20 सितंबर, 2015

भक्ति कविता, राजनीति अौर वैश्वीकरण


श्रीअरबिन्दो महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय-संगोष्ठी,  वैश्वीकरण अौर भक्ति-कविता,18-19 सितम्बर 2015 में प्रस्तुत आलेख


भक्ति कविता भारतीय साहित्य इतिहास की एक केन्द्रवर्ती धारा रही है। भारत की सभी प्रमुख भाषाअों समेत अनेक बोलियों अौर उपबोलियों तक में भक्ति कविता की उपस्थिति मिलती है। समय के अंतराल के साथ उत्तर से दक्षिण अौर पूर्व से पश्चिम तक समूचे भारत में इसकी व्याप्ति है। आठवीं शताब्दी से लेकर ईसा की पन्द्रहवीं शताब्दी भक्ति कविता के अंश बिखरे पड़े है। अनेक इतिहासकारों की मतभिन्नता के बावजूद अब हिन्दी के भक्तिकाल के कालखण्ड को सुनिश्चित कर लिया गया है। यह अालेख हिन्दी की भक्ति कविता की परिसीमा के भीतर राजनीतिक बोध अौर वैश्वीकरण की प्रक्रिया का अवलोकन करेगा जिसमें स्वाभावत: अन्य भारतीय भाषाएँ संदर्भ के तौर पर मौजूद रहेंगी।
भक्ति कविता के तीन केन्द्रीय सरोकार रहे हैं-जीव, संसार अौर ब्रह्म। चौथा महत्वपूर्ण संबोधन आत्मा के प्रति है जो जीव के भीतर ही विद्यमान है अौर उसका उन्नत अंश है यानी हम जीव को जीवात्मा भी कह सकते हैं जिसमें शुभ-अशुभ का मिश्रण है। दूसरी अोर ब्रह्म पूरी तरह शुद्ध है अौर अगम, अगोचर, अदृश्य है, निराकार भी है। संसार दृश्य, ठोस अौर भौतिक है अौर जीवात्मा इसके भीतर इसे सच मानकर सक्रिय है। जिसका प्रतिवाद भक्ति कविता करती रहती है लेकिन इसी में भक्ति कविता की रणनीति, ऊहापोह अौर संसार के प्रति आसक्तियाँ झलकतीं हैं। अर्थात ब्रह्म एक रणनीति के रूप में मौजूद होकर संसार अौर जीवात्मा का संचालन करता है। तो क्या ब्रह्म-सत्ता ही आज की राजनीतक सत्ता की प्रतिनिधि थी अौर उसकी खगोलीय व्याप्ति का आज के वैश्वीकरण से क्या संबंध बनता है? 
आधुनिक विश्व में सामाजिक नियमन की शक्ति राजसत्ता के हाथों में है, मध्यकाल में यह धर्मसत्ता के अधीन थी। राजा कमोवेश धर्म के अधीनस्थ ही  माना जाता था। इसलिए भक्ति कविता मूल्य निर्माण से जुड़ती है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के संचालन का दिशा-निर्देश सम्मिलित होता था। तुलसीदास अपनी रामायण लिखते हुए ‘रामराज्य’ की जिस अवधारणा का प्रतिपादन करते हैं वह राजधर्म अौर प्रजा की चिंताअों को एक साथ आलोकित करता है। प्रसिद्ध विचारक अौर राजनेता डॉ० राम मनोहर लोहिया ने  धर्म अौर राजनीति के इसी सह-संबंध को समझने की कोशिश करते हुए लिखा कि ‘धर्म अौर राजनीति का रिश्ता बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है अौर राजनीति अल्पकालीन धर्म। धर्म श्रेयस की उपलब्धि का प्रयत्न करता है, राजनीति बुराई से लड़ती है’। भक्ति कविता का ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। वह एक सुपर सत्ता है जिसे प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता। वह निर्गुण तानाशाह तो है पर मानवीय भी। उसकी तानाशाही की ताकत का भय दिखाकर भक्त कवि संसार के ताकतवर जमातों को करुणा अौर मानवता को संदेश देते हैं। सांसारिक नश्वरता के अनेक दृष्टांतों के बल पर वे अपने समय की राजनीति अौर राजाअों पर एक गहरा दबाव बनाते हैं अौर जनहित में सोचने की दिशा में प्रेरित करने का उद्यम रचते हैं। ध्यान देना होगा कि तत्कालीन राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित नहीं होती थी। इसलिए उसे नियंत्रित करने अौर संयमशील बनाए रखने के लिए जरूरी था कि उससे भी बड़ी किसी शक्ति का ईजाद। ब्रह्म इसलिए भक्त कवियों का एक महान आविष्कार था जिसके माध्यम से राजा की ताकत, निरंकुशता अौर अत्याचार को लगाम लगा सके तो दूसरी अोर पंडे-पुजारियों-मौलवियों के पाखण्ड अौर अंधविश्वास से आम जनता को बचा सके। यह ब्रह्म काल-भूगोल निरपेक्ष भी था इसलिए विश्वमानव (या मानवमात्र) के कल्याण से जुड़ा था। वैश्वीकरण का एक रूप इसमें भी तलाशा जा सकता है जो आज की बाजारवादी अवधारणा से अलग जरूर है पर पूरी तरह विच्छिन्न नहीं।
अनेक विद्वानों का मानना है कि भक्त-कवि अपने विचारों तक सीमित थे। इस संदर्भ में तुलसी की ‘माँगि के खाब मसीत मा सोउब, लैबे का एक न देबै का दोऊ’ अौर कुंभन का ‘संतन कहाँ सीकरी सो काम’ जैसी उक्तियों का उदाहरण पेश किया जाता है। इन कथनों में निश्चय ही राजसत्ता के प्रति निरपेक्षता का भाव मिलता है। पर यह निरपेक्षता किन कारणों से है वह अधिक गहरा है।
दरअसल राजशाही वाली सत्ताएँ आत्मकेंद्रित थी। स्वयं की सुख-सुविधा में लिप्त अौर आत्मप्रशंसा की भूखी। झूठे स्वाभिमान के लिए युद्ध में सन्नद्ध। ऐसी राजनीति से आम आदमी अौर मानव समाज का कोई भला न हो सकता था। इसका ठोस उदाहरण जायसी अपने ‘पदमावत’ में रतनसेन अौर अलाउद्दीन के रूप में करते हैं। दोनों ही राजा हैं अौर दोनों ही आत्मकेन्द्रित एवं लिप्सा के वशीभूत होकर अपनी गतिविधियाँ संचालित करते हैं। अन्तत: दोनों के ही हाथ निराशा लगती है। इसका विकल्प तुलसी के ‘रामचरित मानस’ में मिलता है। जिसका उद्देश्य ‘परहित सरिस धरम नहि भाई’ है। ‘मानस’ में अन्तत: ‘रामराज्य’ का विज़न मिलता है। जहाँ जायसी तत्कालीन राजाअों की वास्तविक मनोवृति का वर्णन करते प्रतीत होते हैं, वहीं तुलसी एक वैकल्पिक व्यवस्था का स्वप्न रचते है जो तत्कालीन राजाअों के लिए एक सशक्त संदेश देता प्रतीत होता है। निर्गुण या सगुण राम, कृष्ण अौर आदि ब्रह्म तत्कालीन राजाअों या राजसत्ताअों के विकल्प की तलाश हैं इसलिए भक्ति कविता इनके गुणगान में पन्ने दर पन्ने रंगते चली जाती है। खास बात यह है कि अनेक मुस्लिम कवियों ने भी सगुण हिन्दू रूपों की गाथाएँ लिखी हैं। इसके कारणों को राधाकुमुद मुखर्जी के इस उद्धरण से जाना जा सकता है, ‘हिन्दू धर्म समन्वयात्मक एवं सर्वग्राही रूप से व्यापक है; उसका दर्शन-शास्त्र विश्वजनीन है, उसका कोई परिमित या सीमाबद्ध लक्षण या व्याख्या भी नहीं है।xxx इन कारणों से हिन्दू धर्म अपरिमित मनुष्यों का सर्व-सामान्य धर्म बन गया है जो जाति-भाषा, राजनीतिक गठन, सामाजिक परंपरा अौर रुचियों में एक दूसरे से बहुत भिन्न है’। शायद इसी आत्मसाती वृत्ति ने भारत के अनेक धर्मावलंबियों की अपनी अोर आकृष्ट किया। इसलिए भारत में आक्रमणकारियों का प्रवेश तो हुआ पर उनके साथ जो संवेदनशील चेतना पहुँची वह भक्ति के रस सराबोर हो गयी।
इस आंदोलन अौर कविता को आधुनिक काल में पहचानने का प्रारंभिक उद्यम जॉर्ज ग्रियरसन किया ने किया अौर वे लगभग ‘कन्फ्यूज़’ से दीखते हैं। इसलिए उन समेत अनेक पश्चिमी विद्वानों को यह आंदोलन ईसाइयत से प्रभावित अौर ‘बिजली की चमक के समान अचानक’ उठ खड़ा दिखाई देता है। क
कहना न होगा कि यह किसी भी योरोपीय आंदोलन से वृहद था इसलिए पश्चिमी विद्वान ईसाइयत से इसका नाता जोड़ने का लोभ वरण न कर सके। बाद में चलकर फादर कामिल बुल्के ने तुलसी-साहित्य के अध्ययन अध्यापन में ही अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया। भक्ति कविता की विश्वजनीनता का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। इसी तरह के दृष्टांत का उल्लेख सुवीरा जायसवाल ने किया है जो भक्ति कविता के स्रोत भागवत धर्म के बारे में है। वे लिखती हैं कि, ‘भागवत मत का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण मध्यप्रदेश में पाया जाता है। भागवत धर्म के इतिहास में बेस नगर के गरुड़-स्तंभ अभिलेख की खोज एक महत्वपूर्ण तथ्य है। उक्त अभिलेख में ग्रीक राजदूत हेलिअोडोरस के द्वारा, जो अपने को भागवत कहता है तथा तक्षशिला का निवासी बताता है देवाधिदेव वासुदेव के सम्मान में एक गरुड़ ध्वज के संस्थापन का उल्लेख है’। इस प्रकार वैष्णवा के 
प्रति आकर्षण विश्व में अत्यंत प्राचीन काल से ही रहा है जिसकी पीठिका पर भक्ति काव्य का उदय होता है।
वैश्वीकरण में पाँच बातें प्रमुख होती हैं-

१. सूचना, विचार अौर ज्ञान की त्वरित एवं विश्वव्यापी पहुँच
२. वस्तुअों की व्यापक उपलब्धता
३. पूँजी का प्रवाह
४. सांस्कृतिक-उत्पादों का विश्वस्तरीय प्रसार, अौर
५. मानव-प्रवास

वैश्विक जनता में भारतीय जीवन मूल्यों का गहरा प्रसार है। कोई भी सशक्त आंदोलन कुछ मूल्यों को समाज में छोड़कर विलुप्त हो जाता है। अहिंसा, सहभाव, सामरस्य, सहिष्णुता, करुणा अौर परोपकार ऐसे ही मूल्य थे जो भक्ति आंदोलन के गर्भ से निकल कर आम लोगों तक पहुँचे अौर हमारे संविधान तथा राजनीति का हिस्सा बने। इन मूल्यों में से अधिकांश आज संयुक्त राष्ट्र एवं यूनीसेफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाअों के मार्ग-दर्शक सिद्धांतों के रूप स्वीकृत हो चुके हैं। इन्हीं मूल्यों को आधार बनाकर भारतीय मनीषा ने अपना आजादी का आंदोलन लड़ा। जब अंग्रेजों अपने द्वीपीय उपनिवेशों में भारतीय मजदूरों को छोड़ दिया तब यही मूल्य उनके जीवन-रक्षक बने। आज मानव-प्रवास के नजरिए से देखें तो भक्ति-कविता का प्रसार-प्रभाव पूरी दुनिया में उपस्थित विभिन्न प्रकार के मंदिरों, स्थानीय धार्मिक समूहों के रूप में दिखाई देता है। प्रवासी भारतीय समाज आज चीन के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है। जो अपने साथ भक्ति-कविता के मूल्य लेकर गया अौर उसे सँजोए हुए है। अमरिका, कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, त्रिनिडाड, सूरीनाम, मॉरीशस अौर फीजी जैसे देशों में भारतीयों की विपुल उपस्थिति अौर वहाँ स्थापित देवालयों में भक्ति-कविता के साकार रूपों का दर्शन होता है। अनेक देशों, जिनमें गिरमिटिया देश प्रमुख हैं, में तुलसी की रामायण वैसे ही प्रसिद्ध है, जैसे भारत में। एक आँकड़े के मुताबिक  1 जनवरी 2015 को प्रवासी भारतीय लोगों की संख्या दो करोड़ चौरासी लाख पचपन हजार छब्बीस (2,84,55,026) है। यह आबादी लगभग कनाडा की समूची आबादी के बराबर है।इतनी बड़ी संख्या में लोगों को भावनात्मक संबल प्रदान करने का काम भक्ति जनित जीवन मूल्य ही कर रहे हैं।दैनिक जीवन के तनाव कम करने अौर अपने आदर्श की तलाश में अनेक प्रवासी भारतीय आज भी भक्ति-कविता से मुखातिब होते हैं। 
राजनीतिक जीवन धर्म के अभाव में बंजर हो जाता है। राजनीति में नीति का तत्व धर्म से ही आता है। इसे भारत के दो मनीषियों, गाँधी अौर लोहिया, ने बखूबी पहचाना था। गाँधी, राजनेता अौर वैष्णव भजन गायक दोनों एक साथ हैं। वे सुबह उठकर प्रार्थना करते थे, दिन में अंग्रेजों से लड़ते थे अौर शाम को वैष्णव भजन गाते थे। आज गाँधी के विचार विश्व समुदाय में समादृत हैं। अब उनके जन्मदिवस दो अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ घोषित किया गया है जिसे पूरी दुनिया के लोग मनाते हैं। अहिंसा, भक्ति कविता की मूल थाती थी जिसे गाँधी ने अपने विचार अौर आचरण से पुन: अन्वेषित किया था । वे ऐसे श्लाका पुरुष के रूप में मौजूद हैं जहाँ भक्ति, राजनीति अौर वैश्विकता की अनुगूँज एक साथ सुनी जा सकती है। 




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