24 सितंबर, 2015

हिंदी फिल्में –भाषा, साहित्य और संस्कृति की लोकदूत



फिल्में एक ऐसे कला मायम के रूप मंे हमारे सामने उपस्थित है, जिसमें अनेक कलाओं का पड़ाव दिखाई देता है। भाषाई और रूपकर कलाएँ तो फिल्में में हमेशा ही अपना दखल रखती आयी हैऋ परंतु साहित्यिक कृतियों के सिनेमाई रूपांतरण, सिनेमा में बोलियों और आंचलिकता की अनुगूँज, गीतों का निर्माण एवं प्रसार, भाषा–भाषी समाज की कलात्मक अभिरूचि एवं कला मानकों का विकास, सांस्कृतिक रंगो–वनियों की उद्भावना और संदेश संप्रेषण तथा शिक्षण प्रक्रिया के द्वारा भाषा, साहित्य और संस्कृति का गठन फिल्मों का महत्वपूर्ण अवदान माना जा सकता है। हिन्दी फिल्में भी अपनी इस भूमिका में पीछे नहीं है।
हिन्दी फिल्में ;अध्किांशत: जिनका उत्पादन संगठित/औद्योगिक रूप में मुबंई में होता है, जिसे ‘बॉलीवुड’ भी कहा जाता हैद्ध, हिन्दी भाषा ;दुनिया की तीसरी सबसे अध्कि बोली जाने वाली भाषाद्ध ही नहीं, अपितु हिन्दी जाति ;जो मूलत: भारत के उत्तरी क्षेत्रा में निवास करती हैद्ध के जीवन सरोकारों, स्पंदन, भावात्मक संचार, आर्थिक स्थिति एवं वैचारिक बनावट को दर्शाती है। बॉलीवुड, जहाँ हिंदी फिल्मों का औद्योगिक निर्माण होता है, हिंदी फिल्मों का क्षेत्राीय सीमाओं, भौगोलिकों बायताओं एवं भाषाई घेरेबंदी को चटखा देता है। हिंदी फिल्में के निर्माण व वितरण में हिंदीतर भाषा–भाषी लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिल्म निर्माण एक सामूहिक कार्य है इसलिए हिंदी फिल्में भारत और कई बार भारत के बाहर से भी मानव संसाध्नों का उपयोग करती हैं। इसके चलते हिंदी फिल्मों की कुशलता, प्रभावोत्पादकता काफी बढ़ जाती है। अभिप्राय यह कि हिंदी फिल्म संसार भारतीय विविध्ता में एकता के सूत्रा विकसित करता है। विभिन्न भाषाई भौगोलिक समूहों को इकट्ठा करके उनमें आपसी समन्वय स्थापित करता है। इस प्रकार हिंदी फिल्में अन्य क्षेत्राीय भाषाओं बंगला, तमिल, कन्नड़ आदि की तुलना में अध्कि विस्तृत लक्ष्य को प्रस्तावित करती हैं। जहाँ हम बाकियों को क्षेत्राीय सिनेमा कह सकते हैं वहीं अपनी निर्माण प(ति और उद्यमी चरित्रा के चलते तथा समस्त भारतीय प्रतिनिध्त्वि ;अभिनय, संगीत, तकनीक, संपादन, वितरणद्ध के समाहार होने के कारण हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय ;न कि केवल उत्तर भारतीयद्ध सिनेमा कहना पड़ेगा। हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय सिनेमा कहना सर्वथा समीचीन भी है क्योंकि इन फिल्मों के दर्शक भारतीय भूखंड के हर हिस्से में मौजूद हैं। वेलोग भी जिन्हें न तो ठीक से हिंदी लिखनी, पढ़नी, बोलनी आती है वे भी हिंदी फिल्में देखते हैं और उसका संदेश ग्रहण करने में सक्षम होते हैं। साथ ही, हिंदी फिल्में राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दों को लगातार गंभीरता और सहजता से उठाती है। भारत की राष्ट्रीय संस्कृति, सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक घटनाचक्र का बैरोमीटर बनकर हिंदी फिल्में भारतीय राष्ट्र की मुख्य चिंताधरा का उद्घाटन करती हैं। अपने इन्हीं गुणों के चलते हिंदी फिल्में सच्चे अर्थों में भारत के राष्ट्रीय सिनेमा से अभिहित किया जाता रहा है। फिर भी, अपनी भाषाई बनावट के चलते हिंदी फिल्में हिंदी भाषी समूहों में सर्वाध्कि लोकप्रिय हैं।
भाषा प्रसार उसके प्रयोक्ता–समूह के संस्कृति और जातीय प्रश्नों को साथ लेकर चला करता है। हिन्दी फिल्में निश्चय ही हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार में अपनी विश्वव्यापी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं। उनकी यह प्रक्रिया अत्यंत सहज, बोध्गम्य, रोचक, संप्रेषणीय और ग्राह्य हैं। हिन्दी ;हिन्दी यहाँ भाषा, साहित्य और जाति तीनों अर्थों में ली जा सकती है।द्ध के प्रचार–प्रसार के मायम के रूप में जब हम हिन्दी फिल्मों पर दृष्टिपात करते हैं तो निम्नलिखित मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से उभरते हैं
1. भाषा का प्रचार–प्रसार
2. साहित्यिक कृतियों का फिल्मी रुपांतरण
3. फिल्मी गीतों की लोकप्रियता
4. हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों का सिनेमा
5. कलात्मक आलोचनाशास्त्रा का निर्माण
6. सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में हिंदी फिल्मों का योगदान
हिन्दी फिल्मों में वनि का आगमन हालांकि 1931 ई. ;आलम आरा, आर्देशिर ईरानीद्ध में होता है परंतु 1912 में ही दादा साहब पफाल्के की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ ;भारत की पहली फीचर फिल्मद्ध में उपशीर्षकों की भाषा हिन्दी की उस विशिष्ट शैली ;जो आज बोलचाल में प्रयोग होती है तथा जिसमें विश्वस्तर पर पनपने की संभावना है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भी स्वीकृत कराया जा सकता हैद्ध के दर्शन होते हैं, जो बाद में हिन्दी भाषी समूहों में लोकप्रिय होती चली गई। इस फिल्म के शीर्षकों को देखें तो हम पाते हैं कि इसमें लगभग 95 शब्दों का प्रयोग हुआ है, उनमें से 8 उदू‍र् में है बाकी संस्कृत और हिन्दी के है। ‘साड़गता’ शब्द मराठी भाषा का है। एक–दो शब्दों में वर्तनी की अशु(ता भी है। पहली फिल्म में ही भाषा की व्यापकता हमें दीखती है। हिंदी फिल्मों ने हिन्दी की ऐसी भाषा–शैली विकसित करने और उसे गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों, भारतेत्तर जसमूहों में प्रचलित करने में मदद की जो आज हर जबान से पफूटती हैं।
हिंदी फिल्मों की भाषा को लेकर भी भ्रम पैदा किया जाता रहा है। अपने हाल के ही एक लेख में प्रो. हरीश त्रिावेदी ने इस भ्रम का तर्कसंगत निराकरण किया है कि हिंदी फिल्मों की वास्तविक भाषा उर्दू है। फिल्मों के नामकरण, संवाद, लेखन और गीतों के विश्लेषण से कुछ फिल्म विचारकों ने सि( किया था कि हिंदी फिल्मों को कायदे से उदू‍र् फिल्म कहा जाना चाहिए लेकिन न तो नामकरण और न ही संवादों के आधर पर यह सि( किया जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में उदू‍र् का वर्चस्व है। गीतों में अवश्य ही उदू‍र् शब्दों की प्रचुरता दिखाई देती है लेकिन इस उदू‍र् को हिंदी के निकट कहा जा सकता है।
फिल्में भाषाई प्रचार को गति कैसे देती है? इस प्रश्न का उत्तर सापफ है कि फिल्में मात्रा मौखिक भाषा का ही आलंबन नहीं ग्रहण करती वरन् मौखिक भाषाओं के साथ दृश्य भाषा पूरक के रूप में साथ–साथ चला करती है। हिंदी फिल्मों ने भी बड़े अनुभव के बाद अपनी दृश्य भाषा का निर्माण एवं गठन सुनिश्चित किया है। हम अपनी आम बातचीत के दौरान भी दृश्य भाषा का प्रयोग करते हैं। मसलन यहां या वहां बैठने के लिए तर्जनी के संकेत ‘यहां’ के लिए तर्जनी क साथ अन्य अंगुलियां भी साथ जुड़ी होती हैं जबकि ‘वहाँ’ केसंकेत में वह अकेली और तनी हुई होती है। यदि संदर्भ बैठने ;स्वागतोपरांत आदिद्ध का हो तो हम किसी भी भाषा में बोलते हुए इस तरह की देह भाषा का प्रयोग करते हैं। मौखिक भाषा को न जानने वाला या कम जानने वाल व्यक्ति संकेतों को ग्रहण करते हुए भाषाई आरोह और अवरोह के आधर पर पूरा अर्थ समझ जाता है। फिल्मों में दृश्य की ताकत मौखिक भाषा की बाधओं को दूर कर उसे अध्कि संप्रेषण बना देती है इसलिए वे निभाषी समूहों तक अपने अर्थ का प्रकाशन संभव कर पाती है। हिंदी फिल्मों की दृश्यता हिंदी भाषा के अर्थ प्रसार में सहायक रही है। भारत में प्रतीकों की प्रचुरता और प्राचीनता अर्थ संप्रेषणीय में कारगर सि( हुई है। इन प्रतीकों उदाहरणत: ‘शिवलिंग’ या ‘बांसुरी’ की वर्तनियाँ भिन्न होने के बावजूद उन्हें पूरे भारत के लोग ग्रहण कर लेते है। हिंदी फिल्मों ने इस प्रतीकात्मकता को अपनाकर अपनी संप्रेषणीयता गैर हिंदी भाषी क्षेत्राो में सुनिश्चित की है। दृश्य भाषा के विकास और प्रतीकात्मकता बुनावट के सहारे हिंदी, हिंदी फिल्में  के मायम से उन जनसमूहों में समादृत और लोकप्रिय हुई जो किसी अन्य मायम से संभव न थी। 
हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी साहित्य को भी आम लोगों ;वे लोग भी जो निरक्षर है या फिर हिन्दी पढ़ नहीं सकते – या पढ़ना नहीं चाहते, देशी–विदेशी दोनोंद्ध तक पहुँचाने में सपफलता अर्जित की है। हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों – शतरंज के खिलाड़ी, तीसरी कसम, चित्रालेखा, सूरज का सातवाँ घोड़ा, माया दर्पण, तमस, सारा आकाश पर फिल्में बनी हैं। हिंदी साहित्य का व्यापक प्रसार पूरे विश्व में फिल्मों के जरिए हुआ है।
साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण  साहित्य को नई संचारात्मक और संप्रेषण शक्ति प्रदान कर देता है। निरक्षर लोग और गैर भाषाई लोगों तक भी साहित्य की पहुँच इसके पफलस्वरूप हो जाती है। यदि देखें तो हम पाते हैं कि साहित्य–संरचना का मूलाधर भाषा है जबकि वहीं साहित्य जब फिल्मी पर्दें पर आता है तो दृश्य उसके केंद्र में होता है। भाषाओं का भूगोल सीमित और दृश्यों का व्यापक होता है। जरूरी नहीं कि दृश्य हमेशा असीमित भौगोलिक विस्तार को संबोध्ति करने की क्षमता रखते हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अंडमान द्वीप के कई आदिवासियों ने अपने ऊपर से उड़ते हवाई जहाज को देखा तो उन्होंने इसे विराट पक्षी के रूप में परिकल्पित किया। दृश्य  यथार्थ विम्बों के अभाव में अपना अर्थ संप्रेषण नहीं कर सकते हैं लेकिन भाषा कि तुलना में वे अध्कि संप्रेष्य कहे जा सकते हैं। पहाड़, पेड़, पक्षियों के दृश्य पूरी मानवता को संबोध्ति कर सकते हैं लेकिन हवाई जहाज सीमित लोगों की पहुँच के चलते सीमित लोगों तक ही अपने अर्थ का प्रतिपादन करने में सक्षम होते हैं। माथे की विंदी  एक सांस्कृतिक प्रतीक होने के चलते भारत के विभिन्न भाषा–भाषी समूहों पर सहज ही अर्थ प्रकट कर सकती है परंतु पश्चिमी दुनिया के लिए उसका अर्थ व अभिप्राय लगाना कठिन होता है। संस्कृति विम्बों के द्वारा निर्मित होती है, भाषा उनकी सहायक होती है। हिंदी साहित्य की महान् कृतियों का फिल्म विध में रूपांतरण उनकी लोकप्रियता और पहुँच को सुनिश्चित करता है। ‘तीसरी कसम’ पफणीश्वरनाथ रेणु की महत्वपूर्ण कहानी है इसी पर बासु भट्टाचार्य ने जब फिल्म का निर्माण किया तो वह गैर हिंदी भाषियों के लिए भी सहज–सप्रेष्य हो उठी। उसमें गानों ने अतिरिक्त ऊर्जा का समावेश करा दिया और उनकी व्यापकता को सुनिश्चित कर दिया। अभिनय, संगीत, दृश्यांकन ने मिलकर इस कहानी का कायाकल्प कर दिया। कहानी में अनेक मार्मिक स्थल ;स्टेशन पर हीरामन, हीराबाई का विछोह आदि भारतीय समाज के स्मृति पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गए।द्ध
फिल्मी गीत अपनी संगीतात्मकता के चलते अध्कि संचारात्मक प्रकृति के होते हैं। हिन्दी फिल्मी गीत उन लोगों की जबान भी चढ़े दिखाई देते हैं जिन्होंने हिन्दी को कभी व्यवस्थित ढंग से पढ़ा नहीं। इन गीतों के मायम से हिन्दी दुनिया के विभिन्न भागों तक पहुँची। गीत – आसानी से हमारी स्मृति का अंग बन जाते हैं इसलिए भाषाई प्रचार–प्रसार का सहज, दीर्घजीवी मायम बनते हैं। हिन्दी फिल्मी गीतों में भी यह गुण विशेषतौर पर मौजूद है। कोई भी समाज या राष्ट्र अपने गीतों के मायम से अपने हृदय को खोलता है। पहले निम्न गीतों पर एक दृष्टि डालते हैं
 जब दिल ही टूट गया ;1946, शाहजहाँद्ध
 वतन की राह में वतन के नौजवों ;1948, शहीदद्ध
 लारा लप्पा, लारा लप्पा ;1949, एक थी लड़कीद्ध
 मेरे पिया गए रंगून, किया है ;1949, पतंगाद्ध
 तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं ;1950, बावरे नैनद्ध
 तू गंगा की मौज, मैं जमुना का ;1952, बैजूवावराद्ध
 दे दी हमें आजादी ;1954, जागृतिद्ध 
 मेरा जूता है जापानी ;1955, श्री 420द्ध
 डम डम डिगा डिगा, मौसम ;1960, छलियाद्ध
 इंसापफ की डगर पर ;1961, गंगा–जमुनाद्ध
 मेरा रंग से बसंती चोला ;1965, शहीदद्ध
 सजन रे झूठ मत बोलो ;1966, तीसरी कसमद्ध
 झूठ बोले कौवा काटे ;1973, बॉबीद्ध
 मैं तो आरती उतारूं रे ;1975, जय संतोषी माँद्ध
 दीदी, तेरा देवर दीवाना ;1990, हम आपके है कौनद्ध
 ईलू ईलू ;1990, सौदागरद्ध
उपरोक्त गीत बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथ–साथ अपनी लोकप्रियता का संकेत भी करते हैं। अपने संगीतात्मक विधन, खूबसूरत शिल्प और संचारध्र्मी तेवर के चलते ये गीत भाषाई समूहों के साथ–साथ विभाषाई जनों तक पहुँचे और उनका कण्ठहार बने। इन गीतों में निजी दर्द के साथ राष्ट्रीयता, अयात्मिकता, सामाजिक संबंध्, जीवन–मृत्यु के प्रश्न, कॉमेडी और वनयात्मक सरंचनाओं को सहज ही देखा जा सकता है। गीतों को जब संगीत का आलंबन मिलता है तो उनकी यात्राा लंबी हो जाती है। वे अपने इतिहास और भूगोल का अतिक्रमण करने की क्षमता अर्जित कर लेते है। हिंदी फिल्मी गीतों ने देश और विदेश की लंबी यात्रााएं करने में सपफलता पायी है। इनके मायम से हिंदी भाषा और संस्कृति भावपूर्ण प्रवाह के रूप में जन–जन तक पहुँची।
आज हिन्दी–जनसंचार के जितने भी मायम है उनमें हिंदी की उपभाषाओं/बोलियों का प्रयोग निरंतर क्षीण हुआ है। संभवत: यह माना जा चुका है कि बोलियाँ समूह के निजी संप्रेषण के लिए ही रह गई है। लेकिन, हिन्दी की बोलियों  भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, राजस्थानी, बुंदेली, हरियाणवी, मैथिली में बनने वाली फिल्मों ने इन्हें नया जीवन प्रदान किया। हिन्दी की ये बोलियाँ फिल्मों के मायम से न अपनी अस्तित्व रक्षा कर रही है वरन् हिन्दी भाषा के वैविय को बचाए रखने, उसके शब्द भंडार मे इजापफा करने और हिन्दी की व्यापकता के सुनिश्चय में लगी हुई है।
हिंदी की उपभाषाओं में फिल्मी नजरिए देखे तो भोजपुरी सर्वाध्कि महत्वपूर्ण उपभाषा के रूप में उभरती है। आजादी के पहले ही मोतीलाल बी.ए. ने ‘नदिया के पार’ नामक फिल्म में भोजपुरी गीतों का समावेश करवा दिया था और फिर भोजपुरी भाषा संवादों और गीतों के मायम से हिंदी सिनेमा में लगातार बनी रही। भोजपुरी फिल्म का व्यवस्थित निर्माण 1962 में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबे मे होता है, इसके बाद की अनेक महत्वपूर्ण फिल्म कृतियाँ  ‘लागी नाही छूटे राम’, ‘कब होई है गवनवा हमार’, ‘भौजी दंगल’, ‘गंगाकिनारे मोरा गांव’, ‘राखी की लाज’, ‘बलम परदेसिया’, ‘भईया दूज’, ‘तुलसी सोते हमार अंगना’। हमारे समक्ष आयी। भोजपुरी फिल्में न केवल भारत वरन् मॉरीशस और त्रिानिडाड में भी लोकप्रिय हैं और इस प्रकार हिंदी भाषा के ही एक रूप का विस्तार कर रही हैं।
मैथिली भाषा की फिल्मों के निर्माण का प्रयास 1964 में माना जा सकता है जब ममता गाबय गीत, ;निर्देशक परमानंदद्ध को बनने का उद्यम हुआ। मैथिली फिल्में अपनी शैशवावस्था में हैं लेकिन कन्यादान ;1964द्ध और ‘सस्ता जिनगी महंगा सिनूर’ ;1999, बालकृष्ण झा निर्माताद्ध मैथिल भाषा में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को रचते है। भक्ति और श्रृंगार के अनूठे कवि विद्यापति की भाषा फिल्मी पदें‍र् पर आकर अध्कि लोकप्रिय व जन संप्रेषी हो सकेगीद्ध
हरियाणवी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी सिनेमा भी प्रकारांतर से हिंदी के प्रचार–प्रसार को ही सुनिश्चित कररहे हैं। हरियाणवी सिनेमा की ‘बहूरानी’ ‘सांझी’, ‘चंद्रावल’, ‘जर जोरू और जमीन’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों ने हरियाणवी भाषी हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के कुछ हिस्सों में अत्यंत लोकप्रियता अर्जित की है। सन् 2000 में प्रदर्शित ‘लाडो’ को राष्ट्रीय पुरस्कार ;डेब्यू निर्देशक  अश्विनी चौध्रीद्ध भी मिला। छत्तीसगढ़ी फिल्में के पितामह मनुनायक और किशोर साहू माने जाते है। छठवें दशक के अंतिम वर्षों में प्रदर्शित ‘कवि देवे संदेश’ ;मनु नायकद्ध एक महत्वपूर्ण तथा पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही जा सकती है, ‘घर–द्वार’, ‘छइया–भुइया’ ;निर्देशक सतीश जैन, 2000द्ध एक महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी फिल्म है जिने अपने अंचल के बाहर भी व्यवसाय किया। ‘भोला छत्तीस गढि़या’ ‘मयाज भौजी’ और ‘परदेसी के गया’ आदि फिल्मों के छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को बल प्रदान किया है।
हिंदी बोलियों का सिनेमा अपने सीमित संसाध्न और तकनीकी अपरिपक्वता के चलते भले ही कोई राष्ट्रीय, अन्र्तराष्ट्रीय पहचान न बना पाया हो परंतु इन बोलियों की शक्ति को बचाए रखने की संभावना उसने जरूर दिखाई है। जरूरत है कि क्षेत्राीय बोलियों में अध्किाध्कि सिनेमा बने जिससे हिंदी भाषा का वटवृक्ष और भी ऊर्जा–स्रोत विकसित कर सके। बोलियों में बनने वाला सिनेमा अन्तत: हिंदी भाषा को ही समृ( करता है और राष्ट्रीय एकता को दृढ़ता प्रदान करता है। 
भाषा के भीतर संस्कृति का प्रच्छन्न प्रवाह बना रहता है। हिंदुस्तानी समाज के विभिन्न मुद्दे राष्ट्रीयता, आतंकवाद, सामाजिक ढाँचा, पारिवारिक रिश्तें, कृषि–किसान, औद्योगिकरण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण,  प्रवासी जीवन आदि हिन्दी फिल्मों में उठते रहे हैं। अपने कथानक की बनावट और भाषाई अभिव्यक्तियों में हिन्दी फिल्में इन मुद्दों के प्रति हमारा यान आकर्षित करती रही हैं। हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचार–प्रसार के साथ हिन्दी भाषी समुदाय की चुनौतियां, संघर्ष–सपनों और चाहतों को भी विश्व पफलक पर पहुँचाया है। हिन्दी भाषा का विश्वव्यापी प्रसार इस समुदाय के मुद्दों को संबोध्ति किए बिना अधूरा ही माना जाता, लेकिन हिंदी फिल्मों ने अपनी इस भूमिका का बखूबी निर्वाह किया है।
दुनिया की कोई भाषा नए माहौल से अनुकूलन किए बिना जिंदा नहीं रह सकती। समाज में नयी हलचलों को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए भाषा को अपना ताना बाना बदलना पड़ता है। जब समाज और राष्ट्र नयी तकनीकी, कलात्मक, सांस्कृतिक जरूरतों की अपरिहार्यता से गुजरते है तब सक्षम भाषाएँ उनका साथ देने के लिए अपने नए अवतार में उपस्थित हो जाती हैं। हिंदी भाषा भी नव्यतम् चुनौतियों के वहन के लिए नयी विधओं और नए रूपों में हमारे सामने आयी है। हिंदी भाषा में फिल्म निर्माण के साथ हिंदी ने उदू‍र् को प्रमुख सहायिका बनाया, गीतों और संवादों के लिए, दृश्यता का समावेश किया, भाषा और बिम्ब के अन्तर संतुलन की पहचान की, नई तरह की शैलियों – मुबंइया को भी मानक बनाया, नए तरह के कोड, बिम्ब, प्रतीक, मितकथनों को ईजाद किया। पटकथा, संवाद और गीत लेखन जैसी नयी विधओं को सृजनकिया हिंदी भाषा को तकनीकी अनुकूलन के लायक बनाया इसलिए हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के सर्वथा नए रूप रंग, और  संाचे–ढांचे को गढ़ा है। हिंदी साहित्य और भाषा पर हिंदी फिल्मों का गहरा प्रभाव पड़ा है। हिंदी फिल्मो हिंदी के आलोचना शास्त्रा के लिए कई मानक प्रदान किए हैं। इन मानकों को नयी         विधओं के रूप में तथा दृश्यता, मित कथन, संवादध्र्मिता आदि कई रूपों मे चिन्हित किया जा सकता है।

किसी भी भाषा, साहित्य का विकास उसके आलोचना–शास्त्रा के बिना संभव नहीं होता। आलोचना शास्त्रा के मानदंडों का निर्माण भाषाई समूह के विविध् कलारूप तय करते हैं। हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, वैज्ञानिक अययन, जन संप्रेषणीयता, पटकथात्मकता के निर्माण, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता दृश्य भाषा, कोड निर्माण, संक्षिप्त कथन, विम्ब ध्र्मिता, प्रतीकात्मकता, भाषा–दृश्य की अनुपातिकता आदि मानकों को हिन्दी फिल्मों ने गढ़ा है। ‘इंडियन डायसपोरा’ विश्वस्तर पर एक नयी अवधरणा और सच्चाई है। हिन्दी फिल्में  हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुँचने की दिशा में अग्रसर हैं।

संचार और समाज के संबंधों की तलाश


संचार माध्‍यमों के सिद्धांतों और उनको समझने का कार्य सबसे पहले साहित्‍य जगत के चिंतकों-विचारकों ने ही शुरू किया। भाषा, संचार की प्राथमिक तकनीकों में सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण रही है, यही कारण है कि आज भी साहित्‍य,भाषा और संचार के बीच सीधा और साफ संबंध दिखाई देता है। संचार माध्‍यमों ने एक नयी स्थिति का भी निर्माण किया है। यह है-समाजीकरण में उसकी भूमिका का वर्चस्‍व। पहले यह जिम्‍मेदारी साहित्‍य और कलाओं के पास थी,लेकिन अब इसका मानों हस्‍तांतरण हो गया हो। लेकिन; संचार,समाज और साहित्‍य के बीच आज भी एक जटिल,जीवंत और जुझारू रिश्‍ता बना हुआ है जिसके चलते यह विषय महत्‍त्‍वपूर्ण हो जाता है। इसी विषय को संबोधित करती एक पुस्‍तक डॉ.संजय सिंह बघेल ने लिखी है जिसमें संचार और साहित्‍य सह-अस्तित्‍व में मौजूद हैं । 
इस पुस्‍तक में, ‘संचार और समाज विकास की प्रक्रिया’, ‘साहित्‍य और जनसंचार’, ‘साहित्‍य के विकास की परिकल्‍पना और जनसंचार’, ‘साहित्यिक विधाएँ और जनसंचार माध्‍यम तथा जनसमाज,जनसंचार और जनसाहित्‍यजैसे विषयों पर तफ्शील से बात की गई है। कहना न होगा कि लेखक की चिंता और सरोकार जनोन्‍मुखी हैं। वह समाज के संदर्भ में साहित्‍य और संचार के अंतर्संबधों की निरंतर तलाश करता है और  इनकी भूमिका पर टिप्‍पणी करता है। लेकिन ऐसा करने के क्रम में वह अपने लिए कई संदर्भ जुटाता है और अनेक विद्वानों,ग्रंथों के उद्धरण के जरिए अपनी बात की पुष्टि भी करता है। मसलन, ‘‘अंग्रेजी का Mass शब्‍द जो जनका द्योतक है, देशीय चेतना में लोकका पर्याय है।जिसका जिक्र पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने साहित्‍य के इतिहास में भी किया है और जिसका उल्‍लेख जैमनीय उपनिषद में इस प्रकार(से) किया गया है-
बहु व्‍यहतौवा अप बहुता लोक:
क एतत अस्‍पपुनरी हिता अयात्’’ (पृ0 17)
इतना संदर्भ देने के बाद वह जनसंचार और जन के संबंधों का विवेचन करता है और जनसंचार को परिभाषित करने का प्रयत्‍न भी।                          
लेखक ने इस पुस्‍तक में विभिन्‍न संचार माध्‍यमों के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश डाला है। ऐसा करते हुए वह समाज और संचार के संबंध तो उद्घाटित करता ही है, साथ ही संचार माध्‍यमों के तकनीकी पहलू का विवेचन करता चलता है।रेडियो के विकास की चर्चा करते हुए लेखक कहता है, ‘‘वास्‍तव में रेडियो की कहानी 1815 0 से शुरू होती है जब इटली के एक इंजीनियर गुग्लियो मार्कोनी ने रेडियो टेलीग्राफी के जरिए पहला संदेश प्रसारित किया। रेडियो पर मनुष्‍य की पहली आवाज 1906 में सुनाई दी।यह तब संभव हुआ जब अमेरिका के ली डी फॉरेस्‍ट ने प्रयोग के तौर पर एक प्रसारण करने में सफलता प्राप्‍त की।(पृ029)’’ लेखक प्रामाणिक तिथियों और आविष्‍कारकों का हवाला देता है। पुस्‍तक में कई स्‍थानों पर आंकड़े भी उपलब्‍ध कराए गए हैं जिससे जनसंचार के विकास को तथ्‍यात्‍मक रूप से समझने में मदद मिलती है। इसीप्रकार वह इंटरनेट के विकास की चर्चा करते हुए इसके लिए जरूरी उपकरणों का उल्‍लेख करना नहीं भूलता। इसे और अधिक स्‍पष्‍ट करने के लिए वह रेखांकनों का उपयोग भी करता है और कुछ प्रमुख वेब साइट्स की सूची भी जोड़ देता है। इससे पुस्‍तक केवल विचार की प्रस्‍तावक न बनकर व्‍यावहारिकता के आयाम को भी छूने लगती है।
पूरी पुस्‍तक में संचार,भाषा,समाजशास्‍त्र,संस्कृति और साहित्‍य के मुद्दे बड़ी सहजता से आवाजाही करते हैं। इसलिए यह पुस्‍तक एकांगिता को तोड़ती है और व्‍यापक सरोकारों को उभारती है। आज अधिकांश पुस्‍तकें मीडिया के क्राफ्ट की चर्चा तो अवश्‍य करती हैं परंतु मीडिया और समाज के अंतर्संबंधों को उभरने नहीं देतीं। यहाँ मुख्‍य बल इसकी तलाश का है, जिसमें एक बौद्धिक की चिंता भी दबे पाँव चली आती है।  
इस किताब कुछ नए विषय भी लिए गए हैं। उदाहरण के लिए देह भाषा का पर्याप्‍य विवेचन किया गया है। दैहिक संचार, प्रबंधन जगत में एक महत्‍त्‍वपूर्ण स्‍थान रखता है। संजय सिंह इस विषय को जीवन के वास्तिवक उदाहरणों के जरिए विश्‍लेषित करते हैं। ऐसा करते हुए उन्‍होंने चित्रों का भी उपयोग किया है।इसलिए यह जटिल विषय भी बड़ी सहजता से संप्रेषित हो गया है। पुस्‍तक में प्रिंट,रेडियो,टेलीविजन,सिनेमा,इंटरनेट और विज्ञापन आदि सभी माध्‍यमों का विश्‍लेषण किया गया है,जिससे इसे पढ़ने पर समग्रता का एहसास होता है।

इस पुस्‍तक में अनेक खूबियाँ हैं पर त्रुटियाँ नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। जहाँ तक पुस्‍तक में विवेचित मुद्दों का सवाल है, निश्‍चय ही उनमें एकसूत्रता का अभाव है। ऐसा इसलिए भी हुआ है कि लेखक मोटे तौर तीन विषय-संचार,समाज और साहित्‍य का समाहार एक साथ करना चाहता है, जैसाकि पुस्‍तक के शीर्षक से भी स्‍पष्‍ट है। कई स्थानों पर वाक्‍य गठन की गड़बड़ी भी है, जैसे- ‘‘निष्‍कर्षत: कहने को तो जानवरों की भी एक भाषा होती है। वे भी आपस में बातचीत करते हैं। लेकिन मनुष्‍यों की भाषा इसी अर्थ में उनसे भिन्‍न होती है, कि वे जो बोलते हैं,उसका एक मतलब है। यह मतलब ही मनुष्‍य की बातचीत की कला को औरों से अलग करती है।(पृ0 84) ’’ इस निष्‍कर्ष से यह ध्‍वनि निकलती है कि पशुओं की बातचीत बे-अर्थ होती है जबकि ऐसा बिल्‍कुल नहीं है और शायद लेखक का अभिप्राय भी ऐसा नहीं है,क्‍योंकि व‍ह नृविज्ञान से भी परिचित है। परंतु, यहाँ वह अभिप्राय स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया जो लेखक उभारना चाह रहा था। इसी प्रकार एक अन्‍य जगहजनसाधारण आदमी’ (पृ0 85) का प्रयोग किया गया है। क्‍या जनसाधारणशब्‍द ही पर्याप्‍त नहीं था जो आदमी जोड़ने की जरूरत पड़ गयी ? ऐसी कुछ सामान्‍य गलतियों को छोड़ दें तो य‍ह पुस्‍तक एक जरूरी पुस्‍तक है और इसे पढ़ा जाना चाहिए। पुस्‍तक के अंत में श्‍याम बेनेगल,जावेद सिद्दीकी, अंजन श्रीवास्‍तव, आशीष विद्यार्थी और सुशांत सिंह के विचारों को समाहित कर लेखक ने इसकी पठनीयता में इजाफा किया है।  

गाँव में संचार क्रांति


 अब गाँव तभी जाना होता है जब कोई पर्व-उत्‍सव हो या फिर शादी-विवाह। विगत दिनों पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के अपने गाँव कुछ इसी सिलसिले में जाना हुआ। आज भी मेरे गाँव से लगभग डेढ़ कि0मी0 पहले ही पक्‍की सड़क खत्‍म हो जाती है। वहाँ पहुँचा तो जोरदार बारिश हो रही थी।घर तक जाने का मार्ग अवरूद्ध हो चुका था। इसलिए इंतजार करता बैठ गया। वैसे यह भी विचार आया कि भीगते हुए चला जाय, पर फिलहाल के लिए इसे मुल्‍तवी कर दिया गया।चारों ओर जंगल का अलौकिक नजारा था।इतने खुले भूगोल को देखकर मन पुलकित था। बारिश के थमने पर मैं और मेरे फोटोग्राफर मित्र पैदल चलकर घर पहुँचे।बरसात और आँधी ने बिजली के खंभों को उखाड़ दिया था। इसलिए प्रकृति के साथ जीवन-शेली अपनानी थी।शाम के वक्‍त जंगलों और खेतों की ओर घूमने निकल पड़े। धान की रोपाई चल रही थी। अधिकतर महिलाएँ काम में लगी थी। कुछ पहले से परिचित थीं। जब मैंने उनसे अवधी में बातचीत शुरू की तो उनकी प्रसन्‍नता का ठिकाना न था। दिल्‍ली में रहते हुए भी ठेठ अवधी के शब्द गाँव से आने वालों से मैं सीखता रहता हूँ।फिर उन्‍होंने बताया कि शहर से आने वाले कौन-कौन लोग हैं जो ‘अपनी’ भाषा मे बात नहीं करते।इन महिलाओं को देखकर ऐसा लगा कि इन्‍हें सशक्‍त होने के लिए न तो सरकारी योजनाओं की जरूरत है और न ही किसी ‘डिस्‍कोर्स’ की।ऐसी ऊर्जा और आत्‍मनिर्भरता शहरी महिलाओं में कम दीखती है।कहने की जरूरत नहीं कि ये महिलाएँ दलित-पिछड़े घरों से ताल्‍लुक रखती हैं।
अंधेरा छा गया था। तालों में पानी लबालब था। मेढकों का समूह-गायन शुरू हो गया था।अनेक अनचीन्‍हीं ध्‍वनियाँ का कलरव-सा सुनाई पड़ रहा था। मनुष्‍य निर्मित ध्‍वनियों को चुनौती देता हुआ।जब सोने के लिए चारपाई आयी तो खुले आकाश में ही आसन जमा।अब आसमान साफ था।तारों की जमात चहल-कदमी कर रही थी।मच्‍छरों से निजात पाने के लिए कंडे(उपले) और भूसे का धुआँ कर दिया गया था।चारों ओर पानी भरने से हवा में ठंडक थी।अंधेरा पाख था इसलिए चाँद न दिखा।बगल वाले पीपल पर असंख्‍य जुगनूं मंडरा रहे थे।मेरे मोबाइल की बैट्री कब की खत्‍म हो चुकी थी, दिल्‍ली वालों से संपर्क टूट चुका था। मन और शरीर दोनों शुकून महसूस कर रहे थे। कब नींद ने अपने आगोश में खींचा पता ही न चला।

अगले दिन तड़के ही उठ जाना पड़ा।जब गाँव जाता हूँ तो बचपन के अपने स्‍कूल को देखने की स्‍वाभाविक इच्‍छा रहती है। स्‍कूल पहुँचा तो वह बिल्‍कुल नए रूप में था।शौचालय भी बन गए थे।इस बीच ग्राम प्रधान भी आ गए थे। मिड-डे मील की चर्चा चल पड़ी।बताया गया कि गेहूँ-चावल देने के बाद दो रूपये प्रति विद्यार्थी सरकार की ओर से दिया जाता है। इसमें सब्‍जी, मिष्‍ठान और खाना पकाने का खर्च और जलाऊ लकड़ी की कीमत शामिल है।मुझे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ।इसी प्रकार ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के बारे में लोगों ने बताया कि कार्ड बन जाते हैं, उनके भी जिन्‍हें इसकी जरूरत नहीं भी है।पेंशन स्‍कीम का लाभ भी कुछ ऐसे ही लोग उठा रहे हैं। सरकार की कल्‍याणकारी योजनाएँ आज भी दबंगों और अफसरों की मिलीभगत से निष्‍प्रभावी हो रही हैं।सूचना का अधिकार जरूर कुछ उत्‍साह देने वाला लगा।स्‍कूल में बैठे-बैठे सहसा मेरी नज़र एक बोर्ड पर गयी।उस पर ग्राम प्रधान से लेकर ब्‍लॉक और जिला स्‍तर के अधिकारियों के मोबाइल नं0 लिखे हुए थे।स्‍थानीय थानाध्‍यक्ष का भी।मैने पास खड़े एक युवक से पूछा कि ये फोन मिलते भी हैं या केवल दिखाने के लिए यहाँ लिख दिए गए हैं। उसने कहा नहीं ये सभी मिलते हैं। मेरी प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा। तभी वह बोल पड़ा कि इससे हमें कम और अधिकारियों को फायदा कहीं ज्‍यादा है। उसने जो आगे बताया वह चौकाने वाला था। उसकी बात में करुणा और हास्‍य का मिश्रण था। उसने कहा गाँववालों के आपसी फसाद का फायदा अधिकारी अपनी जेब भरने में कर  लेते हैं। मौका-ए-वारदात उनके लिए तोहफे लेकर आती है। इसलिए वे पहुँच भी जाते हैं। मैंने सोचा हर क्रांति में क्‍या शोषण की संभावना बनी रहती है। जिस गाँव में आँधी और बरसात से खंभे गिर गए हों, जिसके चलते बिजली न हो। जहाँ आज भी पक्‍की सड़क न हो। पीने का पानी समुचित मात्रा में न हो और अशुद्ध हो वहाँ मोबाइल पूरा काम करता है। विजली न रहने पर बैट्री चार्ज होती है डीजल इंजन या बाइक से। मुझे लगा मूलभूत सुविधाओं से ध्‍यान हटकर अब मोबाइल ग्राम समाज की जरूरत बन गया है।पर शायद यह सच नहीं है। आज भी जब वे फोन करते हैं तो केवल मिस कॉल ही देते हैं।मोबाइल तो है पर बैलेंस नहीं ।टेलीविजन तो है पर बिजली नहीं। ले देकर रेडियो है जो हमेशा उपलब्‍ध है। पर नयी पीढ़ी ध्‍वनि की बजाय दृश्‍य से आकर्षित है।उसे अब देखना अच्‍छा लगता है।कबीर की तरह जिन्‍होने कहा था –एक अचंभा देखा भाई। गाँवों की संचार क्रांति भी किसी अचंभे कम नहीं।

वैकल्पिक सभ्‍यता का स्‍वप्‍न और मीडिया की तकनीक



सभ्‍यता का विकास एक मानवीय उद्यम है।मनुष्‍य ने अपने जीवन को लगातार आनंददायी बनाने के लिए अनेक आविष्‍कार किए और बहुत से उपकरणों की खोज की।उसके इस प्रयास में तीव्रता तब आयी जब उसे विज्ञान का सहारा मिला और उसकी जिज्ञासा का क्षेत्र आध्‍यात्मिक-पारलौकिक न रहकर सांसारिक और लौकिक अनुभूतियों के इर्द-गिर्द विकसित होने लगा।इसे सभ्‍यता का आधुनिक काल कहा जाता है। मानव जीवन के इतिहास का यह सबसे हलचल भरा और प्रयोगधर्मी युग है।पुरा काल से लेकर आज तक सभ्‍यता के विकास में संचार ने अहम् भूमिका निभाई है।आपसी संवाद और टीम भावना ने उसके शुरूआती अस्तित्‍व की दिशा तय की और उसे निर्भीकता प्रदान की। शिकारी जीवन से लेकर सभ्‍यताओं के अभ्‍युदय तक प्रत्‍यक्ष किस्‍म के संचार ने उसे मजबूत रूप से संगठित कर दिया था।लिपियों के उदय और लेखन प्रणाली की खोज के परिणामस्‍वरूप मानवीय संवाद में इतिहास और भूगोल की बाध्‍यताएँ समाप्‍त हो गयीं और उसने अपने अनुभव और ज्ञान में  व्‍यापक जनसमूह और पीढि़यों का साझा करने की दक्षता और कौशल अर्जित कर लिया था। इसी दौरान मानव समूह अधिक संगठित होने लगे और जनसंचार के प्राक् रूपों का विकास आरंभ हुआ। 
मानव सभ्‍यता का इतिहास जहाँ युगांतकारी आविष्‍कारों और अस्तित्‍व रक्षा के असंख्‍य प्रयत्‍नों से भरा पड़ा है,वहीं वह अनंत भूलों और अवसरवादिता की अनेक घटनाओं का प्रमाण भी हमें देता है। 21वीं सदी में हम सभ्‍यता के जिस मुकाम पर पहुँचे हैं,वह न केवल हमारी उपलब्धियों वरन् हमारी चूकों,भूलों और स्‍वार्थपरकता का भी परिणाम है।इसके चलते सभ्‍यता के किसी मुकम्‍मल मुकाम पर हम पहुँच पाए हैं , यह दावा आज कोर्इ नहीं कर सकता।इसीलिए वैकल्पिक सभ्‍यता की आहट सुनना हमारे लिए एक जरूरत भी है और एक स्‍वप्‍न भी। सपने और जरूरत एक दूसरे के विरोधी न होकर, पूरक हैं,ऐसा मेरा मानना है।हमारा समकालीन मीडिया भी इन दोनों बिंदुओं के आसपास घूमता है और सूचना और स्‍वप्‍न के अनेक आयाम प्रस्‍तुत करता है।
मीडिया की तकनीक
तकनीक हमारे जीवन का अभिन्‍न हिस्‍सा रही है।यहाँ मैं तकनीक को दो हिस्‍सों में विभाजित करना चाहता हूँ।एक वह जो मनुष्‍य की सहयोगी है और दूसरी वह जो उसका विस्‍तार है।प्रसिद्ध मीडियाविद् मार्शल मकलुहान ने मीडिया की तकनीक को दूसरी श्रेणी अर्थात मनुष्‍य के विस्‍तार के रूप में – रखा है।उनकी प्रसिद्ध पुस्‍तक है  Understanding Media: An Extension of Man.यानी मीडिया मानवी क्षमता का विस्‍तार है। यह दूसरी श्रेणी की तकनीक अपनी खूबियों के साथ मनुष्‍य को खिलवाड़ करने का अवसर भी प्रदान कर देती है। हमारा समकालीन मीडिया दरअसल इसीप्रकार की कवायद को अधिक अंजाम दे रहा है जिसके परिणाम हमारे लिए वांछनीय नहीं हैं। यही कारण है कि मीडिया की वैकल्पिक तकनीक की खोज आवश्‍यक हो जाती है। इस आलेख का उद्देश्‍य वस्‍तुत: इसी मुद्दे पर रोशनी डालना है।
तो सवाल उठता है कि मनुष्‍य संप्रेषण क्‍यों करता है ? उसकी सूचना,मनोरंजन और शिक्षा संबंधी आवश्‍यकताओं को कैसे परिभाषित करना चाहिए ? क्‍या यह एक हीडोनिस्‍ट (सुखवादी) प्राणी मात्र है। यदि ऐसा है तो वह अन्‍य जीवों से अलग कैसे है ? वास्‍तव में मनुष्‍यता, विविधता का ही अलग नाम है। हम जैविक धरातल पर एक-से दिखते हुए अलग-अलग विचारों, भावनाओं,बोधों से परिचालित होते हैं। इस स्थिति में हमारा शरीर महज एक उपकरण मात्र बनकर रह जाता है। संवेदनाओं का सेंसर भर। इसलिए हम एक से दिखते हुए बहुधा अलग होते हैं, लेकिन इतना भी नहीं कुछ साझा ही न कर सकें। संचार,दरअसल, तभी संभव हो पाता है जब वह साझेपन और विविधता को समझे और इनमें संतुलन बिठाए। हुआ यह है कि साझापन तो मान लिया गया है परंतु विविधताओं की अवहेलना होती चली गयी है। हमारे जनसंचार के सिद्धांत-चाहे वह विज्ञापन हो, सिनेमा हो या अन्‍य किसी कार्यक्रम से संबंधित हो वैशिष्‍ट्य को नकारते हैं और जनमाध्‍यमों को एक ‘मास’ के प्रति जवाबदेह मानते हैं। अब थोड़ा एम.एन. श्रीनिवास के संस्‍कृतिकरण के सिद्धांत की ओर चलें । उनका मानना है कि समाज के अभिजात वर्ग की संस्‍कृति धीरे-धीरे आम लागों की संस्‍कृति बन जाती है। जनसंचार माध्‍यम चूँकि तकनीक और पूँजी से संचालित होते हैं,अत: वे अपने संदेश का निर्माण अभिजात्‍य वर्ग के लिए ही करते हैं। इस प्रकार जन माध्‍यम आम लोगों,जनसाधरण का माध्‍यम न होकर अभिजन माध्‍यम बन जाता है और अपना अंतर्विरोध प्रकट करता है। इसी अंतर्विरोध से वैकल्पिक मीडिया की संभावना निर्मित होती है और आम आदमी उसकी जरूरत महसूस करता है।
हमारी सभ्‍यता की दौड़ एक रेखीय (linear) हो रही है,इसलिए जनमाध्‍यम, अभिजन-माध्‍यम में तब्‍दील होते जा रहे हैं। सभ्‍यता को बहुआयामी बनाए बिना हम जनमाध्‍यमों का चरित्र नहीं बदल सकते। लेकिन हम गणित के कुछ सवालों को हल करने की तरह उल्‍टी दिशा से भी शुरुआत कर सकते हैं, और यहीं से मीडिया की जवाबदेही और वैकल्पिक मीडिया की संभावना बनती दीखती है। 
मीडिया भी सभ्‍यता के निर्माण का महत्‍त्‍वपूर्ण घटक है। वह हमारी जीवन शैली,मनोविज्ञान और सामाजिक व्‍यवहार को प्रत्‍यक्ष रूप से प्रभावित करता है। वह हमें इस बात के लिए तैयार कर सकता है कि काम लायक पैसे बिना आपाधापी के जीवन का शुकुन अकुंठ भाव से तलाशा जा सकता है। मुख्‍यधारा के मीडिया का न तो यह लक्ष्‍य है और न ही उसमें ऐसी क्षमता। क्‍योंकि वह खुद पूँजी के बल और आपाधापी के सिद्धांत पर टिका हुआ है। इसलिए यह काम वै‍कल्पिक माध्‍यमों के जरिए ही संभव दीखता है। इन माध्‍यमों की पहचान कैसे की जा सकती है,इस पर ध्‍यान दना जरूरी है। कम पूँजी,साधारण तकनीक और आम लोगों तक पहुँच इसकी प्रारंभिक खासियत हो सकती है।
विकीपीडिया पर इसको चिह्नित करते हुए कहा गया है कि-
For a medium to be considered “alternative”, it must possess some kind of counter-hegemonic quality. The counter-hegemony should be represented through at least one of the following parameters:
  • Content – what is being “said” 
  • Aesthetical form – the way it is being said 
  • Intention – the point of success 
  • Organizational structure – how the media are being run 
  • Process - the relationship between production and consumption of information 

आइए देखें कि इन कसौटियों पर कौन से माध्‍यम खरे उतरते हैं।
लघु पत्रिकाएँ
छोटे और आँचलिक समाचार पत्र
कम्युनिटी रेडियो
समानांतर सिनेमा
वृत्तचित्र
एसएमएस
समूह मेल और ब्लॅाग जैसे इंटरनेट आधारित मीडिया
मैं इस आलेख में इंटरनेट आधारित मीडिया की चर्चा पर केंद्रित रहूँगा। इसके पाँच कारण हैं।
1-इसका किफायती होना
2-सहभागिता में बराबरी
3-तुरंतापन
4-भौगोलिक और ऐतिहासिक सीमाओं का नकार
5-विभिन्‍न घटकों का समाहार
जहाँ अन्य माध्‍यम जैसे कि पत्र-पत्रिकाएँ, वृत्‍तचित्र,सिनेमा और कम्युनिटी रेडियो आदि के संचालन के लिए एक भौगोलिक स्‍पेस की जरूरत होती है,वहीं इंटरनेट आधारित माध्‍यमों के लिए यह जरूरत नगण्‍य है।एक सामान्‍य कंप्‍यूटर और इंटरनेट कनेक्टिविटी भर से आप अपना माध्‍यम विकसित कर सकते हैं।आज बाजार में 25000-30000  रूपये में कंप्‍यूटर उपलब्‍ध हैं और लगभग 500 रूपये प्रतिमाह की दर से इंटरनेट की ठीक-ठाक कनेक्टिविटी प्राप्‍त की जा सकती है। मात्र इतने निवेश से आप हम वैश्विक स्‍तर पर विचारों का संप्रेषण और पहुँच सुनिश्चित कर सकते हैं।
दूसरी बात यह कि पत्र-पत्रिकाएँ, वृत्‍तचित्र,सिनेमा और कम्युनिटी रेडियो आदि में हम संदेशों के उपभोक्‍ता होते हैं और उसके निर्माण में हमारी भागीदारी कमतर ही होती है। हाँलाकि संपादक के नाम पत्र और श्रोताओं की फरमाइश जैसे स्‍पेस वहाँ मौजूद हैं परंतु यहाँ सहभागिता में बराबरी का अवसर नहीं हैं। इंटरनेट आधारित माध्‍यम में हम सूचनाओं और संदेशों के उपभोक्‍ता और निर्माता दोनों साथ-साथ और बराबरी के स्‍तर पर होते हैं। इसलिए यह माध्‍यम हमें एक नयी दिशा देता है।
तीसरा बिंदु यह है कि जहाँ अन्य माध्‍यमों में कार्यक्रम निर्माण और उनके संप्रेषण में अधिक समय लगता है वहीं इंटरनेट आधारित तकनीक में यह बेहद कम समय में संपन्‍न किया जा सकता है।आपको प्रतिक्रिया पाने और देने में बस कुछ सेकेंड्स ही लगते हैं।साथ ही सूचनाओं और संदेशों तक पहुँच में हम अपने सुविधानुसार समय/फुर्सत के क्षणों का उपयोग कर सकते हैं।
इनकी एक खासियत यह भी है कि ऐसे माध्‍यम इतिहास और भूगोल की बाधाओं को नकार देते हैं। हम आसानी से पिछले अंकों को पढ़/देख/सुन सकते हैं  और एक ही झटके में ज्ञान के किसी दूरदराज संग्रहालय में भी दाखिल हो सकते हैं।
जहाँ तक ऐसे माध्‍यमों पर संदेश-निर्मिति और प्रस्तुति का सवाल है तो यहाँ शब्‍द, ध्‍वनि, चित्र और गतिशील दृश्‍यों (वीडियो और एनीमेशन आदि) को सहजता से अंतरयोजित किया जा सकता है। इससे संदेश की प्रभावोत्पादकता और संप्रेषणीयता बढ़ जाती है।
इस प्रकार उपलब्‍ध वैकल्पिक माध्‍यमों में कंप्‍यूटर और इंटरनेट आधारित माध्‍यम हमारे विचारों,विमर्शों के लिए एक महाद्वार खोलते हैं। इनकी उपयोगिता इराक युद्ध और कुछ माह पूर्व पाकिस्‍तानी तानाशाही के दौरान लक्षित की गई। आज जब भी विपत्ति का दौर किसी देश और समाज पर आता है और अन्‍य माध्‍यम बंदिशों के शिकार हो जाते हैं तो यह माध्‍यम हमारा सबसे बड़ा सारथी बन कर प्रकट होता है।
इस दिशा में एक नया आयाम विगत दिनों शुरू हुई 3 जी फोन सेवाएँ हैं। मोबाइल मीडिया एक बिल्‍कुल नयी आजादी के साथ हमारे बीच लोकप्रिय होने की दिशा में सक्रिय है। 
दरअसल मीडिया का चरित्र हमारी जीवन-शैली का ही उत्‍पाद है। इसलिए हम अपने जीवन में यदि उपभोक्‍तावादी,सुविधापरस्‍त और उपयोगितावादी हैं तो हमारा मीडिया उसी की प्रतिछाया बनकर उभरेगा। जब समाज एक विभाजित पहचान बनाए रखेगा तो मीडिया को बराबर यह अवसर मिलेगा कि वह अपने मनोरंजन,सूचनाओं और समाचारों को उन वर्ग-अभिरूचियों तक सीमित रखे जो उसे लाभ पहुँचाती हों।भले ही वंचित समूहों के मुद्दे,सरोकार,समस्‍याएँ उसमें संबोधित न हों।
जब दुनिया में सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान और बहुराष्‍ट्रीय निगम एकजुट हो रहे हैं तो आम आदमी के संगठन के निर्माण और एकजुटता को सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक मीडिया का सार्थक उपयोग किया जा सकता है। वैकल्पिक मीडिया की रचनात्‍मकता इस बात में छिपी है कि वह उन लोगों के बीच विचारों,अनुभवों और समस्‍याओं का साझापन पैदा करे जो विखरे हुए और  असंगठित हैं। 

बाधाएँ और समाधान-संकेत
फिलहाल इंटरनेट आधारित माध्‍यम अपने प्रयोगशीलता के दौर से गुजर रहा है। इसीलिए इन माध्‍यमों पर निजता की अभिव्‍यक्ति का बोलबाला है।यह कुछ इसी तरह है जैसे पहले-पहल किसी ने कागज़ पर फाउंटेन पेन से कुछ लिखा हो और लागों ने उसे जादू की संज्ञा दी हो।पर आज यह एक सामान्‍य काम ही है। वैसे ही इंटरनेट तकनीक और माध्‍यम से जुड़ाव भर उसे वैकल्पिक मीडिया नहीं बना सकता जब तक कि आपकी सोच,नजरिया और दर्शन वैकल्पिक न हों।
आइए, इसे एक त्रिभुज की सहायता से समझें।
इसमें आधार को सामाजिक संरचना, लंब को जीवन-मूल्य  और कर्ण को मीडिया-तंत्र के रूप में दर्शाया गया है। लंब के आड़े-तिरछे होने से कर्ण में लोच पैदा होना स्‍वाभाविक है। हमारा जीवन-मूल्‍य मीडिया-तंत्र की गतिविधि को संचालित-प्रभावित करता है।  


वैकल्पिक मीडिया तभी विकसित, कारगर,जीवंत और प्रभावशाली हो सकता है जब वैकल्पिक सभ्‍यता का स्‍वप्‍न हमारे पास हो और हम अपने जीवन में वैकल्पिक मूल्‍यों की तलाश का उपक्रम कर रहे हों। इस सपने के अभाव में हर माध्‍यम-चाहे वह मुख्‍यधारा का हो या वैकल्पिक, सूचनाओं का दलदल मात्र बनकर रह जाएगा।

डॉ.राम प्रकाश द्विवेदी
फेलो(हिंदी)
जीवन पर्यंत शिक्षण संस्‍थान
दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय

20 सितंबर, 2015

भक्ति कविता, राजनीति अौर वैश्वीकरण


श्रीअरबिन्दो महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय-संगोष्ठी,  वैश्वीकरण अौर भक्ति-कविता,18-19 सितम्बर 2015 में प्रस्तुत आलेख


भक्ति कविता भारतीय साहित्य इतिहास की एक केन्द्रवर्ती धारा रही है। भारत की सभी प्रमुख भाषाअों समेत अनेक बोलियों अौर उपबोलियों तक में भक्ति कविता की उपस्थिति मिलती है। समय के अंतराल के साथ उत्तर से दक्षिण अौर पूर्व से पश्चिम तक समूचे भारत में इसकी व्याप्ति है। आठवीं शताब्दी से लेकर ईसा की पन्द्रहवीं शताब्दी भक्ति कविता के अंश बिखरे पड़े है। अनेक इतिहासकारों की मतभिन्नता के बावजूद अब हिन्दी के भक्तिकाल के कालखण्ड को सुनिश्चित कर लिया गया है। यह अालेख हिन्दी की भक्ति कविता की परिसीमा के भीतर राजनीतिक बोध अौर वैश्वीकरण की प्रक्रिया का अवलोकन करेगा जिसमें स्वाभावत: अन्य भारतीय भाषाएँ संदर्भ के तौर पर मौजूद रहेंगी।
भक्ति कविता के तीन केन्द्रीय सरोकार रहे हैं-जीव, संसार अौर ब्रह्म। चौथा महत्वपूर्ण संबोधन आत्मा के प्रति है जो जीव के भीतर ही विद्यमान है अौर उसका उन्नत अंश है यानी हम जीव को जीवात्मा भी कह सकते हैं जिसमें शुभ-अशुभ का मिश्रण है। दूसरी अोर ब्रह्म पूरी तरह शुद्ध है अौर अगम, अगोचर, अदृश्य है, निराकार भी है। संसार दृश्य, ठोस अौर भौतिक है अौर जीवात्मा इसके भीतर इसे सच मानकर सक्रिय है। जिसका प्रतिवाद भक्ति कविता करती रहती है लेकिन इसी में भक्ति कविता की रणनीति, ऊहापोह अौर संसार के प्रति आसक्तियाँ झलकतीं हैं। अर्थात ब्रह्म एक रणनीति के रूप में मौजूद होकर संसार अौर जीवात्मा का संचालन करता है। तो क्या ब्रह्म-सत्ता ही आज की राजनीतक सत्ता की प्रतिनिधि थी अौर उसकी खगोलीय व्याप्ति का आज के वैश्वीकरण से क्या संबंध बनता है? 
आधुनिक विश्व में सामाजिक नियमन की शक्ति राजसत्ता के हाथों में है, मध्यकाल में यह धर्मसत्ता के अधीन थी। राजा कमोवेश धर्म के अधीनस्थ ही  माना जाता था। इसलिए भक्ति कविता मूल्य निर्माण से जुड़ती है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के संचालन का दिशा-निर्देश सम्मिलित होता था। तुलसीदास अपनी रामायण लिखते हुए ‘रामराज्य’ की जिस अवधारणा का प्रतिपादन करते हैं वह राजधर्म अौर प्रजा की चिंताअों को एक साथ आलोकित करता है। प्रसिद्ध विचारक अौर राजनेता डॉ० राम मनोहर लोहिया ने  धर्म अौर राजनीति के इसी सह-संबंध को समझने की कोशिश करते हुए लिखा कि ‘धर्म अौर राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है अौर राजनीति अल्पकालीन धर्म। धर्म श्रेयस की उपलब्धि का प्रयत्न करता है, राजनीति बुराई से लड़ती है’। भक्ति कविता का ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। वह एक सुपर सत्ता है जिसे प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता। वह निर्गुण तानाशाह तो है पर मानवीय भी। उसकी तानाशाही की ताकत का भय दिखाकर भक्त कवि संसार के ताकतवर जमातों को करुणा अौर मानवता को संदेश देते हैं। सांसारिक नश्वरता के अनेक दृष्टांतों के बल पर वे अपने समय की राजनीति अौर राजाअों पर एक गहरा दबाव बनाते हैं अौर जनहित में सोचने की दिशा में प्रेरित करने का उद्यम रचते हैं। ध्यान देना होगा कि तत्कालीन राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित नहीं होती थी। इसलिए उसे नियंत्रित करने अौर संयमशील बनाए रखने के लिए जरूरी था कि उससे भी बड़ी किसी शक्ति का ईजाद। ब्रह्म इसलिए भक्त कवियों का एक महान आविष्कार था जिसके माध्यम से राजा की ताकत, निरंकुशता अौर अत्याचार को लगाम लगा सके तो दूसरी अोर पंडे-पुजारियों-मौलवियों के पाखण्ड अौर अंधविश्वास से आम जनता को बचा सके। यह ब्रह्म काल-भूगोल निरपेक्ष भी था इसलिए विश्वमानव (या मानवमात्र) के कल्याण से जुड़ा था। वैश्वीकरण का एक रूप इसमें भी तलाशा जा सकता है जो आज की बाजारवादी अवधारणा से अलग जरूर है पर पूरी तरह विच्छिन्न नहीं।
अनेक विद्वानों का मानना है कि भक्त-कवि अपने विचारों तक सीमित थे। इस संदर्भ में तुलसी की ‘माँगि के खाब मसीत मा सोउब, लैबे का एक न देबै का दोऊ’ अौर कुंभन का ‘संतन कहाँ सीकरी सो काम’ जैसी उक्तियों का उदाहरण पेश किया जाता है। इन कथनों में निश्चय ही राजसत्ता के प्रति निरपेक्षता का भाव मिलता है। पर यह निरपेक्षता किन कारणों से है वह अधिक गहरा है।
दरअसल राजशाही वाली सत्ताएँ आत्मकेंद्रित थी। स्वयं की सुख-सुविधा में लिप्त अौर आत्मप्रशंसा की भूखी। झूठे स्वाभिमान के लिए युद्ध में सन्नद्ध। ऐसी राजनीति से आम आदमी अौर मानव समाज का कोई भला न हो सकता था। इसका ठोस उदाहरण जायसी अपने ‘पदमावत’ में रतनसेन अौर अलाउद्दीन के रूप में करते हैं। दोनों ही राजा हैं अौर दोनों ही आत्मकेन्द्रित एवं लिप्सा के वशीभूत होकर अपनी गतिविधियाँ संचालित करते हैं। अन्तत: दोनों के ही हाथ निराशा लगती है। इसका विकल्प तुलसी के ‘रामचरित मानस’ में मिलता है। जिसका उद्देश्य ‘परहित सरिस धरम नहि भाई’ है। ‘मानस’ में अन्तत: ‘रामराज्य’ का विज़न मिलता है। जहाँ जायसी तत्कालीन राजाअों की वास्तविक मनोवृति का वर्णन करते प्रतीत होते हैं, वहीं तुलसी एक वैकल्पिक व्यवस्था का स्वप्न रचते है जो तत्कालीन राजाअों के लिए एक सशक्त संदेश देता प्रतीत होता है। निर्गुण या सगुण राम, कृष्ण अौर आदि ब्रह्म तत्कालीन राजाअों या राजसत्ताअों के विकल्प की तलाश हैं इसलिए भक्ति कविता इनके गुणगान में पन्ने दर पन्ने रंगते चली जाती है। खास बात यह है कि अनेक मुस्लिम कवियों ने भी सगुण हिन्दू रूपों की गाथाएँ लिखी हैं। इसके कारणों को राधाकुमुद मुखर्जी के इस उद्धरण से जाना जा सकता है, ‘हिन्दू धर्म समन्वयात्मक एवं सर्वग्राही रूप से व्यापक है; उसका दर्शन-शास्त्र विश्वजनीन है, उसका कोई परिमित या सीमाबद्ध लक्षण या व्याख्या भी नहीं है।xxx इन कारणों से हिन्दू धर्म अपरिमित मनुष्यों का सर्व-सामान्य धर्म बन गया है जो जाति-भाषा, राजनीतिक गठन, सामाजिक परंपरा अौर रुचियों में एक दूसरे से बहुत भिन्न है’। शायद इसी आत्मसाती वृत्ति ने भारत के अनेक धर्मावलंबियों की अपनी अोर आकृष्ट किया। इसलिए भारत में आक्रमणकारियों का प्रवेश तो हुआ पर उनके साथ जो संवेदनशील चेतना पहुँची वह भक्ति के रस सराबोर हो गयी।
इस आंदोलन अौर कविता को आधुनिक काल में पहचानने का प्रारंभिक उद्यम जॉर्ज ग्रियरसन किया ने किया अौर वे लगभग ‘कन्फ्यूज़’ से दीखते हैं। इसलिए उन समेत अनेक पश्चिमी विद्वानों को यह आंदोलन ईसाइयत से प्रभावित अौर ‘बिजली की चमक के समान अचानक’ उठ खड़ा दिखाई देता है। क
कहना न होगा कि यह किसी भी योरोपीय आंदोलन से वृहद था इसलिए पश्चिमी विद्वान ईसाइयत से इसका नाता जोड़ने का लोभ वरण न कर सके। बाद में चलकर फादर कामिल बुल्के ने तुलसी-साहित्य के अध्ययन अध्यापन में ही अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। भक्ति कविता की विश्वजनीनता का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। इसी तरह के दृष्टांत का उल्लेख सुवीरा जायसवाल ने किया है जो भक्ति कविता के स्रोत भागवत धर्म के बारे में है। वे लिखती हैं कि, ‘भागवत मत का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण मध्यप्रदेश में पाया जाता है। भागवत धर्म के इतिहास में बेस नगर के गरुड़-स्तंभ अभिलेख की खोज एक महत्वपूर्ण तथ्य है। उक्त अभिलेख में ग्रीक राजदूत हेलिअोडोरस के द्वारा, जो अपने को भागवत कहता है तथा तक्षशिला का निवासी बताता है देवाधिदेव वासुदेव के सम्मान में एक गरुड़ ध्वज के संस्थापन का उल्लेख है’। इस प्रकार वैष्णवा के 
प्रति आकर्षण विश्व में अत्यंत प्राचीन काल से ही रहा है जिसकी पीठिका पर भक्ति काव्य का उदय होता है।
वैश्वीकरण में पाँच बातें प्रमुख होती हैं-

१. सूचना, विचार अौर ज्ञान की त्वरित एवं विश्वव्यापी पहुँच
२. वस्तुअों की व्यापक उपलब्धता
३. पूँजी का प्रवाह
४. सांस्कृतिक-उत्पादों का विश्वस्तरीय प्रसार, अौर
५. मानव-प्रवास

वैश्विक जनता में भारतीय जीवन मूल्यों का गहरा प्रसार है। कोई भी सशक्त आंदोलन कुछ मूल्यों को समाज में छोड़कर विलुप्त हो जाता है। अहिंसा, सहभाव, सामरस्य, सहिष्णुता, करुणा अौर परोपकार ऐसे ही मूल्य थे जो भक्ति आंदोलन के गर्भ से निकल कर आम लोगों तक पहुँचे अौर हमारे संविधान तथा राजनीति का हिस्सा बने। इन मूल्यों में से अधिकांश आज संयुक्त राष्ट्र एवं यूनीसेफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाअों के मार्ग-दर्शक सिद्धांतों के रूप स्वीकृत हो चुके हैं। इन्हीं मूल्यों को आधार बनाकर भारतीय मनीषा ने अपना आजादी का आंदोलन लड़ा। जब अंग्रेजों अपने द्वीपीय उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों को छोड़ दिया तब यही मूल्य उनके जीवन-रक्षक बने। आज मानव-प्रवास के नजरिए से देखें तो भक्ति-कविता का प्रसार-प्रभाव पूरी दुनिया में उपस्थित विभिन्न प्रकार के मंदिरों, स्थानीय धार्मिक समूहों के रूप में दिखाई देता है। प्रवासी भारतीय समाज आज चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है। जो अपने साथ भक्ति-कविता के मूल्य लेकर गया अौर उसे सँजोए हुए है। अमरिका, कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, त्रिनिडाड, सूरीनाम, मॉरीशस अौर फीजी जैसे देशों में भारतीयों की विपुल उपस्थिति अौर वहाँ स्थापित देवालयों में भक्ति-कविता के साकार रूपों का दर्शन होता है। अनेक देशों, जिनमें गिरमिटिया देश प्रमुख हैं, में तुलसी की रामायण वैसे ही प्रसिद्ध है, जैसे भारत में। एक आँकड़े के मुताबिक  1 जनवरी 2015 को प्रवासी भारतीय लोगों की संख्या दो करोड़ चौरासी लाख पचपन हजार छब्बीस (2,84,55,026) है। यह आबादी लगभग कनाडा की समूची आबादी के बराबर है।इतनी बड़ी संख्या में लोगों को भावनात्मक संबल प्रदान करने का काम भक्ति जनित जीवन मूल्य ही कर रहे हैं।दैनिक जीवन के तनाव कम करने अौर अपने आदर्श की तलाश में अनेक प्रवासी भारतीय आज भी भक्ति-कविता से मुखातिब होते हैं। 
राजनीतिक जीवन धर्म के अभाव में बंजर हो जाता है। राजनीति में नीति का तत्व धर्म से ही आता है। इसे भारत के दो मनीषियों, गाँधी अौर लोहिया, ने बखूबी पहचाना था। गाँधी, राजनेता अौर वैष्णव भजन गायक दोनों एक साथ हैं। वे सुबह उठकर प्रार्थना करते थे, दिन में अंग्रेजों से लड़ते थे अौर शाम को वैष्णव भजन गाते थे। आज गाँधी के विचार विश्व समुदाय में समादृत हैं। अब उनके जन्मदिवस दो अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया गया है जिसे पूरी दुनिया के लोग मनाते हैं। अहिंसा, भक्ति कविता की मूल थाती थी जिसे गाँधी ने अपने विचार अौर आचरण से पुन: अन्वेषित किया था । वे ऐसे श्लाका पुरुष के रूप में मौजूद हैं जहाँ भक्ति, राजनीति अौर वैश्विकता की अनुगूँज एक साथ सुनी जा सकती है। 




06 सितंबर, 2015

हिन्दी की आरंभिक पत्रकारिता अौर स्त्री आंदोलन



हंसराज महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘जनसंचार माध्यम अौर हिन्दी भाषा’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में प्रस्तुत। 28-29 जनवरी, 2010




                                                         -राम प्रकाश द्विवेदी

 स्त्रियों का वास्तविक आंदोलन 19 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में आरंभ होता है जब पंडिता रमाबाई, रमाबाई रानाडे, आनन्दीबाई जोशी , फ्रानना सारोबजी, एनी जगन्नाथन, रुक्मा बाई , स्वर्ण कुमारी देवी, इसमें सक्रिय होती हैं। काशी बाई, कान्तिकर ने 1890 के समय में (पहली महिला उपन्यासकार) लेखन आरंभ किया। इन्ही दिनों माई भगवती (हरियाणा) जो आर्य समाज से जुड़ी हुई महिला उपदेशिका भी ने विशाल जनसभा को संबोधित किया था ।दैनिक ‘ ट्रिबयून’ ने इस पर टिप्पणी करते हुए अपने संवाददाता की रिपोर्ट छापी जिसमें कहा गया था कि “ माई भगवती के उपदेश के पश्चात हरियाणा के किसी भी घर में अच्छी तरह पका हुआ भोजन पा लेना कठिन हो गया है। लोग बदहजमी के डर से हरियाणा में ठहरने से कतराते हैं।” घरेलू कामकाज से बाहर निकलने और व्यापक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिशे अब आरंभ हो गयी थी। मीडिया में इन खबरों की अनुगूँज होने लगी थी। इसी प्रकार जन आंदोलन के संचालन की पहली मिसाल मनोरमा  मजूमदार (ब्रह्म समाज) के द्वारा मिलती है जो काफी विवादस्पद रही परंतु बाद में उसे स्वीकार कर लिया गया। राजनीतिक क्षेत्र में 1900 में कलकत्ता में संपन्न कांग्रेस के 16 वें अधिवेशन के समापन पर इसकी प्रथम महिला प्रतिनिधि श्रीमती कादम्बिनी बाई गांगुली ने अध्यक्ष को धन्यवाद ज्ञापन कर मंचीय उपस्थिति दर्ज करायी।  इस प्रकार, 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्रियों का  आंदोलन उनके अपने हाथों में आने लगा था और पितृसत्ता से मुक्ति के चिन्ह उसमें अनायास समाविष्ट होने लगे थे।
                            तत्कालीन मीडिया परिदृश्य पर ध्यान देने पर स्त्री विषयक दो परिदृश्य साफ- साफ उभरते हैं- १. पुरुष सुधारवादी नजरिया और २. स्त्रियों की आत्माभिव्यक्ति । पुरुष सुधारवादी नजरिया उस समय के विभिन्न पत्रों एवं पत्रिकाओं में व्यक्त होता रहा है जवकि स्त्रियों का अपना स्वर कुछेक स्त्री-केन्द्रित पत्रिकाओं तक सिमटा हुआ था, जिसे जानना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इन्हीं छोटी-छोटी पत्रिकाओं के माध्यम से स्त्री का स्वर उभरा और पितृसत्ता से मुक्ति और स्वायत्त चिंतन की दिशा में वे अग्रसर हो सकीं। ब्रह्म समाज के संरक्षण में एक महिला पत्रिका ‘वामाबोधिनी’ (1863) आरंभ हुई थी। इसी प्रकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्त्री शिक्षण हेतु 1874 में ‘बाला बोधिनी’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। महिलाओं पर केन्द्रित इन पत्रिकाओँ का संचालन चूँकि पुरुष करते थे, इसलिए इनसे स्त्री आंदोलन का सिलसिला विकसित न हो सका। इसका कारण हम 1852 में आगरा से प्रकाशित ‘बुद्धि प्रकाश’ (सं० सदासुख लाल) के इस उद्धरण में देख सकते है-”स्त्रियों में संतोष, नम्रता और प्रीत यह सब गुण कर्ता ने उत्पन्न किए हैं। केवल विद्या ही की न्यूनता है जो यह भी होती तो स्त्रियाँ अपने सारे ऋण से चुक सकती हैं  जो स्त्री विद्या से विहीन है वह बालकों के चित्त रूपी क्षेत्र में विद्या का बीज कैसे बो सकती है और उनके आगे की बुद्धि का कारण किस रीति से हो सकती है’” ( अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, समाचार पत्रों का इतिहास,पृ०112)। तत्कालीन समाज सुधारकों के केन्द्र में स्त्री की शिक्षा और घर-बार का उसकी भूमिका के लिए नारी को तैयार करना था। राजनीतिक और आर्थिक स्वातंत्र्य अभी भी उसके दायरे से बाहर ही थे।
                         रामेश्वरी नेहरू ने 1909 में प्रयाग महिला समिति का गठन किया और ‘स्त्री-दर्पण’ नामक गंभीर पत्रिका की शुरुआत भी हुई। यह पत्रिका हिंदी प्रदेश की स्रीवादी आंदोलन की मुख्य पत्रिका बनी। हिन्दी क्षेत्र  में स्त्रियों को लेकर छ: प्रमुख समस्याएँ उन दिनों चर्चित हो रही थीं- १. परदा प्रथा २. विधवा विवाह ३. बाल विवाह ४. मृत स्त्रीक विवाह ५. स्त्री शिक्षण और ६. राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न। इन सभी विषयों पर विपुल सामग्री इस पत्रिका में छपती थी। राजनीतिक अधिकारों का विषय स्वाधीनता आंदोलन का परिणाम था शेष पुराने विषय थे जिन्होंने पुरुष सुधारवादियों ने पहले भी उठाया था। अपने लेखों में सौभाग्यवती (आधुनिक पर्दा प्रणाली तथा उससे हानियाँ, अगस्त,1918) में पर्दे को इस्लामी शासन का परिणाम सिद्ध करती हैं और उसे स्त्री की प्रगति और शिक्षा और अन्य सवालों के साथ जोडती हैं। सत्यवती के लेखों में एक महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि स्त्रियों को आपसी समझदारी और मेल जोल बढ़ाना चाहिए जो समकालीन नारीवादी आंदोलन का बीज क्षेत्र है। इसी प्रकार मृत स्त्रीक यानी पत्नी के मर जाने के बाद पुरुष का दूसरा विवाह, इसके विभिन्न पहलुओं में प्रकाशित हुआ एक लेख- हुम्मा देवी का अगस्त, 1917 के ‘स्त्रीदर्पण ‘ में प्रकाशित हुआ। वे लिखती है कि- पशु अथवा पक्षी पालने वाले पुरुष को उसके मरने अथवा उड़ जाने पर अधिक शोक होता है पर अपनी पत्नी के रोगग्रस्त होने अथवा मरने पर उतना भी नहीं; क्योंकि स्त्री पैर की जूती है। फट गयी तो नई आ जाएगी।” ‘स्त्री दर्पण’ में लेख ही नहीं पाठकीय प्रतिक्रियाओं में भी इस समस्या को उठाया गया। फरवरी 1918 के अंक में कोटा की श्रीमती गुलाब देवी चतुर्वेदी का सम्पादिका के नाम एवं रोचक पत्र छपा था-” मृत स्त्रीक पुरुषों  को ढूँढ-ढूँढ कर कन्याएँ ब्याही जाती हैं। कन्या है 15 वर्ष की और हमारे वर या दूल्हा जी 60 वर्ष के क्या ऐसी सुंदर जोड़ी भी कभी खराब मालूम होती है? धन्य है!धन्य है!!”  महिलाओं के लेखन में व्यंग्य और वेदना का गहरा समावेश होने लगा था। वे अपनी अभिव्यक्तियों के लिए सक्रिय होने लगी थी। ‘स्त्री दर्पण’ जैसी पत्रिकाओं ने उन्हें संगठित होने और अनुभव का साझा करने की दिशा में प्रेरित किया। विधवा विवाह के प्रश्न को लेकर भी ‘स्त्री दर्पण’ में रामेश्वरी नेहरू ने एक संपादकीय ( मई, जून 1919)में लिखा कि -” जो विधवाएँ देवी पद पर सुशोभित रहकर निष्काम धर्म की मूर्तिमती देवी बनी हैं वे हमारी हैं और सारे संसार की पूजनीया हैं। पर प्रश्न है उन बेचारियों का। जो लालसा दमन नहीं कर सकती  और विवाह के लिए तरसती हैं।” इस संपादकीय टिप्पणी में वैधव्य झेलने की गरिमा भी है तो साथ में उससे मुक्ति की चाह भी। इसी द्वैतपूर्ण मन: स्थिति में यह युग स्त्रियों की धुंधली- सी छवि उभरता है और मीडिया के द्वारा यह विकसित- प्रसारित  होती है। ‘सरस्वती’ और ’मर्यादा’ जैसी पत्रिकाओं में भी स्त्री स्वर बुलंद होने लगा था। स्वराज की माँग में स्त्रियों की बढ़ती शिरकत उनकी राष्ट्रवादी छवि का निर्माण करने लगी। उन्होंने अनेक नागरिक संस्थाओं की स्थापना कर अपने सामाजिक -राजनीतिक दायित्व की निर्वाह की ओर अपना कदम बढ़ाया।       
                          अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद इस युग का महिला स्वर सुधारवाद की गिरफ्त में था और समान अधिकारों की माँग उसमें दब-सी गयी थी। ‘हरिश्चन्द्र चंद्रिका’, ‘हिंदी प्रदीप’,’सार सुधानिधि’,’रचित वक्ता’, ’हिन्दी बंगवासी’, हरिश्चन्द्र मैगजीन’, ’हिन्दोस्थान’, ‘कविवचन सुधा’ ,ने 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा सरस्वती, समालोचक, देवनागर,कर्मयोगी,इन्दु,मर्यादा, प्रताप, प्रभा, स्त्री दर्पण, चाँद, माधुरी, मतवाला, सुधा, विशाल भारत और आदर्श, भारत मित्र, कलकत्ता समाचार और हरिजन सेवक तथा जागरण, ओज, दैनिक हिन्दुस्तान (1936) आदि 20 वीं सदी के पूर्वाद्ध के महत्त्वपूर्ण पत्रों की मदद से ये दुविधाजीवी महिला विचार प्रकाशित होते रहे। महिला संबंधी विचारों की पोषक थीं- पंडिता रमाबाई, रमाबाई रानाडे, आनंदीबाई जोशी, फ़ेकीना सोरण जी, स्वर्ण कुमारी तथा रुस्तम जी फरीदूनजी, हेराबाई टाटा, एममुथ्थुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर, विजय लक्ष्मी पंडित,  कमला देवी चट्टोपाध्याय, बेगम सरीफा हामिद अली सरोबजी आदि। इस युग के नारी आंदोलन पर निम्मलिखित टिप्पणी समीचीन दिखाई देती है- “ आंदोलन की इस स्वीकृति ने कि महिलाएँ  पुरुषों की पूरक भूमिका निभाएँगी पुरुषों के विरोध को कम कर दिया था किन्तु इससे यह आंदोलन सही परिप्रेक्ष्य में उभरकर सामने न आ सका। साथ ही भविष्य में लिंग के आधार पर श्रम विभाजन पर प्रहार करने की पीठिका भी यह तैयार करने में विफल रहा।” ( Jane Matson  Everelte, women & social change in India ,Pg. 66) इसी प्रकार की टिप्पणी अन्यत्र भी अभिजात संस्थानिक राजनीति में भारतीय नारी आंदोलन के उद्भव ने इस नारीवादी  आंदोलन को अनेक महत्त्वपूर्ण तरीकों से स्वरूप प्रदान किया।





जापान में हिन्दी

हंस, सितम्बर २०१५
-       राम प्रकाश द्विवेदी

भाषा एक साथ कई कार्य करती है। जिनमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को सहज ही पहचाना जा सकता है। भारत और जापान को आपस में जोड़ने के लिए बौद्ध धर्म के प्राचीन धागे का उल्लेख तो बहुधा किया जाता है लेकिन आधुनिक समय में हिन्दी ने व्यावसायिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को सक्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभायी है। जापान में हिन्दी के मुख्य आयाम शिक्षण, शोध, अनुवाद, खान-पान, सिनेमा और संस्कृति के क्षेत्रों में पहचाने जा सकते हैं।

जापान के दो विश्वविद्यालयों में हिन्दी की विधिवत पढ़ाई होती है, यानी आनर्स, एम०ए० तथा शोध स्तर तक की। जिसमें एक राजधानी तोक्यो (तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय) और दूसरा विश्व-प्रसिद्ध व्यावसायिक शहर ओसाका (ओसाका विश्वविद्यालय) में स्थित है। दोनों विश्वविद्यालयों में हर साल बीस-पचीस नए विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। छात्रों को पढ़ाने का सिलसिला निश्चय ही वर्णमाला ज्ञान से होता है परंतु अपनी परिपक्व आयु और समझ के चलते वे शीघ्रता से भाषा एवं साहित्य के साथ जुड़ जाते हैं। अब हिन्दी पढ़ने वाले छात्र भारत की बढ़ती हुई अर्थव्यस्था के प्रति अधिक आकर्षित हैं। परंतु कुछेक छात्रों की पारिवारिक, शैक्षणिक पृष्ठभूमि ऐसी होती है जिसके चलते वे भारत और हिन्दी के प्रति अपना रूझान विकसित कर पाते हैं।
उपरोक्त दो विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त तोक्यो विश्वविद्यालय, तोयो विश्वविद्यालय, एशिया विश्वविद्यालय, सोफिया विश्वविद्यालय (जोचि विश्वविद्यालय), तोकाइ विश्वविद्यालय, दाइतो बुंका और ताकुशोबु विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में डिप्लोमा या प्रमाणपत्र स्तर तक की पढ़ाई होती है। अध्ययन का सीधे तौर पर नौकरी से संबंध नहीं होता है। मसलन हिन्दी पढ़ने वाले अनेक छात्र बैंकिग, इंजीनीयरिंग, कॉस्मेटिक आदि कंपनियों में भी जा सकते हैं। इसलिए भाषा-अध्ययन मूलत: स्वेच्छा और आत्म-प्रेरणा से जुड़ा मामला है। कुछेक छात्र अपनी अभिरूचि के चलते अध्ययन को गंभीरता से लेते हैं और आगे चलकर शोध कार्य में सक्रिय हो जाते हैं।
जापान में शोध-कार्य बेहद ईमानदारी, जवाबदेही और निष्ठा से करने का स्वाभाव है।श्रम के प्रति सम्मान दैनिक जीवन का हिस्सा है जो शिक्षण और शोध में भी परिलक्षित होता है।परफेक्शनजीवन का एक सामाजिक मूल्य-सा बन गया है। इसके चलते हिन्दी और भारतीय इतिहास, राजनीति, प्रशासन और समाजशास्त्र के बारे में किए जा रहे शोधों का स्तर काफी ऊँचा है। आश्चर्य होता है कि वे विद्यार्थी जो वर्णमाला से जूझ रहे थे देखते-देखते कैसे भारतीय जनसमाज की गहराइयों से रूबरू होने लगते हैं।इसका उदाहरण कत्सुरो कोगा एवं अकिरा ताकाहाशी द्वारा बनाए गए शब्दकोश को देखकर होता है।इसमें हिन्दी की तमाम बोलियों के कम पहचाने शब्दों को पाकर आश्चर्य हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ हमारे बारे में जापान के लोगों को अधिक पता है। अनेक जापानी विद्वान भारत में महीनों रहकर अपनी शोध-सामग्री का संकलन करते रहते हैं। कुछेक तो एैसे भी हैं जो तथ्यों के मिलान के लिए दुनिया के अन्य देशों के पुस्तकालयों-संग्रहालयों तक की बार-बार यात्राएँ करते हैं। इंटरनेट के ज़माने में भी वे सीधे-स्रोत तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। प्रो०हिदेआकि इशिदा हर छमाही हिन्दी साहित्यनामक पत्रिका का प्रकाशन करते है। इसकी भाषा तो जापानी है परंतु केंद्र में हिन्दी साहित्य होता है। इसीप्रकार ओसाका विश्वविद्यालय में कुछेक वर्ष पूर्व तक ज्वालामुखीपत्रिका का हिन्दी में ही प्रकाशन होता था। जिसकी प्रतियाँ आज भी वहाँ सुरक्षित हैं।

अच्छे शोध के लिए आवश्यक है समृद्ध आधार एवं सहायक सामग्री की उपलब्धता। जापानी पुस्तकालयों में पुस्तकों, पत्रिकाओं, जर्नलों के उपयोगी संकलन मिल जाते हैं। उदाहरण के लिए तोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय की लायब्रेरी में अनेक रचनाओं के प्रथम संस्करण मिल जाते हैं। गोदानका पहला संस्करण भी यहाँ उपलब्ध है। इसीप्रकार जागरणमाधुरी और हंस(नया) की पूरी जिल्दों को यहाँ देखा-पढ़ा जा सकता है। हिन्‍दी की दुर्लभ सामग्री की उपलब्‍घता को लेकर प्रो0 फुजिइ ताकेशी ने एक  सुंदर लेख लिखा है। अब फ़िल्मों और वृत्तचित्रों की डीवीडी की खरीद के काम में भी तेजी आयी है और एक अच्छा कलेक्शन तैयार हो रहा है। पिछले साल से भारतीय मीडिया और भारतीय सिनेमा का अध्यापन शुरू हुआ तो हिन्दी की डिजिटल सामग्री की व्यापक जरूरत महसूस हुई है। पुस्‍तकालय अच्छे शोध की रीढ़ होता है जो जापान के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में बड़े कायदे से व्यवस्थित किए जाते हैं। अध्ययन सामग्री ढ़ूढ़ने में बहुत कम समय और ऊर्जा लगती है।यहाँ के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की प्रचुर सामग्री और उसे इंटैक्ट देखकर आश्चर्य होता है।

जापानी भाषा में हिन्दी की अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद हो चुका है। प्रेमचंद की कहानी क़फनके दो-तीन अनुवाद मिलते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की तीसरी कसमका भी बेहतर अनुवाद मिलता है। भगवतीचरण वर्मा  के उपन्यास चित्रलेखाका अनुवाद भी बड़े जीवंत रूप में उपलब्ध है। हिन्दी के प्रसिद्ध जापानी विद्वान तोशियो तनाका जी ने भीष्म साहनी के तमसका मार्मिक अनुवाद कर जापानी समुदाय को भारत विभाजन की त्रासदी से परिचित कराया है। उन्होंने ही साहनी जी की दूसरी रचना बलराज:मेरा भाईका भी जापानी अनुवाद किया है। अभी पता चला है कि इसके अनुवाद के सिलसिले में उन्होंने भीष्म जी से कई बार पत्राचार किया था। लगभग २४ पत्र अभी उनके पास सुरक्षित हैं जो अब एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन चुके हैं। ये पत्र अब तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, आशा है वे जल्द ही प्रकाश में आएँगे। इसीप्रकार अनेक अन्य हिन्दी रचनाओं के रोचक, पठनीय और संप्रेष्य अनुवाद जापानी भाषा में उपलब्ध हैं।

जापान में लोग अधिकांशत: घर के बाहर खाना खाते हैं। अतिथियों को भी रेस्त्रां में ही बुलाकर भोजन करवाने का प्रचलन है। यहाँ दक्षिण एशिआई देशों में गहरी मित्रता देखने को मिलती है। क्योंकि परंपरा से लोग भारत से ही परिचित हैं, इसलिए नेपाल, पाकिस्तान और बंग्लादेशी रेस्त्राँ भी भारतीय रेस्त्राँ के नाम अपना लेते हैं। साथ ही भारत का झंडा भी। बहुत से छात्र बताते हैं कि वे हिन्दी में बात करने के लिए इन जगहों पर जाते हैं। खाना खाना और यहाँ के लोगों से हिन्दी में बातचीत करना दोनों उद्देश्यों की पूर्ति यहाँ हो जाती है। तोक्यो शहर में जहाँ-तहाँ ऐसे भारतीय (जिनमें नेपाली, पाकिस्तानी और बंग्लादेशी शामिल हैं) रेस्त्राँ मौजूद हैं जहाँ उपमहाद्वीप का खाना और संस्कृति की झलक मिल जाती है। यहाँ वे खान-पान से संबंधित अनेक शब्दों को सीखते हैं। यह अनौपचारिक रूप से शिक्षण का ही एक हिस्सा है। हमारे यहाँ रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पीनेवाली बात यहाँ नहीं है। लोग खाने-पीने पर ही सबसे ज्यादा पैसे खर्च करते हैं। भोजन करना एक सांस्कृतिक व्यावहार है और यह भाषा सीखने का एक कारगर औजार भी।

विदेशी भाषा को अपनाने में वक्त लगता है। हमारे यहाँ विदेशी भाषा का तात्पर्य प्राय: अंग्रेजी है। पर भारत में अंग्रेजी सीखने का पूरा माहौल है। जापान में हिन्दी सीखने के लिए ऐसा परिवेश उपलब्ध नहीं है। हर शब्द सीखना और उसे याद भी रखना कई बार मुश्किल होता है। ऐसे में ये भारतीय भोजनालय अपना कम महत्व नहीं रखते। अनेक छात्र अपनी आजीविका के लिए काम करते हैं। माता-पिता से आत्मनिर्भर होकर जीना यहाँ की फितरत है। इसके लिए वे भारतीय रेस्त्राँ में काम तलाशते हैं। कक्षाओं में यह देखने में आता है कि जो छात्र भारतीय रेस्त्राँ में काम करते हैं वे तेजी से हिन्दी में बातचीत करना सीख जाते हैं। उनका उच्चारण भी स्वाभाविक लगता है और बोलचाल का प्रवाह भी सहज जान पड़ता है। इसलिए खान-पान की संस्कृति हिन्दी के विकास में सहायक बनी हुई है।

जापान में हिन्दी फिल्में हमेशा तो नहीं देख सकते जैसा कि अमेरिका या ब्रिटेन में होता है पर अक्सर ही कोई फिल्मोत्सव या फिल्म-क्लब हिन्दी फिल्मों को दिखाने का उपक्रम करते रहते हैं। फिल्म दिखाने के पूर्व यह जरूरी है कि उसके उपशीर्षक जापानी भाषा में तैयार किए जाय। ऐसा करते हुए छात्रों को हिन्दी सीखने का मौका मिलता है। इसमें बहुत से हिन्दी विद्वानों को भी शामिल किया जाता है। यदि फिल्म का प्रदर्शन व्यावसायिक हो तो अन्यथा छात्रों से ही काम चलाया जाता है। उपशीर्षकों की प्रक्रिया से जुड़े विद्यार्थी समकालीन हिन्दी संवादों को गहराई से समझने का प्रयत्न करते हैं। आम छात्र या नागरिक जो हिन्दी फिल्में देखने जाते हैं वे भी अपने साथ कुछेक नए वाक्य और शब्द सीखकर समृद्ध होते हैं। पिछले दिनों थ्री इडियटफिल्म पूरे देश में लोकप्रिय हो गयी थी। उसकी पटकथा का अब जापानी अनुवाद भी उपलब्ध हो गया है। विद्यार्थी अब कक्षाओं में इस फिल्म के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो यह कोई जापानी या उनकी अपनी भाषा की ही फिल्म हो। अनेक हिन्दी फिल्में जापान चुकी हैं और पुरानी फिल्मों पर अनेक शोध कार्य भी हो चुके हैं। इनमें उमराव जानप्रमुख है। मनोरंजक तरीके से हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने में हिन्दी फिल्मों की अपनी अनूठी भूमिका है।

इसके अतिरिक्त बहुत-सी सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से हिन्दी पठन-पाठन का प्रोत्साहन किया जाता है। जिसमें तोक्यो स्थित भारत के राजदूतावास की अग्रणी भूमिका है। हिन्दी में निबंध लेखन,परिचर्चा, संवाद और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं के आयोजन से विद्यार्थी हिन्दी में अपनी प्रस्तुति के लिए मंच पा जाते हैं। नृत्य और  नाट्य प्रस्तुतियाँ इसमें पूरक की भूमिका निभाती हैं। आजकल कथक यहाँ काफी प्रचलित हो चला है। इसके अलावा अनेक गैर सरकारी और गैर अकादमिक संस्थाएँ भी हिन्दी और हिन्दुस्तान से जुड़ी गतिविधियों का संचालन करती हैं और उसमें छात्र अधिक दिलचस्पी से शिरकत करते हैं।  विदेश भाषा शिक्षण का वह स्‍वरूप नहीं हो सकता जो अपने देश में होता है। उसे कक्षाओं के साथ-साथ अन्‍य पूरक कार्यकलापों  से जोडना होता है। कहना न होगा कि जापान और भारत के संबंधों को ताकत देने में हिन्दी एक महत्वपूर्ण कडी है।

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