरी, जामिया मिलिया इस्लामिया,
ब्रिटिश काउंसिल, कनॉट प्लेस
साहित्य अकादमी लाइब्रेरी, मंडी हाउस
सफलता का मूल मंत्र
क्लास नोट्स को घर पर रेगुलर देखें। अगली क्लास में पढाए जाने वाले टॉपिक को पहले से पढ कर जाएं।
टीवी, रेडियो के कार्यक्रमों को देखें-सुनें और इनका मूल्यांकन करें। फिल्म समीक्षा भी करें।
इंटरनेट पर सामग्री की तलाश करें, लेकिन संयम भी बरतें, वरना फालतू की साइट्स सर्च करने में आपका बेशकीमती समय नष्ट हो जाएगा।
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अंग्रेजी भाषा में भी लिखने और बोलने का अभ्यास करें।
प्रमुख अनुशंसित पुस्तकें बुक्स लेखक
हिंदी भाषा का इतिहास धीरेंद्र वर्मा
भाषा और समाज राम विलास शर्मा
सूचना, संप्रेषण एवं समाज बी.एस.निगम
पत्रकार और पत्रकारिता प्रशिक्षण अरविंद मोहन
नए संचार माध्यम और हिंदी अचला शर्मा, सुधीश पचौरी
भारत की समाचार पत्र क्रांति रॉबिन जेफ्री प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास जयशंकर मिश्र
वैष्णव धर्म का उद्भव एवं विकास सुवीरा जायसवाल
भारतीय संस्कृति गोविंद चंद्र पांडेय
ग्रोथ ऐंड डेवॅलपमेंट ऑफ कम्युनिकेशन इन इंडिया जे.वी.विलानियम
मेकिंग न्यूज उदय सहाय द्वारा संपादित
कम्युनिकेशन रेमंड विलियम
कुछ अच्छी वेबसाइट्स
www.jagran.com
http://www.webdunia.com/
http://www.bbchindi.co/m
www.ddindia.com
http://www.indiantelevision.com/
www.hindimediaglobe.wordpress.com
http://www.hi.wikipedia.com/
प्रस्तुति
मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव
20 फ़रवरी, 2008
पं0 राधेश्याम शर्मा 'प्रगल्भ'
जयजयवंती द्वारा आयोजित संगोष्ठी में पहली बार शिरकत करने का मौका मिला। विषय था ‘’हिंदी का भविष्य और भविष्य की हिंदी’’ । इस विषय से अधिक रोचक पं0राधेश्याम शर्मा’प्रगल्भ’ के जीवन वृत्त पर आधारित अशोक चक्रधर जी की पावर प्वाइंट प्रस्तुति थी । हॉ , वहॉ पावर प्वाइंट की वर्तनी ‘पावर पॉइंट’ मुझे अखर रही थी । प्रगल्भ जी के बारे में गोविंद व्यास और शेरजंग गर्ग हिंदी भवन की बैठकों में अक्सर चर्चा किया करते थे । लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली और बहुआयामी है यह आज ही जान पाया। उनकी कविता के अनेक फलक अशोक जी की प्रस्तुति में समाहित थे। एक और जो मेरे लिए अच्छी रही वह बालस्वरूप राही की ग़जलों को नए सिरे से जानने का अनुभव । इस गोष्ठी में कॅुवर बेचैन भी थे पर समयाभाव के कारण उन्हे सुन न सका। वहॉ एक तनाव रहित श्रोता-समाज उपस्थित था और वागेश्वरी जी ने आतिथ्य में कोई कसर भी नहीं छेाड़ी। टेक्नोलॉजी कई बार निर्गुण ब्रह्म की तरह समझ से परे हो जाती है यह विजय कुमार मल्होत्रा जी से बातचीत में भी लगा और विश्व बिरादरी तक इस संगोष्ठी के विचारों को पहॅुचाने में भी । अंतत: प्रगल्भ जी की स्मृति को नमन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हॅूं।
19 फ़रवरी, 2008
आचार्य का शेयर
तक्षशिला के आचार्य आजकल शेयर मार्केट में बिजी हैं। कुछ शिष्य गण भी खरीद-फरोख्त के इसी धंधे में मशगूल हैं। सारा ज्ञान निवेश ज्ञान में परिवर्तित हो चुका है । पिछले दिनों जब लगभग 9000 करोड़ भारतीयों का लेकर एफ0आई0आई0 उड़ गए तो तक्षशिला में भी हडकंप मच गया । आप जाने-माने आचार्यों के सूखे हुए चेहरे को देखकर पहचान सकते हैं कि इन्होंने भी दुर्घटना झेली है। ये आचार्य’राग दरबारी’ के मास्टर मोतीराम की तरह अपनी कक्षाओं में कम शेयर के चढ़ते-उतरते भावों पर अधिक रहता है । इनमें मार्क्सवादी परंपरा के वे आचार्य भी शामिल हैं जो पॅूजी के विरोध में खड़े रहते हैं।
15 फ़रवरी, 2008
राम जी यादव : फिल्मा मेकर से सब्जी विक्रेता
राम जी यादव : फिल्म मेकर सब्जी विक्रेता
राम जी से मेरी मुलाकात लगभग 3 साल पहले हुई थी । वृत्तचित्र पर एक अतिथि व्याख्यान के लिए उन्हें कॉलेज़ बुलाया गया था । बातचीत में बड़े जीवंत दिखने वाले राम जी डाक्यूमेंट्री निर्माण पर लगातार सोचने-समझने में भिड़े रहते थे । देश के बहुत से सम्मेलनों में उनकी भागीदारी होती थी। मेरी और प्रदीप जी की बातचीत से उन्हे खयाल आया कि क्यों न भीमराव अंबेडकर कॉलेज पर एक डाक्यूमेंट्री बनायी जाय । तत्कालीन प्राचार्य डा0 राजबीर सोलंकी ने एक कमेटी बना दी और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गयी । बाद में डा0 प्रेमचंद पातंजलि ने बड़े मनोयोग से उसमें वांछित परिवर्तन करवाए और फिल्म अंतिम रुप में आ गयी । राम जी के काम को सराहना मिली और हमें राहत कि कॉलेज के परिदृश्य को उभारने वाला एक दस्ताबेज तैयार हो गया ।
फिल्म निर्माण एक खर्चीला शौक है । राम जी का कुछ पैसा कॉलेज पर बकाया रह गया था । उसे निकालने के लिए वे लगातार चक्कर काटते रहे । लेकिन जहॉ तक मुझे याद आता है उनकी बकाया रकम उन्हें कभी नहीं मिली । धीरे-धीरे हमारी उनकी मुलाकात बहुत कम हो गयी और उनके खुद को स्थापित करने की चर्चा जरूर होती रही । आखिर प्रखर वक्ता और डाक्यूमेंट्री मेकर राम जी आज कल कहॉ हैं। ताजा़ खबर मिली है कि वे रोहिणी में सब्जी बेंच रहे हैं और सबसे बड़ी बात है कि सुखी हैं।
मेरे एक अन्य मित्र संजय जोशी फिल्मों के दीवाने हैं। फिल्म बनाने के साथ ही उस पर टीका-टिप्पणी करने में दक्ष हैं । हर वर्ष देश के किसी न किसी भाग में घूमकर फिल्म संस्कृति की अलख जगाते हैं । आजकल उनका अड्डा गोरखपुर है। आम लोगों के चंदे से गोरखपुर फिल्म फेस्टीवल आयोजित होता है और हर तरह से सफल भी । एक कॉलेज से उन्हें भी बकाया रकम नहीं मिली ।
दिल्ली के महाविद्यालयों में धन की कमी नहीं है लेकिन व्यवस्था ऐसी जटिल है कि आप आप फॅसे तो फॅसे । भाई संजय जोशी को भी अपनी राह बनानी होगी । शिक्षा और कलाऍ दुकानदारी में तब्दील होती जा रहीं हैं, ऐसे में हमें संजीदा होने के साथ –साथ समझदार भी होना पड़ेगा।
राम जी से मेरी मुलाकात लगभग 3 साल पहले हुई थी । वृत्तचित्र पर एक अतिथि व्याख्यान के लिए उन्हें कॉलेज़ बुलाया गया था । बातचीत में बड़े जीवंत दिखने वाले राम जी डाक्यूमेंट्री निर्माण पर लगातार सोचने-समझने में भिड़े रहते थे । देश के बहुत से सम्मेलनों में उनकी भागीदारी होती थी। मेरी और प्रदीप जी की बातचीत से उन्हे खयाल आया कि क्यों न भीमराव अंबेडकर कॉलेज पर एक डाक्यूमेंट्री बनायी जाय । तत्कालीन प्राचार्य डा0 राजबीर सोलंकी ने एक कमेटी बना दी और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो गयी । बाद में डा0 प्रेमचंद पातंजलि ने बड़े मनोयोग से उसमें वांछित परिवर्तन करवाए और फिल्म अंतिम रुप में आ गयी । राम जी के काम को सराहना मिली और हमें राहत कि कॉलेज के परिदृश्य को उभारने वाला एक दस्ताबेज तैयार हो गया ।
फिल्म निर्माण एक खर्चीला शौक है । राम जी का कुछ पैसा कॉलेज पर बकाया रह गया था । उसे निकालने के लिए वे लगातार चक्कर काटते रहे । लेकिन जहॉ तक मुझे याद आता है उनकी बकाया रकम उन्हें कभी नहीं मिली । धीरे-धीरे हमारी उनकी मुलाकात बहुत कम हो गयी और उनके खुद को स्थापित करने की चर्चा जरूर होती रही । आखिर प्रखर वक्ता और डाक्यूमेंट्री मेकर राम जी आज कल कहॉ हैं। ताजा़ खबर मिली है कि वे रोहिणी में सब्जी बेंच रहे हैं और सबसे बड़ी बात है कि सुखी हैं।
मेरे एक अन्य मित्र संजय जोशी फिल्मों के दीवाने हैं। फिल्म बनाने के साथ ही उस पर टीका-टिप्पणी करने में दक्ष हैं । हर वर्ष देश के किसी न किसी भाग में घूमकर फिल्म संस्कृति की अलख जगाते हैं । आजकल उनका अड्डा गोरखपुर है। आम लोगों के चंदे से गोरखपुर फिल्म फेस्टीवल आयोजित होता है और हर तरह से सफल भी । एक कॉलेज से उन्हें भी बकाया रकम नहीं मिली ।
दिल्ली के महाविद्यालयों में धन की कमी नहीं है लेकिन व्यवस्था ऐसी जटिल है कि आप आप फॅसे तो फॅसे । भाई संजय जोशी को भी अपनी राह बनानी होगी । शिक्षा और कलाऍ दुकानदारी में तब्दील होती जा रहीं हैं, ऐसे में हमें संजीदा होने के साथ –साथ समझदार भी होना पड़ेगा।
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