06 सितंबर, 2015

गोदान अौर जापान

हिन्दी जगतके लिए 1
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          -राम प्रकाश द्विवेदी
हर शहर अौर समाज की फितरत अलग-अलग होती है। दिल्ली शहर में सायकिल तो क्या बाइक चलाना भी खतरनाक होता है। जहाँ-तहाँ दुर्घटनाअों की खबरें सुनकर मन कच्चा हो जाता है। इसलिए कभी दिल्ली में रहते हुए सायकिल चलाने की बात भूलकर भी नहीं सोची थी।
जब जापान पहुँचा तो भी यही बात सामने थी कि पराए देश में सड़क पर पैदल ही चला जाय। कोई बात हो गयी तो कैसे किसी से बहसबाजी करेंगे। भाषा तो आती नहीं। इसलिए सायकिल लेने का ख्याल बहुत दिनों तक न अाया था। जब काफी अरसा बीत गया तो आते-जाते एक बात लक्षित की कि यहाँ सभी उम्र के लोग सायकिल की सवारी करते हैं। यहाँ तक कि अस्सी साल की अौरते भी प्राय: सायकिल चलाते दिख जाती हैं। रोजमर्रा की चीजें लोग सायकिल से ही लाते हैं। इसका मतलब यह था कि जापान सायकिल चलाना बहुत ही आम बात है । धीरे-धीरे मैंने देखा कि मेरे आसपास रहने वाले सभी लोगों के दरवाजों पर कम से कम एक सायकिल तो खड़ी ही है। कई दरवाजों पर तो हरेक सदस्य के लिए अलग-अलग सायकिलें है यानी तीन या चार भी। जब विश्वविद्यालय से शाम को घर लौटता तो अपना दरवाजा सूना-सूना लगता। यह सूनापन मेरे स्मृतिबोध में कहीं गहरे जमा हुआ था। पर, बात अायी-गयी होती रही। अक्सर जापान में अपना सारा काम खुद ही करना पड़ता है इसलिए मशरूफियत कुछ ज्यादा ही हो जाती है। एेसे में स्मृतियों के बारे में सोचने के लिए ज्यादा सम्मान, समय अौर अवसर उपलब्ध नहीं होता।
एक दिन मेरे पाकिस्तानी प्रोफेसर मित्र ने सायकिल खरीदने का प्रस्ताव रख दिया। मैने पहली बार में ही मना कर दिया। पर उनका प्रस्ताव मन में घूमता रहा। फुर्सत के क्षणों में इधर-उधर घूमते हुए प्राय: नजर सायकिल की दूकानों पर आ कर टिक जाती। बाजार में तरह-तरह की सायकिलों की भरमार है। तकनीकी नजरिए से बड़ी उन्नत अौर साधारण भी। पैसे के लिहाज से भी देखें तो दस-ग्यारह हजार से शुरू होकर दो-ढाई लाख तक।धीरे-धीरे दरवाजे का सूनापन अखरने लगा।एक दिन रात में जब सहसा नींद खुली तो स्मृतिकोश में दबा वह भाव प्रत्यक्ष हो गया।कभी मेरे गुरू विश्वनाथ त्रिपाठी ने गोदानपढ़ाते हुए यह बात बतायी थी कि इस कृति की मूल संवेदना होरी का वह स्वप्न है जिसमें वह देखता है कि उसके दरवाजे पर एक सजीली गाय बँधी है। होरी, गाय अौर सूने दरवाजे का यह गहरा बिम्ब एक बार पुन: मेरे सामने प्रत्यक्ष हो उठा था। अब पता चला कि जब-जब मैं दूसरों के दरवाजों पर सायकिल खड़ी देखता हूँ तो मेरे भीतर का सूनापन क्यों उभर आता है।गाय के बँधे होने से जो मरजाद बनती थी शायद वही मरजाद सायकिल के खड़े होने से बनेगी, यह बात दृढ़ता से मन में बैठ गयी। अवध में प्रतिष्ठित किसान होने के लिए गाय का बँधा होना जरूरी है तो अच्छा एवं सुसंस्कृत नागरिक दीखने के लिए जापान में दरवाजे पर सायकिल का खड़ा होना लगभग अनिवार्य सा है। अब तय हो गया कि सायकिल तो लेना ही है।पर कौन सी, यह सवाल फिर भी बना रहा। सामाजिक प्रतिष्ठा बीच में आ खड़ी हुई।
मैंने अपने अड़ोस-पड़ोस में नजर दौड़ाई। तरह-तरह की रंग-विरंगी सायकिलों का जमघट था। गियर वाली, टोकरी वाली अौर वैसी टोकरी वाली जिसमें बच्चे भी आराम से बैठ सकते हैं। इसी ऊहापोह में एक रात सपना आया। मैं एक सायकिल चला रहा हूँ जिसमें एक बच्चा बैठा है। बहुत दूर तक तरह-तरह के नजारे बिखरे पड़े हैं। हमारी सायकिल पहाड़ों-तलहटियों से गुजरते हुए जा रही हैं। आसपास नदी का किनारा भी है। मैं बच्चे से तरह-तरह की बातें कर रहा हूँ, वह भी फर्राटेदार जापानी में।सायकिल की सवारी में अद्भुत आनंद अा रहा था। तभी अलार्म बज उठा। विश्वविद्यालय जाने का समय हो आया था। जब घर से बाहर निकला तो सायकिल विहीन द्वार एक बार फिर अखरा।राहों पर चलते हुए सायकिलें ही सायकिलें नजर आ रही थीं। अब तो मन वो बच्चा भी ढूढ़ रहा था जो सपने में मेरी सायकिल पर बैठा घूम रहा था अौर खूब बतिया रहा था। दो-तीन दिन यूँ ही निकल गए। मन किसी काम में लग नहीं रहा था। मैंने अपने पाकिस्तानी प्रोफेसर मित्र सुहैल साहब से संपर्क किया। उनसे निवेदन किया कि वे अपनी एक्सपर्ट राय दें अौर सायकिल खरीदवा दें। आखिर एक शाम उन्होंने मुझे एक सामान्य सी सायकिल दिलवा दी।जिसमें सब्जी लाने वाली टोकरी तो थी पर बच्चे वाली नहीं। जब सायकिल दरवाजे पर खड़ी हो गयी तो द्वार समृद्ध सा दिखने लगा।मन में भी चैन आ गया। उनका शुक्रिया अदा करने के लिए मैंने चाय पीने की पेशकश की। जिसे उन्होंने सहज ही स्वीकार कर लिया। चाय पीते हुए मैंने सुहैल साहेब से अपने सपने के बारे में बताया। सायकिल अौर बच्चे के बारे में। वे हँस पड़े। कहने लगे वो बच्चा मिल जाय तो आप जरूर उसे अपनी सायकिल की टोकरी में बिठा लें अौर हाँ अगर उसकी माँ मिल जाय तो मेरा पता दे दें।तब से मैं वो बच्चा ढूँढ़ रहा हूँ अौर सुहैल साहब उसकी माँ।
सायकिल आने के बाद मैं अब अक्सर बारह किलोमीटर दूर विश्वविदयालय तक की यात्रा इसी से करता हूँ। पैसे की बचत अौर स्वास्थ्य लाभ दोनों एक साथ चल रहा है। तोक्यो शहर का स्थापत्य अत्यंत लुभावना है। उसके पहाड़ों को काटकर समतल नहीं किया गया जैसाकि दिल्ली की रायसीना अौर अरावली पहाड़ियों को नष्ट कर सपाट मैदान सा बना दिया गया है। ऊँचे-नीचे रास्तों-गलियों के होने से सड़को-राहों पर भीड़ दिखाई नहीं देती। घर-मकान भी एक दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने नहीं आते।प्राइवेसी बरकरार रखने के लिए शहर का एेसा स्थापत्य बचाए रखना जरूरी होता है।सुहैल साहब भी मेरे साथ-साथ अब सायकिल की यात्रा करने लगे हैं। कारण, उनकी तोंद काफी बाहर आ गयी है जो उनके शारीरिक स्थापत्य के सौंदर्य को नष्ट कर रही है। सायकिल चलाने से उन्हें पूरी आशा है कि वह कम हो जाएगी अौर वे अपना स्वाभाविक रूप-सौन्दर्य फिर पा सकेंगे। एक दिन एक गर्भवती महिला सायकिल चलाते हुए आ रही थी। मैंने उनसे कहा आपका पेट अौर उस महिला का पेट लगभग बराबर ही है। वे मुस्कराए अौर बोले कि उसकी तोंद तो कुछ महीनों में कम हो जाएगी मेरी पता नहीं कब होगी। मैंने कहा कि कोशिश करते रहिए। रास्ते में एक बीहड़ चढ़ाई पड़ती है। मैं तो बिना सायकिल से उतरे उसे पार कर लेता हूँ। सुहैल साहब सायकिल से उतरकर ही चढ़ाई पार कर पाते हैं। मैंने उनसे कहा जिस दिन आप बिना सायकिल से उतरे इस चढ़ाई को पार कर लेंगे उस दिन मैं अपने सपनों के बच्चे की माँ को आपका पता दे दूँगा। उस दिन से वे लगातार कोशिश कर रहे हैं। इंच दर इंच फुट दर फुट उनकी सायकिल आगे चढ़ती जा रही है। सायकिल आगे चढ़ते जाने में एक सपना छिपा है।हर कोशिश एक सपना ही तो है। 

गोदानमें होरी के कई सपने पूरे हो गए कई अधूरे रह गए थे। मरते दम तक उसकी भी कोशिश जारी थी एक गाय को पाने की। दुनिया के हर आदमी में एक होरी छिपा है। उसके कुछ सपने पूरे हो जाते हैं, कई अधूरे । पूरे-अधूरे सपनों के बीच ही कहीं जीवन की सार्थकता है, क्या यही मोक्ष है? या यूँ कहें कि हर मोक्ष अधूरा है।

फ़िल्मकार हयाअो मियाज़ाकी: जापान-भारत के सांस्कृतिक सेतु

 राम प्रकाश द्विवेदी



भारत अौर जापान के सांस्कृतिक संबंधों में एक अन्तर्वर्ती धारा का प्रवाह दिखाई देता है। जो बहुधा बाह्य, स्थूल अौर सतह पर परिलक्षित नहीं होता। इस सांस्कृतिक संबंध को पहचानने का सूत्र, यदि केवल एक पद में कहा जाय, है प्राच्य भावबोध। प्राच्य भावबोध को अनेक विद्वानों मनीषियों ने पश्चिमी भावबोध से अलग किया है जो कि अब साफ तौर पर पहचाना जा सकता है। भारत-जापान के सांस्कृतिक संबंधों को जानने-समझने के लिए इस पत्र में मैंने प्राच्य भावबोध को एक केन्द्रीभूत तत्व के रूप में ग्रहण किया है जिसे जापान के विश्व प्रसिद्ध फ़िल्मकार हयाअो मियाज़ाकी की फ़िल्मों के जरिए परिभाषित करने का भी प्रयत्न  
किया गया है। 
हयाअो मियाज़ाकी की ख्याति का आधार उनकी एनीमेशन फ़िल्में हैं। वैसे वे एक सफल मांगा लेखक अौर बहुआयामी ग्राफिक डिज़ाइनर भी हैं। भारत में रहते हुए मेरा यह सामान्य अनुभव था कि एनिमेशन फ़िल्मों को बच्चों के खाते में डाल दिया जाता है अौर सांस्कृतिक विमर्श जैसी गंभीरता को पहचानने का उद्यम इनमें न के बराबर हुआ है। अपनी इसी पृष्ठभूमि के चलते शुरू में मियाज़ाकी की फ़िल्मों से मेरा तादाम्य या कहें कि साधारणीकरण संभव नहीं हो पाया। बाद में अपने विश्विद्यालय की डिजीटल लायब्रेरी का उपयोग कर मैंने उनकी लगभग सभी महत्वपूर्ण फ़िल्में देखी अौर पाया कि वे कैसे बुद्ध अौर गाँधी के करीब खड़े हैं। उनकी फ़िल्मों में भारतीय मनीषा का चिंतन बोलता है। भारतीय संस्कृति के चेहरे को पहचानने के लिए बुद्ध, गाँधी अौर अंबेडकर मुझे एक समग्र विज़न देते हैं। हयाअो मियाज़ाकी की फ़िल्मों में इन विचारकों की अनुगूँज बहुत स्पष्ट है। बुद्ध की शांति अौर अहिंसा, गाँधी का प्रकृति अौर पर्यावरण प्रेम एवं अंबेडकर का शोषितों का सशक्तिकरण मियाज़ाकी की फ़िल्मों के केन्द्रीय स्वर हैं। यह आश्चर्य में डालने वाली समानता क्योंकर है, यह एक स्वतंत्र अध्ययन का विषय है।

 मियाज़ाकी की फ़िल्मों की सूची बहुत लंबी है। तीस से भी अधिक महत्वपूर्ण फिल्में बनाकर उन्होंने जापान समेत पूरी दुनिया जो यश प्राप्ति की वह साधारणत: दुर्लभ है। यहाँ मैं उनकी कुछेक फ़िल्मों का ही उल्लेख करूँगा। ये हैं-

-तूफान-घाटी की राजकुमारी:नाऊसिका(Nausicaa of The Valley of the Wind-1984)
-किकी की डाक सेवा (Kiki’s Delivery Service-1989)
-राजकुमारी मोनोनोके (Princes Mononoke-1992) 
-चिहिरो की कहानी (Spirited Away-2001)
-मेरा पड़ोसी तोतोरो (My Neighbour Totoro-1998) 
-हवा की उड़ान (The Wind Rises-2013)

मोटेतौर पर ये उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण अौर ख्यातिलब्ध फिल्में हैं जो उनकी सोच का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हीं फ़िल्मों में जापान अौर भारत की सांस्कृतिक समानता के सशक्त दर्शन भी होते हैं। यहाँ यह देखना समीचीन होगा कि मियाज़ाकी की फ़िल्मों की विशेषताएँ क्या हैं। इन्हें निम्न रूपों में पहचाना जा सकता है- 
  1. प्रकृति अौर तकनीक के साथ मानव का संबंध
  2. नारीत्व
  3. शांतिवादी नैतिकता को बनाए रखने की मुश्किलें
  4. खलनायक की अनुपस्थिति या उसका सवाल
  5. बालपन का सघन चित्रण
  6. हवाई यंत्रों के प्रति आकर्षण
इनमें से खलनायक की अनुपस्थिति की बात छोड़ दें तो बाकी सभी विशेषताएँ भारतीय रचना विधान का अंग रही हैं। पर, हम ऐसा नहीं कह सकते कि मियाज़ाकी की फिल्मों में खलनायक नहीं है। वह शायद साफ-साफ दिखाई नहीं देता या उसे समझने के लिए हमें थोड़ी अधिक कोशिश करनी पड़ती है। मियाज़ाकी के अधिकांश फ़िल्में नायिका प्रधान है। इनमें सशक्त अौरतों अौर युवतियों का जीवन-संघर्ष, स्वप्न, चाहत, लालसा अौर प्रयत्न स्पष्ट तौर पर पहचाना जा सकता है। खलनायक वे समस्त स्थितियाँ हैं जो नायिकाअों के लिए संघर्ष के हालात पैदा करती हैं। इसलिए खलनायक का स्वरूप धुँधला अौर अस्पष्ट है। वह अदृश्य होकर जटिल हो गया है।
मियाज़ाकी अपनी फ़िल्मों में तरह-तरह के जीव-जगत उपस्थित करते हैं। विषैले वन्य-प्रदेशों से लेकर, अनोखी घाटियाँ, भुतहा रास्ते अौर जादू भरी राहों का निर्माण कर वे सर्वथा एक नए रहस्यमय लोक की रचना करते हैं। उनकी सभी महत्वपूर्ण फिल्मों में धरती, आकाश, जल, वनस्पतियाँ, अद्भुत जीव अौर मानव गतिविधियाँ एक साथ सक्रिय हो उठती हैं। ये मानव गतिविधियाँ अनेक तकनीकी वस्तुअों से समृद्ध है। गाँधी के बारे में माना जाता था कि वे सूक्ष्म तकनीकों के आग्रही व्यक्ति थे। जैसे, चरखा अौर तकली उनके प्रिय  अौजार थे। हयाअो मियाज़ाकी लघु अौर दीर्घ अौजारों में फर्क नहीं करते थे। उनके लिए झाड़ू अौर हवाई जहाज़ लगभग एक जैसा महत्व रखते हैं। कभी-कभी तो दोनों तदाकार भी हो जाते हैं। लेकिन तकनीक अौर मनुष्य के सह-संबंधों की व्याख्या दोनों में मौजूद है। ‘किकी की डाक सेवा’ में झाड़ू का हवाई यंत्र के रूप में इस्तेमाल हुआ है। भारतीय जनजीवन में आधुनिक तकनीकों के प्रति उदासीनता का भाव देखा जा सकता है जबकि जापानी समाज तकनीक को आकर्षण भरी निगाहों से देखता है। यह आकर्षण हयाअो मियाज़ाकी की फ़िल्मों में एक सूत्र की तरह विद्यमान है। अपने परिवेश का निर्माण करते हुए फ़िल्मकार मियाज़ाकी मनुष्य को ब्रह्मांडीय परिघटना का हिस्सा बना देते हैं। मनुष्य अपने कुछ अौजारों के साथ इस लोक में खड़ा है अौर अपने जीने का रास्ता ढूढ़ रहा है। अौजार ही उसे ताकतवर बना देते हैं अौर फिर वह अहंकार के दर्प में चूर प्रकृति विजय का अभियान छेड़ देता है अौर वह भूल जाता है कि वह स्वयं भी तो प्रकृति का ही हिस्सा है। प्रकृति को मारकर वह खुद भी मर ही जाएगा। अपनी फ़िल्मों में वे मनुष्य के अहंकारी भाव को तोड़ने के लिए प्रकृति की विराट शक्ति का प्रदर्शन करते हैं अौर मानव तथा प्रकृति के सह-अस्तित्व का सार्थक संदेश देते हैं। तूफान-घाटी की राजकुमारी नाऊसिका महाविनाश के बाद अपने पिता के साथ रहती है। उसके राज्य के चारों
अोर विषैले वन्य-प्रदेश अौर विध्वंसक सागर लहराते है जिनमें दैत्याकार अोम जन्तुअों का बोलबाला है। नाऊसिका इनके रहस्यों को जानना चाहती है जिससे एक स्थायी शांति कायम की जा सके। दूसरे तोमेकिअन लोग विषैले जंगलों अौर अोम जंतुअों को नष्ट करके सबकी सुरक्षा निश्चित करना चाहते हैं। पर, नाऊसिका इसमें महाविनाश की आशंका देखती है अौर विरोध करने पर बंदी बना ली जाती है। बाद में अपनी सूझ-बूझ से वह छूट तो जाती है पर अपने को विषैले जंगलों में घिरा पाती है। जब तोमोकिअन लोग युद्ध में बेबस हो महाविनाश की अोर बढ़ते है तो नाऊसिका शांतिदूत बन दोनों पक्षों के भय को खत्म कर उन्हें सह-अस्तित्व में रहने का उद्यम रचती है। सागर, जंगल, धरती अौर मनुष्य के अापसी संबंधों की अनूठी व्याख्या इस फ़िल्म में हैं जो भारतीय मनीषा की चिन्ताधारा का भी मुख्य केन्द्र रही है।
तकनीक के मनुष्य के साथ संबंधों को लेकर पूरी दुनिया के विद्वानों ने समय-समय पर अपनी राय प्रस्तुत की है। यह विमर्श आज भी जारी है। भारत का प्राचीन काल वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से समृद्ध था। मध्यकाल में दार्शनिक उभार के चलते हम कमोवेश तकनीकी निरपेक्षता की अोर चले गए। अौर अब पश्विमी तकनीकों पर अाश्रित होकर अपने विकास की संभावनाएँ तलाश रहे हैं। जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अपने नवनिर्माण के दौर में अाधुनिक तकनीक अौर विज्ञान को हृदय से अपनाया। शायद यही वह समय था जो मियाज़ाकी को मथता है अौर वे इससे थोड़ा घबराए हुए से प्रतीत होते हैं। यह घबराहट उनकी कई फ़िल्मों में परिलक्षित होती है। इसलिए उनकी फ़िल्मों में तकनीक का आकर्षण अौर भय दोनों उपस्थित हो जाता है। एक-दूसरे के सामने, एक-दूसरे से संवाद रचता हुआ। मनुष्य को तकनीक चाहिए भी अौर वही उसके लिए सबसे बड़ा संकट भी पैदा करती है। मेरा अनुमान है कि बचपन में देखे-सुने आणविक युद्ध की छाया मियाज़ाकी का हमेशा पीछा करती रही है। यह उनके लिए एक दुविधा भरा समय है जिसमें तकनीक, विनाश अौर राहत एक साथ लेकर आती है। तकनीक हमारे जीवन को सुगम बनाती है, उसमें व्यवस्था पैदा करती है। संविधान भी सामाजिक व्यवस्था रचने का उपक्रम करता है। तकनीक भौतिक रूप से प्रत्यक्ष होती है संिवधान अभौतिक होकर भी हमारा नियमन करता है। तकनीक बाह्य प्रकृति का नियमन करती है तो संविधान भीतरी प्रकृति के नियमन का उपक्रम है। एक प्रकृति बाहर है अौर दूसरी हमारे भीतर भी जिसमें सपनों के ज्वालामुखी धधकते हैं अौर इच्छाअों के तूफान उठ खड़े होते हैं। दोनों नियंत्रित करने की जरूरत होती है। जापानी समाज ने बहुत पहले तकनीक की महत्ता समझी थी। मियाज़ाकी का तकनीकी आकर्षण अौर बाबा साहब अंबेडकर का संविधान निर्माण दोनों सामाजिक नियमन के दो पहलू उभारते हैं जो कहीं जाकर एक ही राह पर आकर मिल जाते हैं भले ही एक में बाह्य प्रकृति अौर दूसरे में भीतरी प्रकृति को साधने पर अधिक बल हो। जैसे बाबा साहब ने दलितों के सशक्तिकरण का अभियान छेड़ा वैसे ही मियाज़ाकी अपनी फ़िल्मों में स्त्री की ताकत, गुणवत्ता, बौद्धिकता अौर संघर्षवाहिता का पूरे प्रभाव के साथ चित्रण करते हैं।
    इसी क्रम में ‘राजकुमारी मोनोनोके’का उल्लेख किया जा सकता है जिसका फलक बहुत व्यापक है। वह मिथकीय युग से आरंभ होकर आधुनिक युग तक की यात्रा जैसा अाह्लाद देती है। अनोखे देवी-देवताअों, राजकुमार-राजकुमारियों, दैत्यों, सघन वन प्रांतर, महाकाय पहाड़ों, वनैले रहस्यमयी जानवरों के सहारे मियाज़ाकी एक जादुई संसार बसा देते हैं। निर्जीव अौर सजीव चीजें एक दूसरे की पूरक बनकर उभरने लगती हैं। ‘पंचतंत्र’ अौर ‘विक्रम-बेताल’ का सम्मिश्रण-सा परिवेश उभरता है इस फ़िल्म में। फ़िल्मी तकनीक का उपयोग कर मियाज़ाकी अपने परिवेश को पर्याप्त डायनेमिक अौर प्रभावोत्पादक बना देते हैं जो कहानियों में शिथिल-सा दिखाई देता है। पाश्चात्य संस्कृतियों में तकनीक का डॉमिनेंश या वर्चस्व दीखता है जबकि प्राच्य संस्कृति तकनीक को मानव का अनुगामी बनाती है। इसलिए हॉलीवुड फिल्मों से हयाअो मियाज़ाकी की फ़िल्में बिल्कुल अलहदा हैं। ‘स्टार वार्स’ ‘टर्मिनेटर’, ‘किंग कांग’, ‘जुरासिक पार्क’, ‘एनाकोंडा’ अौर ‘स्पाइडर मैन’ जैसी फ़िल्मों अौर मियाज़ाकी की फ़िल्मों के विधायी तत्व-तकनीकी उपकरण, प्राकृतिक परिवेश, अनूठे जीवजंतु—भले ही एक जैसे हों पर उनके साथ किया गया ट्रीटमेंट बिल्कुल जुदा है। इसके चलते ही वे भारतीय संस्कृति अौर भावबोध के अधिक करीब दिखाई देते हैं। भारतीय परंपरा में ध्वंस अौर निर्माण के मिथक भरे पड़े हैं। जिनमें जलप्लावन अौर देव सभ्याता के विनाश की कहानी पौराणिक ग्रंथों से लेकर जय शंकर प्रसाद की रचना ‘कामायनी’ तक की केंद्रीय विषय-वस्तु है। ‘राजकुमारी मोनोनोके’ का प्रारंभ भी विध्वंस की आशंकाअों अौर आहटों के बीच होता है। राजकुमार युवक आशिताका अौर गाँव के एक बुजुर्ग को सुदूर सघन जंगल में कुछ अनहोनी सी घटित होती प्रतीत होती है। वे इसका जायजा लेने जब गाँव के वाच-टावर पर चढ़ते हैं पलक झपकते ही वन से निकला दैत्य उस टावर को तोड़ देता है। आशिताका किसी तरह एक पेड़ का सहारा लेकर अपनी जान बचाता है अौर देखता है कि दैत्य गाँव को विध्वंस करने को बढ़ा जा रहा है। अपने तीर कमान से वह दैत्य का बध कर देता है पर उसका हाथ जख्मी हो जाता है। बाद में बुजुर्गों की पंचायत अपने अनुभव से जान पाती है कि यह दैत्य कभी देव था। जो गुस्से अौर नफ़रत के अतिरेक के कारण दानव बन गया था। उसके अभिशाप के चलते आशिताका का घाव कभी नहीं भरेगा अौर अंतत: वह मर जाएगा अौर गाँव का विनाश भी निश्चित है। पंचायत यह फैसला करती है कि आशिताका यह पता लगाने के लिए पश्चिम देश की यात्रा पर चला जाय कि देव का दानव बनने का क्या कारण था। इससे ही मानवता का कल्याण हो सकता है। यह यात्रा ही फ़िल्म के केन्द्र में है जहाँ आशिताका नागो भगवान के बारे में जान पाता है जो वन-देवता था अौर बाद में मानव निर्मित लोहे की गेंद के प्रहार के चलते वही दैत्य बन गया था जिसका घाव लिए अपने याकूल पर आशिताका अभी भी घूम रहा है। इसी यात्रा में उसे लालची जिगो, लौह नगर ततारा की मलिका लेडी इबोशी, वहाँ जीवन यापन करती पुरानी वेश्याएँ अौर कोढ़ी, अजीबो-गरीब कोदामा, जंगल में रमण करती आत्माएँ, प्रचुर जल स्रोत अौर अनंत वनस्पतियाँ, भेड़िअों की देवी मोरो तथा उसके द्वारा पालित-पोषित राजकुमारी मोनोनोके, जंगल के अधिष्ठाता देव ‘विशाल रात्रिचारी’ (Nightwalker) आदि मिलते हैं। आशिताका की यह पश्चिम देश की यात्रा अौर उससे जुड़ी घटनाएँ-घृणा, प्रेम, लालच, प्रकृति अौर मनुष्य के संबंध, अौद्योगीकरण अौर उसके दुष्परिणामों का उजागर करने का काम करती है। अंतत: मियाज़ाकी यह स्थापित करते हैं कि मानव-सभ्यता अौर प्रकृति-पशु-परिंदे एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। नफ़रत को मिटाना कितना मुश्किल है यह इस फ़िल्म में बखूबी दर्शाया गया है। यह फ़िल्म घृणा पर विजय प्राप्ति का अभियान बन जाती है। वास्तविक जगत में नफ़रत को जीतने का ऐसा उपक्रम, पूरी दुनिया में, महात्मा गाँधी ने अलावा शायद ही किसी अौर ने किया है। जब पश्चिमी सभ्यता अौद्योगिकीकरण के रथ पर आरूढ़ प्रकृति का दोहन करने में जुटी थी तो गाँधी ही ऐसे शख्स थे जिन्होंने पूँजीवाद, मशीनीकरण अौर उद्योगीकरण का सार्थक क्रिटीक उपस्थित किया।
‘चिहिरो की कहानी’ एक दस साल छोटी बच्ची की कहानी है। जो अपने माता-पिता के साथ नए घर में प्रवेश करने जा रही है। पर राह भटकने के कारण वे बिल्कुल बीहड़-सी जगह में पहुँच जाते हैं। फिर उसके माता-पिता आकर्षण अौर लालच के फेर में आकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ युबाबा की पराभौतिक शक्तियाँ काम करती हैं। इसके फलस्वरूप उसके माता-पिता सुअर बन जाते हैं। युबाबा की यह जादू भरी दुनिया अनेक रहस्यमयी घटनाअों से पटी पड़ी है। युबाबा का सिर पक्षी अौर धड़ मनुष्य जैसा है। वहाँ मानव का प्रवेश वर्जित है। इस दुनिया में उड़ंतू ड्रैगन, तरह-तरह के जानवर, जो मनुष्य के ही रूपांतरित रूप हैं, मिलते हैं। पानी पर दौड़ती रेलगाड़ी है। इस रहस्यमय दुनिया में चिहिरो किसी तरह रहने की अनुपति पा जाती है जिससे वह अपने माता-पिता, जो अब शूकर बन चुके है, को पुन: मानव रूप में लाने का संघर्ष कर सके। मियाज़ाकी इस फ़िल्म में एक मायावी, रहस्यमयी, भुतहा लोक की रचना करते हैं जिसमें छोटी-बालिका चिहिरो का संघर्ष अौर सूझबूझ बखूबी चित्रित हैं। भारतीय नैतिक कथाअों की तरह मियाज़ाकी अपनी इस फ़िल्म में यह संदेश प्रस्तावित करते हैं कि ‘लालच अौर आकर्षण’ मनुष्य को जानवर बना देते हैं।
‘मेरा पड़ोसी तोतोरो’ एक प्रोफेसर तत्सुअो अौर उनकी दो बेटियों-दस वर्षीय सत्सुकी अौर चार वर्षीय मेइ की कहानी है जो अपने दूसरे घर में रहने जा रहे हैं। जहाँ के एक अस्पताल में बेटियों की माँ स्वास्थ्य लाभ कर रही है। जब बेटियाँ इस घर में पहुँचती हैं तो उनका सूक्ष्म कजली आत्माअों से साक्षात्कार होता है। वे भय अौर आश्चर्य से भर जाती हैं। उनके पड़ोस में रहने वाला केंता उनको यह बताकर अौर डरा देता है कि इस घर में भूतों ने डेरा डाल रखा है। केंता की दादी यह सब बताने के लिए उसे झिड़क देती है। एक दिन छोटी मेइ को कपूर के पेड़ के नीचे  सकरा रास्ता  दिखाई देता है जिसमें वह कौतूहलवश प्रवेश कर जाती है जहाँ उसका साक्षात्कार तोतोरो से होता है जो इन सूक्षम आत्माअों की सरगना है। ये आत्माएँ मनुष्यों को घर में पाकर नए खाली घर की तलाश में बाहर निकल जाती हैं। बाद में दोनों बच्चियों की सहृदयता तोतोरो को प्रसन्न कर देती है अौर परिणाम स्वरूप उनकी माँ स्वस्थ हो घर लौट अाती है।
‘हवा की उड़ान’ एक आत्मकथात्मक फ़िल्म है जिसने वर्तमान समय में एक विवाद को भी जन्म दिया। इसकी कहानी एक जंगी जहाज बनाने वाले इंजीनियर जिरो अौर क्षय रोगग्रस्त उसकी प्रेयसी नहोको की कहानी। जिरो को हवाई जहाजों से बड़ा लगाव था इसलिए वह पायलेट बनने का इरादा छोड़ उनके निर्माण से जुड़ जाता है। विफलताअों के बाद जब वह एक अच्छा जहाज बनाता है तो उसका इस्तेमाल द्वितीय युद्ध में किया गया जिससे उसे बहुत आघात लगा। मियाज़ाकी इस फ़िल्म में जापान के सैन्यीकरण की दिशा में बढ़ने के खतरों के प्रति आगाह करते नज़र आते हैं। फ़िल्म ने अपने इसी संदेश के चलते राजनीतिक विवादों को भी जन्म दिया है।
हयाअो मियाज़ाकी अपनी फ़िल्मों में शहर को गाँव, जीवित अात्माअों को मृत आत्माअों, तथ्य को कल्पना, जादू को यथार्थ, निराकारता को सकार, आसमान को धरती, जंगल को जमीन, जानवर को मनुष्य, यंत्र को तंत्र, इतिहास को स्मृति अौर लघुता को विराटता से जोड़ते हैं। इसलिए इसलिए जंगल में भेड़ियों के बीच पली राजकुमारी, कुमार आशिताका से प्रेम करते हुए भी करते हुए भी वन में ही रहने का निश्चय करती है। चिहिरो भुतहा लोक से अपने माता-पिता को वापस ला पाती है। नाऊसिका एक शांतिदूत बन मानव सभ्यता अौर प्राकृतिक शक्तियों के बीच स्थाई शांति की तलाश करती है। तोतोरो एक मददगार अौर मानवीय आत्मा के रूप में हमारे सामने आता है अौर जिरो अपने आकर्षक आविष्कार के बावजूद पश्चाताप से घिर जाता है। मनुष्य अपनी ही प्रजाति के खिलाफ हो जाता है, उसी का संघारक बन जाता है। मियाज़ाकी की फ़िल्मों मनुष्य की दोहरी तानाशाही पर चोट है। एक जिसमें वह दूसरे मानव समूहों के विरूद्ध युद्ध रचता है अौर दूसरा जिसमें वह समूची प्रकृति को हस्तगत करना चाहता है। उनकी फ़िल्में प्रकृति अौर अन्य प्राणियों पर मानव-तानाशाही का प्रतिवाद करती हैं।

भारत में राजनीति अौर धर्मनीति साथ-साथ चलती हैं। बुद्ध राज-कुमार होकर सन्यासी बन जाते है, गाँधी राजनेता होकर वैष्णव भजन गाते हैं, अम्बेडकर आधुनिक भारत का संविधान रचते हुए भी बौद्ध धर्म में दीक्षा लेते हैं। हयाअो मियाज़ाकी भी राजनीति अौर कलानीति को एक साथ लेकर चलते हैं। जब उन्हें अमेरिका में अॉस्कर समारोह में सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया तो वहाँ न जा पाने के बारे में उनका जवाब था-‘I didn’t want to visit a country that was bombing Iraq’.आखिरकार कलाएँ, धर्म, दर्शन तथा राजनीति समाज को सँवारने के लिए ही तो हैं अौर मियाज़ाकी अपनी फ़िल्मों के जरिए यही वैश्विक संदेश रचते हैं।

नया मीडिया और हिंदी का बदलता परिप्रेक्ष्‍य


डॉ0 राम प्रकाश द्विवेदीएसोसिएट प्रोफेसरहिंदी विभाग (पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम)
भीमराव अंबेडकर कॉलेजदिल्‍ली विश्‍वविद्यालयe-mail:rampdwivedi@gmail.com
blog:hindimedia.blogspot.com

भाषाओं का जीवन उनके तकनीकी अनुकूलन पर निर्भर करता है और भाषा के अभाव में साहित्‍य और संस्‍कृति का निर्माण असंभव है। दुनिया की विभिन्‍न  भाषाएँ इस चुनौती से लगातार गुजरी हैं और जो इसमें पिछड़ गयीं वे लुप्‍तप्राय हैं। हिंदी भी इसप्रकार की चुनोती से गुजर चुकी है और देवकीनंदन खत्री ने अपने उपन्‍यासों के द्वारा जब वाचिक परंपरा को पाठकीय परंपरा में तब्‍दील किया तो हिंदी को जीवनदान देने जैसा कार्य ही उन्‍होंने किया था। आज जबकि कंप्‍यूटर और इंटरनेट जीवन के हर क्षेत्र के नियमन में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं तो हिंदी को निश्चित तौर पर इस तकनीक के साथ ताल-मेल बिठाना पड़ेगा। इस शोध लेख से हिंदी के इसी पहलू को केंद्रीय तौर पर रेंखांकित किया गया है जिससे हिंदी भाषा और साहित्‍य निर्बाध रूप से अपने पथ पर अग्रसर होते रहें।

भूमंडलीकरण ने विभिन्न समूहों के विस्थापन का कार्य किया है तो तकनीक द्वारा उनके आपसी संबंध को बचाने और संपर्क सूत्र जोड़े रखने का भी। हिंदी का आभासी संसार इसीलिए अचानक महत्‍वपूर्ण हो उठा है। हिंदी निरंतर इंटरनेट और आभासी संसार पर अपनी उपस्थिति कायम कर रही है। वैसे तो अनेक वेब साइट समग्र रूप में हिंदी में मौजूद हैं परंतु हिंदी का मौलिक लेखन, पत्रकारीय लेखन और साहित्य  भी आभासी संसार में उपस्थित हो रहा है। पुराने साहित्य और जीर्णशीर्ण हिंदी सामग्री  के डिजटलीकरण की प्रक्रिया भी जोरों पर हैं परंतु मल्‍टीमीडिया से जुड़ी सामग्री का अभाव देखा जा रहा है। हाँ, टेक्स्‍ट के स्तर पर कार्य संतोषजनक प्रतीत होता है। साहित्य  के साथ-साथ हिंदी में ब्लॉग लेखन भी विपुल मात्रा में हो रहे हैं। ब्लॉगिंग के जरिए अनेक दबी हुई अवाजें मसलन स्त्री और दलित विमर्श संबंधी मसलों की जानकारी सुगमता से उपलब्ध हो रही है। एक प्रकार से ब्लॉग ने सर्वथा नए मंच का विकास कर दिया है जिससे हिंदी में अभिव्‍यक्ति की विविध संभावनाएँ और भी पुख्ता  हो चली है। इस नए परिदृश्‍य के मद्देनजर आभासी संसार में हिंदी के दखल, दायित्‍व और दिशा की पहचान करनी होगी और समुचित सुझाव प्रस्‍तुत करेगा। निश्‍चय ही इससे भूमंडलीकरण के चलते प्रकट हुई चुनौतियों को समझने में मदद मिलेगी और हिंदी भाषा, साहित्‍य और हिंदी जाति को बदलते परिप्रेक्ष्‍य में सक्षम बनाए रखने में मदद मिलेगी।  

  सामाजिक परिवर्तन में भाषा और तकनीक दोनो की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। आज हमारे जीवन के प्रशासनिक कामकाज, शिक्षण,सूचना संबंधी पारदर्शिता,मनोरंजन का प्रसार और निजी अभिव्‍यक्ति की अनेक राहें इंटरनेट और कंप्‍यूटर ने खोली हैं। मीडिया, भाषा और समाज के बीच नए किस्‍म के संबंध पनप रहे हैं। हमारे जीवन की कठिनाइयों को सुलझाने में आभासी संसार सक्रिय हुआ है। परंतु आभासी संसार में हिंदी की उपस्थि‍ति अभी भी संतोषजनक नहीं मानी जा सकती है।  आम लागों तक इस तकनीक की पहुँच तथा हार्डवेयर और परिचालन संबंधी कठिनाइयों की निरंतरता अभी भी विद्यमान है। आम आदमी तक इस तकनीक की पहुँच और इसके प्रभावी इस्‍तेमाल पर रोशनी डालनी पड़ेगी साथ ही भाषा और डिजिटल बँटवारे की समस्‍या को सुलझाने में मदद भी करनी होगी। आज भाषा, तकनीक, मीडिया और समाज के जटिल होते रिश्‍तों की मुक्‍कमल पहचान कर उन्‍हें एक दिशा प्रदान करने का उद्यम करना जरूरी हो गया है ।

नयी तकनीक भाषा और साहित्य के नये रूप और नयी विधाओं का सृजन करती है। यदि हिंदी का आधुनिक काल गद्य विधाओं और पत्रकारिता का उद्भव काल था तो पिछली सदी के अंतिम दशक ने सूचनापरक, डिजिटल कंटेंट,पटकथा,फीचर,विज्ञापन, कॉपी लेखन जैसी नयी विधाओं का निर्माण किया है। इंटरनेट जैसी तकनीक के आगमन के चलते वेब पृष्ठ सामग्री का निर्माण और ई-लेखन तथा ब्लॉग के लिये लेखन जैसी पॉपुलर विधाएँ बन कर उभरी हैं। इन विधाओंकी शैली,कथन भंगिमा,अभिव्यक्तियाँ,भाषा,शब्द-संख्या और सरोकार बिल्कुल बदले हुए हैं। वेब पृष्ठों का निर्माण और ई-लेखन एक अलग प्रकार के कौशल की माँग करता है। यहीं से हिंदी भाषा के स्वरूप और उसकी साहित्यिक विधाओं में निर्णायक बदलाव आने लगते हैं।  हिंदी खुद को वेब सामग्री के अनुरूप ढालने लगती है।आइए देखें की इस अनुकूलन के लिये हिंदी को किन चुनौतियों से गुजरना पड़ा।
इंटरनेट पर लिखी जा रही हिंदी को मैं वेब-हिंदी के रूप में संबोधित कर रहा हूँ। इस हिंदी के लिये न केवल अलग किस्म की सामग्री के निर्माण की आवश्यकता होती है वरन इसके लेखन के लिये जो जरूरी औजार हैं वे  कागज-कलम न होकर की-बोर्ड और कंप्‍यूटर हैं। इसी प्रकार इनके पठन के लिये हमारी इंद्रियों से ही काम नहीं चलता अपितु इलेक्ट्रानिक उपकरणों की भी जरूरत पड़ती है।इस तरह वेब-हिंदी एक नयी शैली और नयी विधा है जिसका उपयोग साहित्य, पत्रकारिता,सूचना,ज्ञान और प्रशासन सभी क्षेत्रों में हो रहा है।वेब-हिंदी इस अर्थ में हमारी समकालीन जरूरत भी है और भविष्य की पथ-प्रदर्शक भी। इसके महत्व को कतई नकारा नहीं जा सकता।वेब-हिंदी के स्वरूप में निर्णायक बदलाव तब आया जब यूनिकोड का विकास हुआ। इसके पहले जब फाँट के जरिये भाषाई लेखन होता तो अनेक समास्याएँ हमारे समक्ष आती थीं।कारण था कि फाँट की संख्या सैकड़ों में है और वे एक दूसरे के साथ संवाद की स्थिति में नहीं होते हैं। अर्थात, एक ही भाषा के  बीच भी लेखन की तारतम्यता नहीं थी। यूनीकोड ने न केवल इस समस्या से निजात दिलवाई वरन हिंदी जैसी अनेक भाषाओं के निर्बाध संप्रेषण को इंटरनेट के जरिये सुनिश्चित कर दिया।
वेब-पटल, मुद्रण और स्क्रीन के साथ एक महत्त्वपूर्ण जगह बनती जा रही है जहाँ प्रभावशाली अभिव्यक्ति का अवसर विकसित हो रहा है।मल्टीमीडिया के समायोजन के चलते वेब माध्यम ने अपने पूर्ववर्ती माध्यमों का सक्षम विकल्प प्रस्तुत किया है। प्रिंट,रेडियो,टेलीविजन आदि के समायोजन से वेब-मीडिया ने अपनी मुक्म्मल पहचान बनाई है।
सूचना और संदेश प्राप्ति की जितनी आजादी वेब मीडिया ने प्रदान की है उतनी अन्य माध्यमों द्वारा संभव न थी।एक विकेंद्रित माध्यम होने के चलते सूचना और संदेश की पहुँच बहुतायत लोगों तक वेब मीडिया के जरिये ही सुनिश्चित हुई। इस अर्थ में वेब-हिंदी एक नव जनतांत्रिक अभिव्यक्ति की विधा बन गयी है।  वह आभासी संसार में नई रोशनी से दीप्‍तमान हो रही है।
आभासी संसार से अभिप्राय उस संसार से है जो हमारी सूचना, संवाद और अभिव्यक्ति संबंधी जरूरतों को पूरा करता है। ज्ञानमूलक प्रक्रिया के एक बड़े सहायक के रूप में भी आभासी संसार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। दुनिया की भाषाओं के लिए जरूरी होता जा रहा है कि वे अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आभासी संसार पर भी अपनी पहुँच सुनिश्चित करें। हिंदी को भी ऐसा करना अनिवार्य है अन्यथा वह दुनिया की अन्य भाषाओं से पीछे रह जाएगी। विगत वर्षों खासतौर पर नब्बे के दशक के बाद हिंदी भाषी आभासी संसार एक निर्णायक भूमिका में आ खड़ा हुआ है। । एक अन्य  परिघटना जिसमें विभिन्न भाषा-भाषी समूह के लोग प्रवास की प्रक्रिया में शामिल हुए हैं,उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए तथा उन्हें अपनी संस्कृति और भाषा से संवाद बनाए रखने के लिए  आभासी संसार का महत्व और भी बढ़ गया है। हिंदी का आधुनिक रूप कई पड़ावों से होता हुआ अपने वर्तमान स्वरूप तक विकसित हुआ। संस्कृत और अपभ्रंश की राह तय करती हुई वह पुरानी हिंदी के रूप में सन् 1000 ई0 के आसपास अपना आरंभिक स्वरूप अख्तियार करती है।मौखिक परंपराओं से गुजरती हुई हिंदी विभिन्न बोलियों में प्रस्फुटित होती है।लेखन की तकनीक ने इसे अलग ही नजरिये से सृजित किया।आधुनिक काल में जब छापाखाना आया तब हिंदी के गद्य रूपों का गठन प्रारंभ हुआ। हिंदी के काव्य से गद्य में रूपांतरण की प्रक्रिया मुद्रण तकनीक के बिना संभव न थी।हमारे समकालीन समाज में जीवन की चुनौतियों को धारण करने की क्षमता गद्य-रूपों में अधिक है। मुद्रण की तकनीक न केवल नयी साहित्यिक विधाओं का सृजन करती है अपितु वह जीवन की अभिव्यक्ति का भी महान उपक्रम बन जाती है। भाव की भाषा को विचार की भाषा बनाने में मुद्रण तकनीक की महती भूमिका रही है। तकनीक का आगमन भाषा के भावबोध को बदल कर रख देता है और भाषा की सर्वथा नयी शैलियों का आविष्कार इनके जरिये होता है। वे भाषा-भाषी समूह के लिए अभिव्यक्ति के नए आलोक-वृत्त रचती हैं। ज्ञान के यातायात के रूप में भी तकनीक का जबर्दस्त इस्तेमाल होता है। जब हमारे यहाँ मुद्रण की तकनीक का  प्रयोग बढ़ा तो पश्चिमी जीवन-दर्शन और ज्ञान की परंपराओं का आदान-प्रदान सुगमता से होने लगा और वे विश्व के हर कोने में पहुँचने लगीं। अंग्रेजों को अपना शासन स्थापित करने में मुद्रण की तकनीक से मिली सहायता की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आम आदमी का जीवन तकनीक से बहुविध प्रभावित होता है और अभिव्यक्ति के नए संदर्भ प्रकट होने लगते हैं।
हिंदी में अभिव्यक्ति के नए माध्यमों का विकास आभासी संसार के जरिए हुआ है। आज डिजिटल मीडिया में हिन्दी विज्ञापनों की प्रचुरता देखने को मिलती है। कारपोरेट ब्लॉगिंग ने व्यावसायिक गतिविधियों के लिए एक नयी जगह पैदा की है। हिंदी में विपणन और व्यापार की नई संभावनाओं का सृजन इंटरनेट और आभासी संसार के द्वारा निरंतर किया जा रहा है। ई-कामर्स ने हिंदी भाषी क्षेत्र में अपनी मजबूती कायम करनी शुरू कर दी है। व्यावसायिक गतिविधियों को नई ऊर्जा और गति देने में आभासी संसार की सघन भूमिका देखी जा सकती है।आन लाइन विज्ञापनों के जरिए व्यावसायिक प्रोन्नति और ग्राहकों तक पहुँच को सुनिश्चित करने का कार्य बड़े ही प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। आज अनेक ऐसी वेबसाइटें हैं जिन पर हिंदी में विज्ञापन दिए जा रहें हैं और इससे दोहरा लाभ हो रहा है। एक ओर विज्ञापनदाता कंपनी को किफायती दर पर आम लोगों तक पहुँचने में सुभीता हो रहा है तो दूसरी ओर संचारकों को अपने ब्लॉग तथा वेबसाइट संचालन में सुविधा हो रही है। इस प्रकार आभासी संसार में व्यावसायिकता और अभिव्यक्ति एक दूसरे के पूरक बन कर उभर रहे हैं। 
प्रशासनिक नियोजन में भाषा की अभूतपूर्व भूमिका होती है। हिंदी भारत गणराज्य की राजभाषा होने के चलते प्रशासनिक कार्यो में विपुलता से प्रयोग में लायी जाती है। आभासी संसार ने प्रशासनिक कामकाज को गति प्रदान की है। यह दो स्तरों पर दिखायी पड़ता है। एक तो प्रत्यक्ष उपस्थिति के बंधन से मुक्ति और दूसरे पारदर्शिता का सुनिश्चय। इस क्षेत्र में भारतीय रेल एक दृष्टांत बन चुकी है। लेकिन प्रशासनिक नियमन के अनेक नए आयाम विकसित होने बाकी है। इंटरनेट पर हिंदी की प्रभावशाली उपस्थिति से आम लोगों को अपने अधिकारों की मुक्कमल जानकारी मिल सकेगी और वे अपने हक पाने के लिए सक्षम तरीके से उठ खड़े होंगे। सरकार द्वारा चलायी जा रही जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी आम आदमी तक पुख्ता तरीके से पहुँचाने में आभासी संसार की भूमिका दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। परंतु इसके लिए जरूरी है कि वह आम जन की भाषा में भी हो। आभासी जगत में हिंदी की उपस्थिति इस अर्थ में कितनी हो पायी है इसे भी देखना अनिवार्य है। 
संप्रेषण का सवाल किसी माध्यम पर भाषायी उपस्थिति भर से नहीं होता अपितु यह भी देखना जरूरी है कि भाषा का स्वरूप कैसा है। अधिकांश हिंदी पोर्टलों की समस्या यह रही है कि वे आम बोलचाल के शब्दों की उपेक्षा कर तत्समधर्मी शब्दों का प्रयोग करते हैं। इससे हिंदी अपनी चमक खो देती है और वह इंटरनेट माध्यम के अनुकूल भी नहीं बन पाती है। प्रशासनिक हिंदी का अब तक का स्व रूप काफी अचंभित करने वाला है। वह जटिल वर्णमाला का पर्याय बना हुआ है। इंटरनेट पर इस सरल और सहज बनाए जाने की जरूरत है। इसी प्रकार देश के विभिन्न कानूनों की जानकारी तथा संवैधानिक प्रावधानों की सूचना आम लागों तक पहुँचाकर हम उनको सशक्त बना सकते हैं। भूमि अभिलेखों के निर्माण में आभासी संसार और हिंदी की युगांतकारी भूमिका हो सकती है। बैंकिंग और शिक्षा के क्षेत्र ऐसे अन्य क्षेत्र हैं जहाँ वेब-हिंदी का व्यापक प्रचलन समाज में आमूल परिवर्तन घटित करने में सक्षम हो सकता है।यदि देखे तो भारत में किसानों का भी एक बड़ा तबका है जो रोजमर्रा के जीवन में कृषि संबंधी मामूली सूचनाओं से वंचित है । हिंदी के जरिए उस तक ये सूचनाएँ आसानी से पहुँचायी जा सकती हैं। इसीप्रकार गैर संगठित क्षेत्रों में मजदूरों की बड़ी संख्या  कार्यरत है और उसे भी अपने हक-हकूक की जानकारी नहीं है। वेब हिंदी के द्वारा यह काम सरलता से किया जा सकता है। सरकार और प्रशासन अलग- थलग पड़े सामाजिक समूहों को मुख्य धारा में लाने का उद्यम भी वेब हिंदी के जरिए आसानी से कर सकते हैं। गरीबी और अज्ञान भारत के दो बड़े विषाणु हैं।रोजगार के अवसर और स्वास्‍थ्‍य  संबंधी जानकारी के अभाव में हमारे बहुत सारे युवजन यों ही भटकते रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अभाव और भी अधिक जटिल रूप में हमारे सामने आता है। भाषा ऐसे क्षेत्रों में एक बड़ा सवाल बनकर खड़ी हो जाती है। आभासी संसार में इसीलिए हिंदी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। विभिन्ऩ हिंदी भाषी राज्यों  में प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए सरकारों ने अपने पोर्टल निर्मित किए हैं और उनके जरिए आम जनता से जुड़ने का उपक्रम किया है। जनता की संवादशीलता की पहचान करने के लिए पोर्टल पर आ रही प्रतिक्रियाओं और प्रतिपुष्टियों की जाँच जरूरी है, जिससे उनमें (पोर्टल)सुधार किया जा सके। यहाँ यह मूल्‍यांकन भी जरूरी हो जाता है कि उनकी भाषाई संरचना कैसी है और वे सूचनाओं को कितने प्रभावी ढंग से संप्रेषित कर पा रहे हैं।
          
 साहित्यिक हिंदी भी निरंतर इंटरनेट पर आरूढ़ हो रही है। वैसे तो अनेक वेब साइट समग्र रूप में हिंदी में उपलब्ध है परंतु हिंदी का मौलिक लेखन और साहित्य  भी आभासी संसार में उपस्थित हो रहा है। पुराने साहित्य के डिजटलीकरण की प्रक्रिया भी जोरों पर है। हालाकि इनमें अभी भी दृश्य-श्रव्य सामग्री का अभाव देखा जा रहा है पर टेक्स्‍ट के स्तर पर कार्य संतोषजनक प्रतीत होता है।इसमें कविताओं और गद्य की समस्तर विधाएँ शामिल हैं।विकीपीडिया,कविताकोश,गद्यकोश और वेबदुनिया जैसे पोर्टल हिंदी साहित्य  की प्रचुर सामगी को इंटरनेट पर लाने की दिशा में सक्रिय हैं। साहित्य  के साथ-साथ हिंदी ब्लॉग भी विपुल मात्रा में हिंदी की सामग्री परोस रहे हैं। यहाँ गंभीर और मौजू दोनों प्रकार का लेखन हो रहा है। हिंदी भाषा में अभिनव प्रयोग भी यहीं देखने को मिल रहे हैं। सूचनाओं का एक बड़ा व्यापक संसार यहाँ देखने को मिलता है।विभिन्न  क्षेत्रों से ब्लॉगर अपने अनुभव, सूचनाएँ और दृश्य ब्लॉग पर उपलब्ध  करवाते हैं जिससे हमें हिंदी में एक बहुआयामी जानकारी उपलब्ध हो रही है। हिंदी ब्लॉगर केवल भारत की सीमा तक ही महदूद नहीं हैं वरन् भारत के बाहर भी उनकी एक अच्छी संख्या है और वे सक्रिय भी हैं। भूमंडलीकरण ने विभिन्न समूहों के विस्थापन का कार्य किया है तो तकनीक द्वारा उनके आपसी संबंध को बचाने और संपर्क सूत्र जोड़े रखने का भी। ब्लॉगिंग के जरिए यह बड़ी सुगमता से संभव हो पा रहा है। अनेक दबी हुई अवाजें मसलन स्त्री और दलित विमर्श संबंधी मसले भी ब्लॉग पर सुगमता से उपलब्ध हो रहे हैं। एक प्रकार से ब्लॉग ने सर्वथा नए मंच का विकास कर दिया है जिससे विविध विमर्शों की संभावना और भी पुख्ता  हो चली है। 
इंटरनेट पर मल्टीनमीडिया से संबंधित हिंदी की विपुल सामग्री उपलब्ध है। इसमें पॉडकास्ट , चित्र और दृश्य-श्रव्य सामग्री की विपुलता देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए यू-ट्यूब पर अनेक छवियाँ, वीडियो आदि अपनी आहट दर्ज कर रहे हैं। इनमें मुख्यधारा की सामग्री तो है ही बहुतायत में वह सामग्री भी है जो लोकजीवन से संकलित की गयी है। अनेक सामग्री ऐसी भी है जो निजी स्रोतों से आयी हुई है। कुल मिलाकर हिंदी में ज्ञान,सूचना और मनोरंजन संबंधी सामग्री का आगम इंटरनेट पर बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय भाषाएँ जो संकुचित भूगोल में सिमटी हुई थीं आभासी संसार में आकर अपना विस्तार कर रही हैं। हरियाणवी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, छत्तीसगढ़ी, कुमाउंनी, गढ़वाली, राजस्थानी आदि का साहित्य,संगीत और दृश्य इंटरनेट के द्वारा अपनी सीमाओं का भंजन कर रहा है। इसप्रकार हिंदी की बोलियों और उपभाषाओं का पुनर्उद्धार हो रहा है। वैसे तो चित्रों की कोई भाषा नहीं होती परंतु अपने कैप्शन आदि से वे भाषाई आधार पा जाते हैं।फ्लिकर और पिकासा वेब पर चित्रों को देखा जा सकता है जो हिंदी जाति,भाषा,संस्कृति और साहित्य से जुड़े हैं। 
आभासी संसार में हिंदी की उपस्थिति हिंदी भाषी समूह की जरूरतों,आकांक्षा और अभिव्यक्ति का परिणाम है। हिंदी के प्रवासी संसार से जुड़े रहने और उन्हें जोड़े रखने के लिए जरूरी है कि वह आभासी संसार में अपनी प्रभावशाली, मार्मिक और सार्थक दस्तक दे। प्रशासनिक कामकाज और जनकल्याणकारी योजनाओं को आमजन तक पहुँचाने के लिए हिंदी का आभासी संसार में आना लगभग अनिवार्य है। साहित्य संचय और उसके प्रसरण में भी हिंदी का आभासी संसार अपनी भूमिका का निर्वाह सुगमता से कर सकता है। हिंदी के मनोरंजन जगत को समृद्ध बनाने में इस आभासी संसार की सुदृढ़ भूमिका हो सकती है।इन विभिन्न आयामों और इसकी चुनौतियों को संबोधित किया जाना चाहिए।    

हिंदी मीडिया ने आजादी के दौरान अपनी क्रांतिकारी और सार्थक भूमिका का  निर्वाह किया था। आज का हिंदी मीडिया पर्याप्‍त विकसित हो चुका है परंतु पूँजी और सत्‍ता का दबाव भी उस पर उतना ही बढ़ा है। सायबर पत्र-पत्रिकाओं ने इस दबाव को कम करने और एक वैकल्पिक मीडिया की स्‍थापना करने में अपनी महती भूमिका निभायी है। मीडिया का वास्‍तविक कार्य जनसरोकारों को उभारना और सरकार को उसके प्रति जवाबदेह बनाना है। आभासी संसार का हिंदी मीडिया मुख्‍यधारा के मीडिया की तुलना में इस कार्य को किस हद तक अंजाम दे पाने में सक्षम हो सका है और इसे कैसे अधिक सुदृढ़ बनाया जा सकता है, इस पर अभी ठीक से विचार नहीं हो सका है। 

भाषा का आधार उसका साहित्‍य है जो भाषाई समूह की सांस्‍कृतिक विरासत और जीवन मूल्‍यों को संजोता है और उनका विकास और परिष्‍कार भी करता चलता है।साहित्‍य को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि भाषा सर्वथा नई तकनीक पर आरूढ़ होती चले। मौखिक परंपरा के बाद लेखन और फिर मुद्रण तकनीक को अपनाते हुए ही हिंदी अपना महत्‍व,प्रभाव और पहुँच बनाए रख सकी है। अब बारी सायबर माध्‍यम पर सवार होने की है। आज रोज नई वेब साइट्स और ब्‍लॉग हिंदी में बन रहे हैं, परंतु उनका प्रभाव और प्रसार कितना है यह आकलन का विषय है। अंग्रेजी हुकूमत ने जब कलकत्‍ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्‍थापना कर हिंदी की पाठ्यपुस्‍तकों का निर्माण कराया तो उसके पीछे उनका मंतव्‍य हिंदी की सेवा न होकर जनता पर उनकी भाषा के जरिए प्रभावी ढंग से शासन की क्षमता हासिल करना था। आज एक प्रभावी भाषा के रूप में हिंदी का स्‍वरूप हमारे समक्ष है। नया मीडिया इसे नए आकार में गढ़ रहा है।माध्‍यम और भाषा एक दूसरे के पूरक होने बावजूद एक दूसरे को बदलते है। नया मीडिया और हिंदी इसी अन्‍योन्‍याश्रिता के साथ आगे बढ़ रहे हैं।    

Literary & Cultural Perspective of Terrorism



Presented at National Seminar, 17 December 2005
Department of Psychology, B R Ambedkar College, Univ. of Delhi.




                                                       
                                                 -                         Dr. R.P.Dwivedi
                                                
       The question of terrorism is always debated as ‘legitimate’ and ‘illegitimate’. Many a time freedom fighters and revolutionaries are also termed as terrorists. Our literature, creative as well as factual, is full of such instances. In our history, Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev were declared as terrorists, during British Rule, and hanged for their struggle. Needless to say that there are many more examples for such people. History is a rather more modern area of study than literature. In our ancient and medieval literature there were many words for the people engaged in ‘illegitimate’ deeds e.g. demons, devils etc. Therefore ‘terrorism’ is a new concept/word, which essentially represents a ‘Human’ involvement in destructive and illegal activities, which is completely different from demons, and devils, which were equally equipped with supernatural powers like their counterparts Gods. So, terrorism is not just a mythological story but it really creating a big problem and challenge to our civilized society.

       Right to protest and right of expression of ideas are the basic rights in any democracy. Terrorism is also a kind of protest-towards the establishments and the system from which a group of people, generally called terrorists or extremists, feel dissatisfaction and use means of violence. Thomas Perry Thornton proposed an often-cited definition in 1964, terrorism entails "a symbolic act designed to influence political behavior by extra normal means, entailing the use or threat of violence.” But, sometimes-violent protests too cannot be categorized as terrorism as in the case of  Bhagat Singh and others.

       Some scholars also see loss of identity as the reason behind the terror acts. Modern society transforms us into a multi-identity personality. We could born as a Hindu, Muslim or Buddhist (religious identity), Hindi, Urdu, Bengali or Tamil (linguistic identity ) speaking family, Brahmin, Vaishya or Kshatriya or Dalit (Jati identity) and Indian, Pakistani, Afghani (national-geographical identity). If a person focuses, adopts and emphasizes only one identity and forgets about the rests, it’s quite possible, that person will generate an inclination towards terrorism. For example, a person born in a Hindu family is also part of Tamil speaking group (Linguistic) as well as Dalit (Jati) and Indian (National). So people get some of their identities by birth, which are beyond their control, many other they achieve with their education, activities, jobs etc. If a person, for example Osama Bin Laden, forgets about his other identities and strongly sticks to only one, his religious identity i.e. Muslim and feels unsatisfied with the treatment towards it by America he will initiate terrorists activities against it killing innocent and common people. Osama Bin Laden is a Muslim but at the same time he is human being, a global citizen, an Afghan national too but he identifies himself as only and only as Muslim and forgets rest of his identities. Sole-identities or imbalanced identities gives birth to terrorism. Multiple identities make us a responsible and tolerant person and inspire us to walk along with the world-order.

       One of the major reasons of the terrorist’s activities is to seek attention of common people through media for an special ‘cause’. In nineteenth century with the rise of media-newspapers, magazine, radio and TV- terrorist activities are widely covered and thus have a great impact on our social-psyche. Creative artist-film makers, writers, poets, painter and photographers-also find terrorism as an important social concern and depict it in their art. In literature complexity of terrorism is raised and sometimes-sympathetic views also appear. Many scholars like  renowned Bengali author Mahashweta Devi and Arundhati Roy bring criticism from fellow writers for their sympathetic writing on terrorism. There are many more writers, word wide, who have such kind of opinion. They blame economic disparity and political hegemony among nations for international terrorism. Exploitation of natural resources for the benefit of small chunk is another major cause for terrorist activities in India. Surely, Naxalism, is a major part of our literary writings as well as cinema. Naxal movement, despite it strong ideological acceptance, has been termed  as terror activity by the government machinery and pacifist institutions. Now there is a vibrant and hot debate about it in literary domain. In the last 150 years, there have been countless novels, stories, and thrillers in which terrorists play the villain. Their cleverness, secrecy, their tactics to shake the system and topple the government establishments and police forces, their irrational desire to kill innocent people across the world are finding space in creative writings and getting popularity among wide range of readers.

       Some authors, particularly fiction writes and filmmakers have focused on the socio-economic and political conditions that give rise to terrorists as an organized group, others have focused on the cultural and religious institutions that terrorists claim to oppose. There are many writings, which try to  identify social conditions and psychological roots of terrorism. some literature explains or criticizes, while others focus only on the experience of being a victim of terrorism.

       Culture is an integral part of human existence. Cultural values shape our day-to-day life and give strength for our survival. Culture also provides us a distinctive identity and feeling of proudness. In almost all the cultures across the world self-sacrifice is a key value. whenever there is a danger on an identity and cultural-value system from an ‘outsider’ some people come forward to protect it and willingly sacrifice their lives and taking others. In Indian society religion plays a vital role in cultural activities. Religion is so strong that it has penetrated into our political system and influencing common people in all arena of their lives. Recently, religion based terrorism has is rising allover the world. A controversial term ‘Hindu Terrorism’ too can be heard in common discussions. Such type of terrorism emerges because of some people think that there is a threat to their religious beliefs and values from other cultures or religious communities. Terrorists conduct extremist activities and use violence as part of  their duty without any regret. Killing others and challenging ‘authorities’ give them pleasure and feeling of strength. After 9/11 (2001, America) the world has become new battle ground for terrorist groups and  pacifist agencies. Scholars also analyze it as capitalist point of view and raise issue of developed and underdeveloped nations. There is also a feeling of ‘right’ and ‘wrong’ to trigger extremist activities. In recent years Islam and Christianity are highly loaded with such feeling. In literature we can categorically identify these cultural tussles.


       Needless to say that literature and culture, jointly, can show the path to overcome the problem of terrorism. Cultural tolerance must be taught to the society through literature. Non-violence, tolerance, apropkra, peaceful protest, faith in democratic values and respect for others should incorporated in literary writings and cultural activities. Many authors, poets, film makers, artists are doing a lot but still there is much more required to be done in this direction.

28 जून, 2015

जापान मे हिन्दी शिक्षण: सोशल मीडिया की भूमिका

जापान मे हिन्दी शिक्षण: सोशल मीडिया की भूमिका
जापान में निवसित होने के लिए अनेक जरूरी चीजों के बारे में वहाँ की सरकार कई प्रकार के परामर्श देती है। इन परामर्शों में से एक फोन का होना भी जरूरी बताया गया है। अक्सर छात्र अौर अन्य लोग स्मार्टफोन के साथ सभी जगहों पर दिखाई देते हैं। फोन के जरिए बहुत सी सूचनाअों तक पहुँच सुनिश्चित हो जाती है। युवा लोगों में सोशल मीडिया सबसे लोकप्रिय है। इसलिए फोन की घंटी कभी नहीं बजती। ऐसा करना असभ्यता की श्रेणी में आता है। केवल सोशल मीडिया के द्वारा संदेशों अौर सूचनाअों का आदान-प्रदान करना उचित अौर शालीन तरीका है। जापान निजता को एक विशेष अधिकार के रूप में बड़ा अधिक महत्व देता है। इसलिए सीधे-सीधे बात करने में लोग संकोच करते हैं। ई-मेल या सोशल मीडिया के द्वारा बातचीत करना अधिक पसंद किया जाता है। शिक्षा सामाजिक व्यवहार का ही एक अंग है। जापानी छात्र देश की व्यवस्थित तकनीक का इस्तेमाल अपने शिक्षण के लिए करते हैं जिसमें निजता के संरक्षण का भाव हमेशा बना रहता है।  पूरी दुनिया में लगभग दो सौ सोशल-माध्यम विभिन्न जरूरतोंके अनुसार सक्रिय हैं। जिनमें शैली अौर तकनीक का व्यापक वैविध्य देखने में आता है। ऐसा भी देखा गया है कि विभिन्न देशों के अपनी आवश्यकतानुसार विभिन्न सोशल-माध्यमों को अपनाते हैं। शिक्षण में मुख्यत: चार प्रकार के सोशल मीडिया का उपयोग अधिक होता है। ट्विटर जैसे शब्द-सीमा से बँधे माध्यम, फेसबुक जिनमें शब्द, चित्र अौर वीडियो सभी का इस्तेमाल संभव है तथा यू-ट्यूब जैसे विशुद्ध वीडियो अाधारित माध्यम एवं साउंड-क्लाउड जैसे पूरी तरह ध्वनि आधारित माध्यम जापान में भाषा शिक्षण के कारगर अौजार बन गए हैं। इनके अतिरिक्त ब्लॉग, गूगल प्लस, इंस्टाग्राम, पिंटरेस्ट अौर अन्य सोशल माध्यमों का उपयोग किया जाता है। भाषा अौर संस्कृति अविभाज्य हैं इसलिए संस्कृति के बोध के साथ ही भाषा-शिक्षण का महत्व स्थापित होता है।  सोशल मीडिया समसामयिक संस्कृति अौर भाषा-प्रयोग का जीवंत मंच है। संस्कृति के विभिन्न घटकों का सोशल मीडिया के जरिए साक्षात्कार कराना सहज-सुगम अौर किफायती है। इसलिए जापान में सोशल-मीडिया का उपयोग कर हिन्दी-शिक्षण करना समय की अपरिहार्यता है।
भाषा शिक्षण के लिए चार चरण महत्वपूर्ण हैं, जिनमें पढ़ने, लिखने, बोलने अौर सुनने-समझने को सम्मिलित किया जा सकता है। तो सबसे पहले बोलने-सुनने के बारे में बात करना ठीक होगा।जापानी भाषा में हिन्दी की तुलना मेँ बहुत कम ध्वनियाँ हैं। इसलिए छात्र बहुत से हिन्दी वर्णों को ठीक से उच्चरित नहीं कर सकते।खास तौर पर ‘र’ अौर ‘ल’ की ध्वनियों को बोलने-सुनने में उन्हें अन्तर स्पष्ट नहीं होता। इसीप्रकार अन्य वर्ण भी हैं जिनके उच्चारण में जापानी छात्रों को मुश्किल का सामना करना पड़ता है।एक अध्यापक समुचित उच्चारण के लिए खुद बोलकर अौर छात्रों को उसे दुहराने को कहकर इसका अभ्यास करवा सकता है।लेकिन, एेसा करना हमेशा रोचक नहीं होता अौर यह थोड़ा उबाऊ भी हो सकता है। इस परिस्थिति में जब यू-ट्यूब का कोई वीडियो दिखाया जाता है तो छात्र उसे चाव से देखते हैं अौर हिन्दी ध्वनियों को सुनने-समझने का अभ्यास भी करते हैं। इससे दो तरह के परिणाम हासिल होते हैं। पहला यह कि विद्यार्थी सुनने-समझने की चुनौती के साथ वीडियो देखना शुरू करता है। सामान्यत: यह वीडियो भारतीय समाज अौर संस्कृति को भी अन्तर्गुंफित किए हुए होता है इसलिए वे न केवल भाषा का अभ्यास कर पाते हैं अपितु संस्कृति के भी बेहद महत्वपूर्ण पहलुअों से परिचित होते चलते हैं।
eg-youtube video Documentary- koi to Thaam lo…The shrinking Ganges. or mptourism

इस वीडियो में गंगा के विषय में जानकारी देते हुए मिथक, भूगोल, पर्यावरण जैसे मुद्दों का अनूठा संयोजन किया गया है।यह वृतचित्र सहज प्रवाह में हिन्दी का प्रयोग करता है अौर अंग्रेजी उपशीर्षकों का भी इस्तेमाल भी किया गया है। एेसे अनेक सरकारी, गैर-सरकारी, व्यावसायिक अौर गैर-व्यावसायिक वीडियो यू-ट्यूब पर हिन्दी में उपलब्ध हैं। इनका कक्षाअों में उपयोग कर हिन्दी-शिक्षण को सुगम बनाया जाता है।
हिन्दी शिक्षण करने वाले लगभग हर जापानी विश्वविद्यालय में कक्षाअों के शिक्षण के साथ-साथ अन्य गतिविधियाँ भी संचालित की जाती हैं। जिनमें भारतीय भोजन पकाना अौर नाट्य-प्रस्तुतियाँ एवं भारत की शैक्षिक-यात्रा आदि शामिल हैं।इस अकादमिक सत्र से एक दिन छात्रों के लिए सक्रिय-शिक्षण का निश्चित किया गया है।भारत अौर जापान में खान-पान की शैली में गहरा अंतर है। भारतीय व्यंजनों के बारे में जापानी छात्रों को अधिक जानकारी नहीं होती।उन्हें इस बात पर आश्चर्य होता है कि भारत के लोग केवल शाकाहार करके सारे प्रकार के पोषक तत्व प्राप्त कर सकते हैं। भोजन वैविध्य की भी जानकारी उनके पास बहुत सीमित होती है। उदाहरण के लिए हर प्रकार के सालन को वे ‘करी’ के रूप में ही पहचानते हैं।नान ज्यादा लोकप्रिय है परंतु तरह-तरह की रोटियों अौर चपातियों अौर पूरी, पराँठा के बारे में सुनकर उनको अाश्चर्य ही होता है।जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि दक्षिण अौर उत्तर भारतीय भोजन भी वैविध्य लिए हुए है, इसलिए इन सबकी पकाने की विधि अौर रूप-रंग के बारे में पाठ्य-पुस्तकें सीमित जानकारी ही दे सकती है। वे कितनी ही कुशलता से क्यों न लिखी गयी हों पर वे श्रव्य-दृश्य-माध्यमों का स्थान नहीं ले सकती। ऐसी परिस्थिति में यू-ट्यूब पर प्रेषित अनेक निजी अौर प्रोफेशनल वीडियो बड़े कारगर सिद्ध होते हैं अौर छात्र इनका आशय सुगमता से ग्रहण कर लेते हैं। छात्रों द्वारा बनाया पकवान विश्वविद्यालय-महोत्सव के समय आगंतुक लोगों को खिलाया जाता है अौर स्वाभावत: वे अपना फीडबैक भी देते हैं। इसके चलते भारतीय भोजन विश्वविद्यालय से निकल कर जापानी आमजन की पहुँच में भी आता है। मैंने पाया है कि जो छात्र इस भोजन-निर्माण की प्रक्रिया में सम्मिलित होते हैं वे बाद में अपने घर-परिवार के साथ भी भारतीय भोजन बनाते हैं अौर बार-बार यू-ट्यूब जैसे वीडियो का सहारा लेते हैं। कहना न होगा कि इससे खान-पान से संबंधित उनकी हिन्दी शब्दावली समृद्ध होती चलती है।
ध्यान देना चाहिए कि भाषा शिक्षण के लिए अब व्याकरण अौर अन्य बातों के अतिरिक्त दृश्यता का महत्व बढ़ चला है।भाषा-शिक्षण में दृश्य-भाषा के योगदान को समझना अनिवार्य हो चला है। वैसे तो फिल्में भी दृश्यता का उपयोग करते हुए हिन्दी-शिक्षण में हमेशा मददगार रहीं हैं।परंतु यू-ट्यूब जैसी सोशल मीडिया साइट्स ‘सामान्यता’ अौर ‘दैनिकपन’ से भरपूर होती हैं। इसलिए निश्चय ही इनकी भाषा वास्तविकता के अधिक करीब होती है। इन पर प्रेषित वीडियो को देखकर छात्र आजकल की बोलचाल की भाषा के अधिक करीब आ पाते हैं। यहाँ वह आजादी भी मिलती है कि वे अपने मनचाहे विषय का वीडियो देख सकें। वैयक्तिक चयन की एेसी आजादी फिल्मों समेत दूसरे माध्यम नहीं दे सकते अौर आम जन जीवन की संस्कृति का जीवंत अौर गतिशील दृश्य देख पाना अन्यत्र मुश्किल है।
जापान के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण को केवल प्राध्यापकीय व्याख्यानों तक सीमित नहीं रखा जाता। उनको अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों से संपृक्त किया गया है। इनमें से एक महत्वपूर्ण गतिविधि है-नाट्य-प्रस्तुति। अब एक निजी बात बताना चाहता हूँ। पिछले साल मेरे विश्वविद्यालय के छात्रों ने कालिदास के प्रसिद्ध नाटक ‘शकुंतला’ की प्रस्तुति की। नाटक में कण्व ऋषि के आश्रम का वर्णन था। छात्र ठीक से न तो ऋषि आर न आश्रम की संकल्पना समझ सकते थे। इनका ठीक-ठीक अभिप्राय समझा पाना बेहद  कठिन था।  ऐसी स्थिति में ऋषि की वेष-भूषा अौर जीवन-शैली को समझाने के लिए यू-ट्यूब वीडियो से बेहतर कोई माध्यम न हो सकता था। यह सिर्फ एक उदाहरण भर है। इस साल भी मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर आधारित नाट्य-प्रस्तुति होनी है जिसमें अनेक संकल्पनाएँ-मसलन हवेली, नवाब, तीतर अौर बटेर की लड़ाइअों की उपयोगिता अौर कथक-नृत्य की शैली-आदि के बारे में जानकारी देने के लिए सोशल-मीडिया का उपयोग किया जा रहा है। 
आइए अब एक दूसरे अौर लोकप्रिय माध्यम की बात करें। फेसबुक अपने चरित्र अौर व्यवहार में अनूठा माध्यम है। यह निजता अौर सामाजिक स्थितियों की अभिव्यक्ति के बेजोड़ अवसर उपलब्ध कराता है। इसमें शब्द, चित्र अौर चलित चित्रों का उपयोग कर अपने संदेश को संप्रेषित किया जा सकता है। बड़ी बात यह है कि भारत में इसके प्रयोक्ताअों की संख्या काफी अधिक है, शायद पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर। इन अभिव्यक्तियों को देखकर भारत के सामाजिक, वैचारिक, सांस्कृतिक अौर भौगोलिक वैविध्य का पता चलता है। ये अभिव्यक्तियाँ प्रचुर मात्रा में होती है अौर हिन्दी की विविध शैलियों के दर्शन भी यहाँ किए जा सकते हैं। हिन्दी की बोलियों में भी जब-तब लेखन देखने को मिलता है। अनेक समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, संस्थान अौर प्रसिद्ध हस्तियाँ अपने-अपने पृष्ठ उपलब्ध करवाकर इस मंच को प्रामाणिक सूचनाअों का माध्यम भी बनाती है। कुछ इसी तरह समान अभिरुचियों अौर सरोकारों से संबंधित निजी या सार्वजनिक समूहों का निर्माण भी फेसबुक संभव बनाता है। जिसमें सरोकार-विशेष से संबधित जानकारियाँ अौर सूचनाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इसप्रकार फेसबुक पर सामग्री संस्कृति अौर भाषा-शिक्षण का अन्यतम स्रोत बन जाती है। बहुधा प्रत्येक जापानी छात्र अपनी फेसबुक आईडी बनाता है। सक्रियता हर छात्र के स्वभाव पर निर्भर करती है। यह देखने में आता है कि वे इसके माध्यम से कुछेक हिन्दी पत्र-पत्रिकाअों के अपडेट देखते रहते हैं। हिन्दी समाचार चैनलों के पृष्ठों के जरिए वे बीस-तीस सेकेंड के समाचार देखकर उन्हें समझने की कोशिश करते हैं। न समझ आने पर कक्षाअों में उनकी चर्चा करते हैं। इस प्रकार वे अपनी हिन्दी को बहुआयामी बनाने की दिशा में सक्रिय होते हैं। क्योंकि फेसबुक एक साथ परिवार, मित्रों अौर सामाजिक हलचलों से जुड़ने का अवसर मुहैया कराता है इसलिए छात्रों को हिन्दी पढ़ने अौर भारत से संबंधित गतिविधियों को जानने के लिए अलग से समय नहीं निकालना पड़ता अौर ऐसा करना उन्हें बिल्कुल भी बोझ-सा नहीं मालूम पड़ता।
जैसाकि मैंने पहले ही आपको बताया है कि जापानी लोग संकोची स्वाभाव के होते हैं। छात्र भी बहुधा कक्षाअों में सवाल नहीं पूछते। ज्यादातर वे खुद उत्तर जानने की कोशिश करते हैं। इसलिए फेसबुक जैसे सोशल माध्यम उन्हें निजी तौर पर भाते हैं। जब उनमें थोड़ा आत्मविश्वास आ जाता है तब वे छोटी-छोटी पोस्ट हिन्दी में लिखना शुरू कर देते हैं। जरूरी नहीं कि उनका लिखा व्याकरण की दृष्टि से सही हो। तब दूसरे छात्र उस पर अपनी टिप्पणियाँ कर उसे दुरूस्त बनाने का काम करते हैं। भारत हम अपने आत्मविश्वास के प्रति आत्ममुग्ध-सा होते हैं जापानी स्वाभाव इसके बिल्कुल विपरीत है। वे अपने आत्मविश्वास पर हमेशा सशंकित रहते हैं। इसलिए त्रुटि सुधार को भी बहुत ही सकारात्मक नजरिए से देखते हैं। अौर दोबारा वैसी गलती न करने के प्रति चौकस हो जाते हैं। ऐसा भी देखने में आता है कि फेसबुक के माध्यम से वे भारतीय युवाअों अौर विद्यार्थियों के संपर्क में आते हैं अौर निजी संदेशों के द्वारा एक दूसरे से अधिक बात करते हैं। अक्सर उनकी कोशिश होती है कि वे बातचीत हिन्दी में करें अौर कुछेक छात्रों ने बताया कि भारतीय लोग थोड़ी देर में ही अंग्रेजी में प्रतिउत्तर देने लगते हैं। जापानी समाज भाषाई दृष्टि से स्वाधीन समाज है। वे जापानी भाषा को ही महत्वपूर्ण मानते हैं। भाषाअों को सीखना उनकी मजबूरी नहीं अपितु चाहत है। रूचि का परिणाम है। फेसबुक जैसा मंच उनकी इस रूचि को परिपूर्ण करने में अपनी सहज भूमिका निभाता है।
सोशल मीडिया हमारी जरूरतों अौर मनोस्थितियों के अनुसार कई रूपों में विकसित हुआ है। फेसबुक ऐसा माध्यम है जहाँ आपकी निजता को सुरक्षित रखना कठिन होता है। उस पर अपनी अाईडी बनाने की एक महत्वपूर्ण शर्त है कि आप एक वास्तविक व्यक्ति हों। आपका नाम भी वास्तविक होना चाहिए। शिकायत की स्थिति में फेसबुक अाप से अपनी पहचान सिद्ध करने को कह सकता है अौर विफल रहने पर अापके खाते का खात्मा भी कर सकता है।ट्विटर पर इसकी कोई जरूरत नहीं। वह आपको अपनी पहचान छिपाए रखने की आजादी देता है। दूसरी बड़ी बात यह है कि वहाँ वर्ण-सीमा है। अधिकतम एक सौ चालीस। इसलिए आपको जो भी बात कहनी है उसे संक्षेप में ही कहनी पड़ेगी। हालाँकि आप लिंक आदि बनाकर अपने पाठक को विस्तृत प्लेटफार्म पर ले जा सकते हैं। संक्षेपण एक सुभीता देता है तो एक चुनौती भी। कुछ वाक्य जो आपको लिखने हैं वे संप्रेषणीय होने चाहिए। अनेक छात्र अपनी मनोस्थितियों को हिन्दी में लिखने की कोशिश यहाँ करते हैं जिनमें धन्यवाद ज्ञापन, अभिवादन, नींद आ रही है, स्वादिष्ट खाने आदि की सूचना सरलता से देखी जा सकती है। कुछेक वरिष्ठ छात्र अपने साथियों की सहायता के लिए विभिन्न विषयों पर जानकारी देने का काम छोटी-छोटी ट्वीटों के जरिए देने लगते हैं। एक दिलचस्प वाकया है। हमारे विश्वविद्यालय के हिन्दी विद्वान प्रो० ताकेशि फुजिइ जी ने अपनी कक्षाअों में भारत के महापुरुषों के बारे में पढ़ाना शुरू किया। महात्मा गाँधी, सरदार बल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस आदि के बारे में। एक वरिष्ठ छात्र ने भारतीय महापुरूषों के बारे में एक सीरीज़-सी ही शुरू कर दी। उसमें नेहरू, अाम्बेडकर, जय प्रकाश नारायण, लोहिया, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अौर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत सबके बारे में जानकारिया आने लगी। हालाँकि वे पोस्ट जापानी भाषा में थीं परंतु भारतीय संस्कृति अौर उसके महापुरुषों से जुड़ी संक्षिप्त-सार्थक जानकारी से सभी विद्यार्थी लाभांवित हुए। 
ट्विटर पर भी ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जिनसे हिन्दी भाषा, साहित्य अौर समाज के बारे में जानकारियाँ हासिल की जा सकती हैं। अनेक संस्थान, व्यक्ति अौर समूह संक्षिप्त किंतु महत्पूर्ण सूचनाएँ ट्विटर के माध्यम से प्रेषित करते हैं। विदेशी छात्रों के लिए यह संक्षिप्त जानकारी सहज रूप से ग्राह्य होती हैं। अक्सर काम की सूचनाएँ विद्यार्थयों को यहाँ मिल जाती हैं। मसलन जब मैंने इस विश्व हिन्दी सम्मेलन की आधिकारिक ट्वीट को रिट्वीट किया तो बहुत से छात्र विश्व हिन्दी सम्मेलनों के इतिहास, उसकी परंपरा, महत्व एवं उपयोगिता को समझने की दिशा में अग्रसर हुए। इसके पूर्व अधिकांश विद्यार्थी इस तरह के आयोजन से परिचित नहीं थे। इस प्रकार ट्विटर जिज्ञासाअों को उत्प्रेरित करने का सार्थक माध्यम बन गया है। क्योंकि संक्षिप्तता ट्विटर की विशेषता है इसलिए उस भाषा में अभिव्यक्ति करना भी सरल होता है जिसे हम सीखने की प्रक्रिया में हैं। शायद यह कहना सर्वथा उचित ही है कि हिन्दी पढ़ने वाले जापानी विद्यार्थी इस माध्यम का उपयोग कर अपने आत्मविश्वास में वृद्धि करते हैं।  
इनके अतिरिक्त ब्लॉग,इंस्टाग्राम, पिंटरेस्ट, टंबलर अौर विकीपीडिया जैसी सोशल-साइट्स से भी विद्यार्थियों को बहुत मदद मिलती है। गत अकादमिक-सत्र में कुछेक जापानी छात्र हिन्दी की महत्वपूर्ण बोली अवधी को बोलने-पढ़ने को उत्सुक थे। पर अवधी की बहुत अल्प सामग्री पुस्तकालय में उपलब्ध थी। जो थी भी उससे वर्तमान अवधी की त्वरा को पहचानना मुश्किल था। इसलिए फिर सोशल-मीडिया की शरण में आना पड़ा। वहाँ कुछेक वीडियो, गाने, लिखित सामग्री मिल गयी अौर एक मित्र जो बहुधा अवधी में लेखन करते थे उनका ब्लॉग भी। यह अवधी का अद्यतन रूप था। इन सबके सहारे छात्रों ने अवधी बोलने-पढ़ने का आत्मविश्वास अर्जित किया।
साउंड-क्लाउड एक अन्य ध्वनि आधारित सोशल-नेटवर्क है जहाँ अक्सर लोग विभिन्न प्रकार का संगीत, अपनी-अपनी भाषाअों में चर्चा, परिसंवाद अौर वार्ताएँ प्रसारित कर सकते हैं। श्रवण माध्यम के रूप विगत दिनों में यह काफी लोकप्रिय होता जा रहा है। यहाँ अाकाशवाणी आदि की के समाचार अौर परिचर्चाअों को आसानी से सुना जा सकता है। प्राय: यह देखने में आया है कि छात्र पढ़ने-लिखने में तो सहज हो जाते हैं। बातचीत करने में भी उन्हें महारत हासिल हो जाती है परंतु रेडियो जैसे ब्लाइंड माध्यम पर प्रसारित कार्यक्रमों को समझना कठिनाई भरा हो जाता है। साउंड-क्लाउड पर अनेक सामान्य लोगों ने हिन्दी में अपने कार्यक्रम प्रसारित किए हुए हैं। उनको सुनने का अभ्यास कर विद्यार्थी अपनी भाषाई श्रवण क्षमता का विकास करते हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि जापानी भाषा में बहुत कम धवनियाँ हैं जिससे छात्रों को अनेक स्वर साफ-साफ सुनाई नहीं देते। साउंड-क्लाउड जैसे सोशल-मीडिया का उपयोग कर छात्र ध्वनियों के अंतर को समझने का भरपूर अभ्यास कर पाते हैं।

मैं उस समय की परिकल्पना करता हूँ जब ये माध्यम उपलब्ध नहीं थे। उन दिनों अध्यापकों को ज्यादातर पुस्तकालयों अौर पाठ आधारित सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता था। छात्रों के पास भी बहुत कम विकल्प होते थे। अधिकांशत: पुस्तकें ही उसका मुख्य अवलंबन थीं। चित्र, ध्वनियों अौर दृश्यता का इतना सुभीता न था। तब शिक्षकों के सामने मंतव्य को स्पष्ट करने की गंभीर चुनौती थी। अब एक नई चुनौती पैदा हुई है। अाप कक्षा में व्याख्यान दे रहे होते हैं अौर छात्र गूगल-गुरु से जानकारियाँ ले रहे होते हैं। आप कुछ तथ्य बताते हैं तो उसकी प्रमाणिकता विकीपीडिया ही सही पर उससे चेक होने लगती है। इस डिजीटल तकनीक ने छात्र-शिक्षक रिश्तों में नया आयाम विकसित किया है। अब महज सूचनाअों अौर तथ्यों के उद्घाटन मात्र से अच्छे अध्यापन का समय खत्म हो गया है। अब अच्छे अध्यापक को वस्तु-विश्लेषण, वैचारिक नजरिए अौर एक वाजिब दृष्टिकोण से अपनी अध्यापन शैली को संपृक्त करना होगा।

सोशल-मीडिया एक प्रकार का मुक्त माध्यम है। जहाँ सूचनाअों, उपलब्ध जानकारियों की प्रमाणिकता हमेशा संदिग्ध होती है। गेट-कीपर का अभाव सोशल मीडिया के लिए एक तरफ वरदान है तो दूसरी अोर अभिशाप भी। इसलिए शिक्षण के संदर्भ में सोशल-मीडिया की भूमिका सहयोग परक है, जिसमें अध्यापकीय संस्पर्श अौर हस्तक्षेप बेहद जरूरी है।