31 मई, 2008
महाकाव्य
घर से निकलती थी
करने को काम
बस में लड़ती थी
सड़कों पर भी जारी थी उसकी जंग
आफिस में बॉस की निगाहों से जूझती थी
रोज लड़की
मॉं-बाप की चौकस निगरानी
भार्इ की बहादुरी की कहानी
से लड़ती थी लड़की
अपनी आदिम पनाहगाह में भी
अल्ट्रािसाउंड की किरणों से युद्धरत थी लड़की
अकेले
आधुनिक सभ्यलता
इस घनघोर वैज्ञानिक तार्किक
और विवेकवान समय में
आफिस से घर तक
सुबह से शाम तक
गर्भ से मृत्यु तक
लड़की का जीवन युद्धों से भरा था
लड़की खुद में
एक महाकाव्य थी
29 मई, 2008
मोहल्ले की भड़ास
आजकल ब्लाग पर मोहल्ला और भड़ास आपस में भिड़े हुए हैं। कुछ नकली और कुछ असली लड़ार्इ लगती है।मामला थाना कचहरी तक आ पहॅुंचा है। ब्लाग अभिव्यक्ति का एक वैकल्पिक माध्यम है। सामाजिक मसले तो समाज के मंच पर ही निपटाने पड़ेगें। अभिव्यक्तियॉं सहायक मात्र होती है।लेकिन अविनाश और यशवंत इसे ब्लाग पर ही सलटाना चाहते हैं। हुजूर आपसे बाहर भी एक दुनिया है। वह भी कुछ हैसियत रखती है। वह भी अपना निर्णय देगी। कहीं यह नूरा कुश्ती तो नहीं । ब्लाग पर भी टी आर पी जुगाड़ने की कोशिश मत कीजिए। ऐसी कोशिश अभिव्यिक्त के जनतंत्र का गला घोटेगी। नं0 1 बनना है तो मुख्यधारा में रहिए। यहॉं अंडा छीलने क्यों आ रहे हो। अपना अपना काम करों। असल लड़ाई भइये ब्लाग से न सुलझेगी।तो हो जाओ तैयार हकीकी दुनिया में आने को।
23 मई, 2008
नेता का अभिनंदन
तोरि दीन्ह दॉंतन औ फोरि दीन्ह माथन
हाथन औ पैरन मरेारि ठौरि दीन्ह है।
कम करी पीटन घसीटन करी चींटन सों
परिधान डारे फारि औ उघारि करि दीन्ह है।1।
कहॉं लौ बताऊँ तुम्हे कहॉं लौ गिनाऊँ मैं
कहत शरमाऊं जो लोगन्ह ने कीन्ह है।
थोरि कही बातन औ ढेरि कही लातन सों
मूकन औ घूसन सो सब कहि दीन्ह है।2।
छोडि़ भागे मंच वे प्रपंच सब त्यागि के
जोरि हाथ ऐसे कहैं सुनों मेरे भाइयों।
झूठ काम,झूठ बानी,झूठ वादा नाहि करिहौं
सत्य कहौं शपथ लै तुम्हारे काम आइयों।
अबकी बेर छोडि देहु फेरि नाहि आइयो
आइयों तो फेरि कछु काम कर दिखाइयों।
ऐरी जनता तू ही ईश तू ही जगदीश मेरी
तेरे पाँव चाटि-चाटि तेरे गुन गाइयों।3।
जनता बोली नेता तुम सुधर नहीं जाते क्यों
बार-बार हमसे पिटन चले आते हो।
जूता खाते चप्पल खाते लात और घूसा खाते
अंडे टमाटर से नाही क्यों अघाते हो।
चालैं तेरी समझै सब नाही हैं मुरख हम
फिर काहे अण्ट-शण्ट बोलि बहकाते हो।
काम वाम नाही करते बाति हो बनाते खूब
वोट-वोट हरदम हमेशा घिघियाते हो।3।
चंडूबाज दगाबाज जाने कौन बाज तुम
बाज आओ आदत से यही समझाते हैं।
हड्डी पसली तोरि नाही एक करि दैहै हम
ऐसे पुण्य कामन में हाथ खुब बँटाते हैं।
करते हैं इशारा हम समझदार जानि पड़ौ
नाही फिर खूब हम धूल भी चटाते हैं।
आए थे पटाने तुम बात ही पलट गयी
तेरे जेसे नेता तो पिट के ही जाते हैं।4।
नेता पीटि-पीटि बने अभिनेता फिल्म के
इल्म भूलि गए वे आए किस काज थे।
हार पाए फूल पाए और सम्मान पाए
पाए नहीं कहूँ ऐसे निर्मम समाज थे।
देव सम जिनकी पूजा होती थी रोज ही
भूत सम भगाए गए अरे वे ही आज थे।
मन ही मन मन वे मसोसि रहि गए थे
ऐसे कपटी कामी कुटिल दगाबाज थे।5।
21 मई, 2008
निर्मल वर्मा:चिंतन और विचार
समाज का उदय और संस्कृति की संकल्पना–मानव इतिहास में लगभग समानांतर रूप से विकसित हुई है। समाज जब संस्थानीकृत होते चले गए तब सत्ता के विविध रूपों का निर्माण हुआ जिससे समाज को अनुशासित करने तथा उसे व्यवस्थित करने में सहायता मिली। सामाजिक व्यवस्था का यह उद्यम निरंतर चलता रहा और अंतत: सत्ता का आधुनिक रूप–राज्य सत्ता के रूप में हमारे समक्ष आज अपना आकार ग्रहण कर सका है। सत्ता के निर्माण की यह प्रक्रिया उन सांस्कृतिक मूल्यों से नियंत्रित होती रही है, जिन्हें समाज ने अपने सुदीर्घ अनुभवों से अर्जित किया था तथा जिसे नेतृत्वशील व्यक्तियों ने समय–समय पर परिष्कृत–संशोधित किया था। इसी संर्दर्भ में सत्ता, संस्कृति और व्यक्ति के आपसी सरोकारों की पड़ताल अनिवार्य हो जाती है, जिसका मुखर स्वर निर्मल वर्मा के साहित्य में विद्यमान है।
सत्ता का स्वरूप उसकी आरंभिक अवस्था में निश्चय ही प्रगतिशील रहा होगा। सत्ता ने मनुष्य को एक व्यवस्था के भीतर पलने–बढ़ने का मौका दिया जिसे मानव–समाज ने स्वेच्छा से अंगीकार किया था। धीरे–धीरे सत्ता के अपने निहितार्थ विकसित हो जाते हैं और वह अपना 'कल्याणकारी' स्वरूप छोड़कर आक्रामक हो उठती है क्याकि उसके पास शक्ति होती है। शक्ति सत्ता का अनिवार्य तत्त्व है। निर्मल वर्मा ने सत्ता से आक्रांत मानव समाज वेदना को उद्घाटित किया है। उनके समूचे लेखन में 'यातना–शिविरों' का आतंक मानवीय आकांक्षा को बाधित करता है। इस कठोर यथार्थ का जैसा उद्घाटन निर्मल अपनी सधी भाषा में करते हैं वह आधुनिक युग के रचनाकारों में दुर्लभ है। पश्चिमी समाज ने सत्ता का सर्वथा आतंककारी, घृणा और भयावह रूप जो देखा – वह हिटलर का फासीवाद था जिसने मनुष्य की गरिमा को कीट–पतंगों की स्थिति में 'रिड्यूस' कर दिया। निर्मल वर्मा ने इस स्थिति के ध्वंसावशेषों केा बहुत करीब से देखा और परखा है। 'चीड़ों पर चाँदनी' मनुष्य की इसी भयावह यातना का प्रामाणिक दस्तावेज बन गया है।
सत्ता का यह हृदय विदारक रूप पश्चिम में ही देखने को नहीं मिलता वरन् इसका एक नया स्वरूप भारत में भी उभरता दिखायी दे रहा है। भारत में ब्रिटिश सत्ता के अत्याचारों को बहुतायत में प्रचारित–प्रसारित किया जाता है, जो सर्वथा उचित है, परंतु स्वाधीन भारत में भी सत्ता के आतंक के कई उदाहरण मौजूद है जिन पर रचनाकारों और इतिहासकारों ने ध्यान नहीं दिया। निर्मल वर्मा स्वातंत्र्योत्तर भारत में सत्ता के शोषणकारी चरित्र का बेबाक उदघाटन करते है। विकास की आड़ में मनुष्य को निरंतर विस्थापित करने का जो षडयंत्र सत्ता कर रही है – निर्मल इस छल को पहचानते है और अपने शब्दों के माध्यम से तथाकथित विकास के प्रपंच को छिन्न–न्नि करते है। सिंगरौली खदानों पर की गयी उनकी टिप्पणी इस संदर्भ में दृष्टव्य है।
निर्मल वर्मा का रचना कर्म सांस्कृतिक प्रश्नों से गंभीरता से जूझता है। संस्कृति उनकी रचनाओं में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संवत: इसीलिए उनका चिंतनपरक साहित्य ज़्यादा प्रखर, मारक और धारदार है। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों को आमने–सामने रखते हुए निर्मल उनकी परत–दर–परत खोखले चलते है। अपने इसी गहन विश्लेषण के बल पर वे इस मिथ्या धारणा का खण्डन कर पाते हैं कि भारतीय संस्कृति पश्चिमी संस्कृति की तुलना में कम भौतिकवादी और आध्यात्मिक है। दरअसल इतना भर कह देने से भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों की विभाजक रेखाएं स्पष्ट होने की बजाय धुंधली पड़ जाती है। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृतियों की विभाजक रेखाएं स्पष्ट होने की बजाय धुंधली पड़ जाती है। भारतीय और पाश्चात्य जीवन मूल्यों में अंतर हैं पर उसकी पड़ताल गहराई से होनी चाहिए – जिसे निर्मल पहचानते, पकड़ते है। वे भौतिकवादी और गैर भौतिकवादी के स्थूल विभाजन में विश्वास नहीं रखते। निर्मल अपने सांस्कृतिक विवेचन में अंतदृर्ष्टि और अंतरात्मा पर बहुत बल देते है। वे इसी अंतदृर्ष्टि को भारतीय जीवन मूल्य का अनिवार्य तत्त्व मानते हैं, जो आज भी भारतीय जनमानस में संचरित हो रहा है पश्चिम इस अंतदृर्ष्टि को खो चुका है, इसलिए वह 'आत्मरिक्ति' के दौर से गुज़र रहा है। निर्मल मनुष्य के 'आत्मबल' को उसके होने की सबसे बड़ी प्रामाणिकता मानते है। मनुष्य के जीवन संग्राम में इस आत्मबल की महती भूमिका है, ऐसा वे स्वीकार करते हैं। निर्मल का मानना है कि 'दृश्य शक्तियों के साथ–साथ कुछ अदृश्य और रहस्यात्मक शक्तियाँ भी हमारे जीवन को प्रभावित करती है। पश्चिमी जगत् इनमें विश्वास नहीं करता है इसलिए अवसाद और आत्मशून्यता उसकी अनिवार्य परिणति है।
निर्मल संस्कृति के प्रश्न को व्यापकता प्रदान करते है। उनके यहाँ यह कोई 'कलावादी' प्रश्न नहीं है – बल्कि उसके सरोकार उस सांस्कृतिक समुदाय की समूची जीवन शैली बाह्य और भीतरी आचरण से जुड़े है। उन्होनें विकास की प्रक्रिया को भी किसी हद तक एक सांस्कृतिक मसला माना है। विकास का प्रश्न इस बाजारवादी और खगोलीकरण के युग में नितांत आर्थिक मामला है – इस दृष्टि का निर्मल विरोध करते है। विकास की प्रक्रिया यदि मात्र आर्थिक प्रक्रिया बन कर रह जाती है तब मनुष्य की आत्मा का विलोपीकरण आरंभ हो जाता है। मनुष्य अपनी जड़ों से कटकर संवेदनशिथिल हो जाता है। इसीलिए निर्मल विकास के प्रश्न को संस्कृति के साथ जोड़ने पर बल देते है। विकास का प्रश्न जब संस्कृति के साथ जुड़ जाता है, तब एकांगी और असंतुलित विकास की संभावना क्षीण होती है और आमजन अपनी जड़ों से अपदस्थ नहीं होता। पश्चिमी विकास मॉडल अपनाने से भारतीय संस्कृति का क्या हस्र हो सकता है, इसके माध्यम से, निर्मल हमें इस ख़तरे के प्रति सचेत करते हैं।
इस सबके बावजूद, कहीं–कहीं निर्मल का संस्कृति संबंधी विवेचन इकहरा हो चला है। इसके लिए वे जिन ग्रंथों का उल्लेख करते हैं और जिन परंपराओं को बार–बार दुहराते हैं – उन्होंने किसी समय, इस देश में विद्यमान अनेक दुष्प्रथाओं को जन्म भी दिया इस ओर निर्मल का ध्यान नहीं गया। प्राचीन भारतीय परंपराओं के प्रति उनकी दृष्टि कमोवेश सम्मोहिनी ही रही है उसके अंतर्विरोधों और अंतर विभाजन की पहचान वहाँ गायब है। वे अपनी बात को समझाने के लिए बार–बार पश्चिमी चिंतकों को उद्धृत करते हैं यह उनके बहुज्ञ होने का दावा तो सिद्ध करता है लेकिन वह अखरता भी है।
व्यक्ति का अभ्युदय विश्व इतिहास की महत्त्वपूर्ण परिघटना है। आधुनिकता के मूल्यों को गति प्रदान करने में व्यक्ति की सक्रिय भूमिका रही है। व्यक्तिवाद का अभिप्राय भी यही है कि अपनी क्षमताओं पर स्वयं का नियंत्रण। अपनी शक्ति का स्वामी। मध्यकालीन परिवेश में व्यक्ति की शक्ति का स्वामित्व दूसरे के हाथ में था लेकिन व्यक्तिवादी विचारधारा ने इसे उलट दिया। इसके फलस्वरूप मनुष्य की स्वतंत्रता में इजाफा हुआ और सामंती जीवन मूल्यों के बरक्स आधुनिक जीवन मूल्यों को मान्यता प्राप्त हुई। निर्मल वर्मा का साहित्य इन्हीं आधुनिक जीवन मूल्यों का वाहक साहित्य है जिसमें मनुष्य की स्वतंत्रता का पक्ष साफा–साफ उभरकर आता है।
कहना न होगा कि निर्मल वर्मा आधुनिक काल के उन कुछ गिने–चुने रचनाकारों में से है जिनकी दृष्टि कभी कमजोर नहीं हुई और न ही उन्होंने अपनी आँखों पर, इस समाज और संस्कृति को देखने के लिए, कोई चश्मा लगाया। अपनी स्वतंत्र मेधा में भरोसा रखते हुए उन्हाने सत्ता के छल, संस्कृतियों के संकट और व्यक्ति की यातना को स्वर प्रदान किया है।
संस्मरण बारिश का

आसमान से बारिश की झड़ी लगी हुई है। फड़फड़ाती हुई ट्यूबलाइट की निरंतर बिजली कड़क रही है। नींद उचट गयी है। बारिश देखने का लालच मेरे लिए बहुत बड़ा है। मेरे अस्तित्व के एहसास का जैसे अविभाज्य अंग। प्राय: मैं ऐसे मौकों पर वेदना और उल्लास के मिश्रित भाव से भर उठता हूँ । मेरे मित्र अंधेरे और उजाले की इस गुमनाम बेला में एक कौंध की तरह मन के क्षितिज पर फूटने लगते हैं। पहाड़, नदियॅां , आकाश, समंदर सब के बीच बारिश एक पवित्र सा संबंध जोड़ने लगती हैं। संबंध – एक जटिल पद है। न जाने कितनी चीजें कौंधने लगती हैं मेरे मन: आकाश पर । बादल लगातार गरज रहें हैं। अत्यंत भयावह गर्जना। बे सहारा लोग जो सड़को पर होते हैं आम दिनों में आज अभी कहां होंगे ।यह बरसात डराती और पुलकित करती है, एक साथ।
अध्यापन का पेशा भी अजीब है। अनेक विद्यार्थी और उनकी अनंत स्मृतियॉ । चाहने वाले और विरोधी भी। ऐसे जिनमें अनंत ऊर्जा भरी रहती है और वे भी जो गुमशुदा से कहीं खोये हुए खामोश बैठे रहते हैं। अध्यापकों में मेरे प्रिय शिक्षक थे दीपक सिन्हा। बरबस उनकी याद आ गई। वे विद्यार्थी को पूरी तरह ‘बरबाद’ करके छोड़ते थे। ऐसी क्षमता बहुत कम अध्यापकों में होती है। मेरे मन और दिमाग को उन्होने बिल्कुल बदल दिया। जब मुझे उनकी सख्त जरूरत थी तब वे नहीं रहे। मेरी चाहत कुछ इसी तरह मिटती रही है।जब जो चाहा मिला तो जरुर पर ठहर न सका।
अभी मुझे नौकरी मिली ही थी कि मेरे पिता मुझे छोड़कर चले गए। और, जब ‘उसकी’ सख्त दरकार थी तो उसने भी ‘न’ कह दिया । ऐसी लड़खड़ाती जिंदगी मेरे नसीब का हिस्सा है। वैसे मैं नसीब में विश्वास नहीं करता । सोचा था कुछ और लिखूंगा- बारिश के रोमांटिक मूड पर पर देखिए लेखनी (कीबोर्ड) भी कहॉं से कहॅां चली जाती है , जिंदगी तरह। बादल अभी भी गरज रहे हैं, पर उनका डर जैसे खत्म हो गया है। सृजन की यही ताकत होती है। एक घंटा हो गया है आपको यह सब बताते हुए, सुनने की सीमा होती है । इसलिए बंद करता हूँ । बस इस कविता को सुनते जाइए-
रतनसेन पद्मावती संवाद (जायसी के प्रेम आख्यान ‘पदमावत’ के ऋण के साथ)
उस दिन
मेरी बगल में बैठी
तुम

पिघलने लगी थीं
लाल कपोल
उबलने लगे थे तुम्हारे
तुम्हारे होंठों से
उठती हुई
निर्धूम लपटों को
मैंने चुपके से देख लिया था।
उस दिन
पहली बार
तुम्हारे भीतर उतरकर
मैंने पहचाना था
तुम कितनी गहरी हो
अथाह
छू सका था
मोती और मूंगे अनमोल
जो तुमने छिपा रखे थे अपने अतल में।
तुम्हारे शिखरों पर
लड़खड़ाते
कदमों से पहुंच
मैं अनुभव कर पाया था
दूर-दूर तक फैले तुम्हारे भीतरी निजी सन्नाटे का
कि
शिखर अपनी ऊॅचाई में होता है कितना
अकेला
निहत्था और अजनबी
बिल्कुल एकाकी
उस दिन
करीब रहकर मैंने जाना था
तुम्हारी रचना
कितने आदिम पाषाण खण्डों से हुई है
जो एक तरल गंध से सराबोर हैं
तुम्हारी शिराओं में बहता ज्वालामुखी
मुझे लगा था गलाने
धीरे-धीरे उस दिन
उसी दिन
मैंने जाना था
हम दोनों पिघल सकते हैं
गल सकते हैं
धातुओं की तरह
साथ-साथ
एक-दूसरे की ऑच में।