31 मई, 2008

महाकाव्‍य

लड़की
घर से निकलती थी
करने को काम
बस में लड़ती थी
सड़कों पर भी जारी थी उसकी जंग
आफिस में बॉस की निगाहों से जूझती थी
रोज लड़की
मॉं-बाप की चौकस निगरानी
भार्इ की बहादुरी की कहानी
से लड़ती थी लड़की
अपनी आदिम पनाहगाह में भी
अल्ट्रािसाउंड की किरणों से युद्धरत थी लड़की
अकेले

आधुनिक सभ्यलता
इस घनघोर वैज्ञानिक तार्किक
और विवेकवान समय में
आफिस से घर तक
सुबह से शाम तक
गर्भ से मृत्‍यु तक
लड़की का जीवन युद्धों से भरा था
लड़की खुद में
एक महाकाव्‍य थी

3 टिप्‍पणियां:

बाल किशन ने कहा…

अद्भुत कविता है.
भावपूर्ण.
आभार.

Udan Tashtari ने कहा…

सोचने को मजबूर करती अच्छी रचना. आभार.

pravin ने कहा…

samkalin ur satik hai. pata nahi kyon ajkal is visaivastu par jjada kavitaen nahi aa rahi hai.