30 जून, 2008

गोपालपुर की लहरों और कोरापुट की पहाडि़यों में सात दिन




एक राजनीतिक काम से उड़ीसा का दौरा करने का अवसर मिला। 22 की सुबह उड़ान भरकर हम भुबनेश्‍वर पहुँच गए थे। भुबनेश्‍वर से लगभग 170 कि0मी0 की दूरी पर बरहामपुर स्‍थित है। उड़ीसा का एक प्राचीन कस्‍बा।यह गंजाम जिले के अंतर्गत आता है। भुबनेश्‍वर से लगभग 3 घंटे की यात्रा कर हम यहाँ पहुँचे। अगले दिन अपना काम खत्‍म कर हम गोपालपुर गए और उसके सागर तट को देखा। वैसे तो मुंबई-गोवा समेत दक्षिण के लगभग सभी तटों को मैंने देखा है लेकिन गोपालपुर का तट वाकई निर्जन है। लहरेां की तीव्रता और अपने आगोश में लेने का उनका निमंत्रण मोहक था। मछुआरे दूर क्रैब और प्रोन की तलाश में चले जाते हैं। प्रोन खाने के लिए यह सर्वोतम जगह है। मेरे जैसा शाकाहारी व्‍यक्‍त‍ि सिर्फ स्‍वाद-चर्चा में ही आनंद लेता रहा। मेरे मित्र बालन मणि ने विश्राम के लिए स्‍वोस्‍ती रिजार्ट में जुगाड़ कर लिया था। जुगाड़ इसलिए कि उनके बैच मैट मि0 मोहंती ही उस होटल के मालिक हैं।
गोपालपुर में एक पुराना पोर्ट है।मछुआरों की बस्‍ती । करीने से बसी हुई। डेनियल दास यहाँ के नेता हैं। कर्मठ और श्रमशील। एक खास अनुभ्‍व। पोर्ट की अपनी ही संस्‍कृति होती है।इसे पोर्ट पर आकर ही जाना जा सकता है।
इसी रास्‍ते में पड़ती है चिल्‍का। चिल्‍का झील का विस्‍तार अद्भुत है। प्रकृति की अनूठी रचना। हजारों लोगों को जीवन देने वाली चिल्‍का के बारे में प्रो0 एस0 सी0 पांडा बताया कि एक उडि़या कवि (जो आजादी आंदोलन में भाग के कारण गिरफ्तार हो गया था ) ने लिखा है कि ‘मुझे थोड़ी देर चिल्‍का के चित्रपट को निहार लेने दो, फिर तो अंधेरी कोठरी में रहना ही है’ वाकई चिल्‍का में यह ताकत है कि वह कष्‍टकारी राह को भी आसान बना दे।
इस बीच मैंने अनुपम मिश्र की पुस्‍तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पढ़ी। उड़ीसा के देहात इन तालाबों पर सर्वाधिक निर्भर हैं। जीवन शैली का अधिकांश भाग इन के इर्द-गिर्द घूमता है। खास तौर पर महिलाओं और बच्‍चों के आनंदक्रीड़ा का केन्‍द्र तो यही तालाब हैं। एक ही तालाब में स्‍नान करती महिलाएँ ओर बच्‍चे फुलवारी जैसे खिल उठते हैं।उनके मवेशी घंटों उसमें तैरते रहते हैं। कमल दल इन तालाबों में प्रचुर मात्रा दिखाई देते हैं। इन तालाबों को देख चित्‍त प्रसन्‍न हो उठा। जहाँ गए नारियल पानी से स्‍वागत हुआ । कोल्‍ड ड्रिंक का सर्वोत्‍तम विकल्‍प।
गजपति बरहामपुर के साथ लगा हुआ जिला है। आधा मैदान आधा पहाड़। आदिवासी बहुल ।इसके सीमांत पर एक कस्‍बा है- तप्‍ता पानी। गंधक का एक बहता सोता। यहाँ सही अर्थों में ट्री-हाउस ‘पंथानिवास’ ने बनाए हैं।
कोरापुट,बोलंगीर और कालाहांडी ये तीन जिले अत्‍यंत पिछड़े हैं। कोरापुट उड़ीसा का कश्‍मीर कहा जा सकता है। चारों ओर हरियाली और वनस्‍पतियों का साम्राज्‍य । मनुष्‍य , प्रकृति के हाथ का खिलौना। सत्‍ता को चुनौती देते नक्‍सली । प्रकृति की तरह निद्वन्‍द्व और बेखौफ।
गरीबी और प्राकृतिक सौन्‍दर्य में जैसे आपसी होड़ है इस क्षेत्र में । दुनिया तेजी से बदल रही है लेकिन न तो आदिवासी बदल रहे हैं न उनकी दुनिया और तमाम आर्थिक प्रगति के बावजूद उनकी स्थिति यथावत है। आप सोचे सभ्‍यता के इस मानव-समूह के बारे में भी। इस पड़ाव में सारथी रहे प्रो0 कृष्‍ण लाल। उनका आभार।

29 जून, 2008

हिंदी पत्रकारिता-साक्षात्‍कार की तैयारी


दैनिक जागरण ,नई दिल्‍ली , 24 जून 2008 से साभार
प्रस्तुति का रखें विशेष ध्यान

दैनिक जागरण और डूसू की हेल्पलाइन दिल्ली विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के साथ मिलकर विद्यार्थियों को दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी देने में जुटी है। इस क्रम में हमने जागरण सिटी में जागरण सुलझाए एडमिशन की उलझन कॉलम के अंतर्गत छात्रों के दाखिले की दुविधा से जुड़े सवालों और विशेषज्ञों के जवाब का सिलसिला शुरू किया है। आज आपके सवालों के जवाब दे रहे हैं डीयू के भीमराव अंबेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम के वरिष्ठ प्रवक्ता राम प्रकाश द्विवेदी:
डीयू के बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम के लिए होने वाले इंटरव्यू की अच्छी तैयारी कैसे करें? गुंजन (सीमापुरी बॉर्डन), संकल्प श्रीवास्तव (वसुंधरा), आशुतोष राय (गाजियाबाद) और शोभा रानी (महारानी बाग)
इस कोर्स में प्रवेश के लिए होने वाले इंटरव्यू में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पिछले कुछ दिनों के अखबार और मैगजीन जरूर पढ़ें। समकालीन मुद्दों पर अपनी एक राय बनाएं। दरअसल, इससे न केवल आपको मुद्दों पर आधारित प्रश्नों के जवाब देने में आसानी होगी, बल्कि इससे आपका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
डीयू से होने वाले जर्नलिज्म के कोर्सो में सामान्यतौर पर किस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं? प्रियंका तिवारी (फरीदाबाद), तुषार वर्मा (गांधी नगर), संचित भटनागर (गुड़गांव), विवेक मोंगा (दिलशाद गार्डन), अनुराग सिंह (किंग्जवे कैंप) और अभिनव बत्रा (हरी नगर)
चाहे हिंदी पत्रकारिता हो या फिर इंग्लिश जर्नलिज्म एक प्रश्न आमतौर पर इंटरव्यू में उम्मीदवारों से पूछा जाता है वह यह कि आप इस पाठ्यक्रम में प्रवेश क्यों चाहते हैं? उम्मीदवारों को इस सवाल का जवाब बेहद सावधानी से देना चाहिए। इसके अलावा पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन? इस पर भी विशेषज्ञ आपकी राय पूछ सकते हैं।
कौन-कौन से समकालीन महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर इंटरव्यू के लिए अच्छी तैयारी करके जाना चाहिए? भरत शर्मा (मुनीरका), अक्षय कुमार(पलवल), संतोष कुमार (गाजियाबाद), लतिका चावला (शालीमार बाग), राकेश गुप्ता (श्रीनिवासपुरी), संजय यादव (वजीरपुर) और जयचंद राजपूत (महरौली)
परमाणु समझौता, बेतहाशा बढ़ती महंगाई, ग्लोबल वॉर्मिग, आरक्षण आदि के साथ-साथ आईपीएल और क्रिकेट की बदलती तस्वीर, बढ़ते अपराध, शिक्षा के स्तर आदि के अलावा खेल, व्यापार और राजनीतिक हलचलों पर आधारित समसामयिक मुद्दों को अच्छी तरह देखें। दरअसल, जानकारियों को लेकर आप रहेंगे जितना अपडेट, इंटरव्यू होगा उतना ही बेस्ट।
इंटरव्यू के लिए मीडिया से संबंधित किन प्रश्नों पर ध्यान देने की जरूरत होती है? केशव अग्रवाल (सादिक नगर), विभा शर्मा (गुड़गांव) और नीना (कमला नगर)
जो अखबार या मैगजीन आप पढ़ते हैं, उनके संपादकों के नाम और उसकी संपादकीय नीति से संबंधित प्रश्न भी आप से पूछे जा सकते हैं। यही नहीं, 24 घंटे प्रसारित होने वाले टीवी चैनलों पर आपके पसंदीदा न्यूज व करंट अफेयर्स पर आधारित सवाल भी पूछे जा सकते हैं।
पत्रकारिता पाठ्यक्रमों के लिए इंटरव्यू में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खासतौर पर फोकस्ड सवाल भी पूछे जा सकते हैं? प्रभा रावत (विवेक विहार), कंचन (पालम), मंजीत कौर (टैगोर गार्डन) और अरशद (यमुना विहार)
आचार संहिता का सवाल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सबसे अहम है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रसारण नीति और आचार संहिता पर आधारित प्रश्न उम्मीदवारों से पूछे जा सकते हैं। दरअसल, ऐसे सवालों के प्रति आपकी राय एकदम स्पष्ट होनी चाहिए, तभी आप सवालों के सटीक उत्तर दे सकते हैं।
क्या पत्रकारिता कोर्सो के लिए रेडियो और टेलीविजन पर आधारित भी कुछ सवाल हो सकते हैं? पवन नारायण (उत्तम नगर), दिनेश (गाजियाबाद) और विनीत अग्रवाल (फरीदाबाद)
एफएम रेडियो के विस्तार और उसकी भाषा-प्रस्तुति पर प्रश्न किए जा सकते हैं। कम्यूनिटी रेडियो की अवधारणा और जरूरत पर भी आपसे जानकारी और राय ली जा सकती है। जहां तक टीवी की बात है। टेलीविजन पर विज्ञापन, समाचारों की प्रस्तुति और लेटेस्ट ट्रेंड्स जैसे-कॉमेडी शो, रियलिटी शो और क्विज कार्यक्रमों पर भी विशेषज्ञ आपसे सवाल कर सकते हैं।
पत्रकारिता पाठ्यक्रमों के साक्षात्कार में प्रेजेंटेशन की दृष्टि से किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए? प्रकाश चंद (गुड़गांव), रमनकुमार (दिल्ली कैंट), कुणाल कश्यप (मायापुरी) और रिया त्यागी (आदर्श नगर)
बेहतर आई कॉन्टैक्ट, आत्मविश्वास से भरी बॉडी लैंग्वेज, प्रश्नों के संक्षिप्त और सटीक उत्तर, विनम्रता के साथ स्पष्ट उच्चारण आपको साक्षात्कार में उत्कृष्ट बनाएगा। मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव

14 जून, 2008



मेरे स्‍याह अंधरों को थोड़ा उजाला दे दो।
बुझती हुई धड़कन है अपनी ज्‍वाला दे दो।।
सपने थे जो देखे सब के सब टूट-फूट गए
बने जो हमराही थे बीच में कहीं छूट गए
तनहा है जिंदगी कोई हम प्याला दे दो1।मेरे...।


मोहल्‍ले में अरसा हुआ है बातचीत बंद
कोशिशें की बहुत न होता कोई रजामंद
जुटे संगत ऐसी चौपाल ऐसा शिवाला दे दो।2।मेरे...।


सीधे-साधे थे जो बनते जा रहे हैं चंट
सत्‍ता में हैं जो बैठे बकते हैं अंट-शंट
बउ़बोले हुए हैं ये इनकी जुबां पे ताला दे दो।3।मेरे...।

मटमैला आसमां है बंजर सी क्‍यूँ है धरती
सूरज है धुँधला-धुँधला न कोई रोशनी जलती
रंगो की जरूरत है थोड़ा गोरा थोड़ा काला दे दो।4। मेरे...।


ब्रज सन्‍नाटे में है गोपियाँ भी हैं खोई खोई
न गायों की घंटियाँ मुरली जाने कहाँ सोई
बड़ी उदास है राधा उसे मोहन कृष्ण-ग्वाला दे दो।5।मेरे...।


आओ जरा बैठे कुछ नयी ताजी बात करें
हुए दिन बहुत फिर खुद से मुलाकात करें
गुम एहसासो को शब्द बड़ा भोला-भाला दे दो।6।मेरे...

08 जून, 2008

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में हिंदी पत्रकारिता

बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता के लिए आवेदन 10 जून तक
दैनिक जागरण और डूसू की हेल्पलाइन दिल्ली विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के साथ मिलकर विद्यार्थियों को दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी देने में जुटी है। आज आपके सवालों के जवाब दे रहे हैं बीआर अंबेडकर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम के प्रवक्ता डॉ0 आर0पी0 द्विवेदी:
बीए (ऑनर्स)हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम किन-किन कॉलेजों में उपलब्ध है? सीमा (नारायणा), विष्णुदत्त (मोहन नगर), गोपाल (खेलगांव) और जीतेंद्र कश्यप(पलवल) बीआर अंबेडकर कॉलेज, अदिति महाविद्यालय, खालसा कॉलेज और रामलाल कॉलेज में बीए(ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता व जनसंचार पढ़ाया जाता है।
बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार पाठ्यक्रम में एडमिशन के लिए क्या सेंट्रलाइज्ड एंट्रेंस होगा? शहजाद (रघुवीर नगर), मोहन (पानीपत), सरगम (फरीदाबाद) और देवेंद्र (गाजीपुर) हां। चारों कॉलेजों में प्रवेश के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से कॉमन एंट्रेंस टेस्ट आयोजित किया जाएगा।
बीए(ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार कोर्स में प्रवेश के लिए आवेदन फॉर्म कहां मिलेगा? बसंत (रोहिणी),विशाखा (मानेसर ), ज्योति (फरीदाबाद) और विशाल सिंह (पुष्पांजलि) इस कोर्स में आवेदन के लिए फॉर्म आप दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस स्थित फैकल्टी ऑफ आ‌र्ट्स में हिंदी विभाग से प्राप्त कर सकते हैं।
बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता में आवेदन के लिए क्या बारहवीं में एक विषय के रूप में हिंदी का होना जरूरी है? कौशल (गाजियाबाद), अमरजीत (तिलकनगर), तनवीर (सीलमपुर) और जसलीन (लाजपत नगर) हां। आवेदन के लिए 12वीं में एक एक विषय के रूप में हिंदी भाषा के साथ न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक होने चाहिए। इस कोर्स में प्रवेश के लिए 10 जून 2008 तक आवेदन किया जा सकता है।
क्या बीए (ऑनर्स)हिंदी पत्रकारिता में ईसीए औैर स्पो‌र्ट्स कैटेगरी के अंतर्गत भी आवेदन किया जा सकता है? सुजीत(द्वारका),कंचन वर्मा(गुड़गांव),दीपक (लाजपत नगर)और नेमचंद(बल्लभगढ़) नहीं। इस कोर्स में प्रवेश के लिए स्पो‌र्ट्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टीविटीज(ईसीए)कैटेगरी के अंतर्गत आवेदन नहीं किया जा सकता। -मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव साभार जागरण 5 जून,2008

राम प्रकाश द्विवेदी की क्‍लास-फिल्‍म विधाएँ

सिने समीक्षा(Film Review)के कुछ और पहलू
उपन्‍यास को राष्‍ट्रीय रूपक कहा जाता रहा है। लेकिन, सही नजरिए से देखें तो अब फिल्‍में किसी देश-समाज का प्रतिबिंब अधिक पेश करती हैं। सभ्‍यताओं के संघर्ष को फिल्‍म में निहित कोडों के जरिए बखूबी पढ़ा जा सकता है। इस क्‍लास को भी मैं अन्‍य कक्षओं की तरह ही 1000 शब्‍दों में सीमित रखूँगा। हाँ यह जरूर है कि यहाँ पहले वाली क्‍लास से थोड़ा आगे बढ़ाते हुए आज हम फिल्‍म के रूप और प्रकार पर ही अधिक केंद्रित रहेंगे।
तो आइए शुरुआत करें-
फिल्‍म की श्रेणी-
मोटे तौर फिल्‍में दो वर्गों में बाँटी जाती हैं:
(1) मुख्‍यधारा अथवा लोकप्रिय सिनेमा(Popular or Mainstream Cinema)
(2) समानांतर अथवा नया सिनेमा(Parallel or New Wave Cinema)
(अनेक फिल्‍मकार इस विभाजन का विरोध करते हैं, पर आम आदमी को समझाने के लिए आप इसकी चर्चा करें )
लोकप्रिय सिनेमा आम फार्मूले पर चलता है। गंभीरता के निषेध की बात से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। इनकी संदेश रचना उतनी ही मूल्‍यवान हो सकती है जितनी अन्‍य किसी फिल्‍मों की। फिर भी, दर्शकों को रिझाने-लुभाने के लिए मौलिक अवधारणाओं के बावजूद लोकप्रियता के अपने नुस्‍खे होते हैं, जिन्‍हें इन फिल्‍मों में इस्‍तेमाल किया जाता है।‘देवदास’ पर बनी फिल्‍में अपने जेहन में रखिए जो समय के साथ बदलती रहीं और नए-नए फार्मूले ढूढ़ती रहीं। लोकप्रिय फिल्‍म की समीक्षा करते हुए आप संभावित दर्शक को उस फिल्‍म के स्‍टारडम, आइटम सांग, रंग-रंगीली ड्रेस, पल-पल परिवर्त्तित भूदृश्‍य और कहानी के भावुक प्रसंगों की विशेषताएँ बताएँ।
भुवन शोम(1969) को हिंदी समानांतर सिनेमा की पहली कृति कहा जाता है। फिल्‍म विधा का परिपाक इस तरह की फिल्‍मों में ही दीखता है। सत्‍यजित रे इसके मास्‍टर थे। इसप्रकार कि फिल्‍म तक भी दर्शक पहुँचे इसके लिए आप यह करें कि सीधे-सीधे कहें कि ऐसी फिल्‍में कम बनती हैं और इन्‍हें देखना चाहिए। फिल्‍म की गूढ़ समस्‍या को आसान शब्‍दों में बताइए। यह कहिए कि फिल्‍म रोजमर्रा के दृश्‍यों-एहसासों से बनी है। वास्‍तविकता की ओर लोगों का ध्‍यान खीचिए। हो सकता कि फिल्‍म का कोई हकीकी आधार भी हो। जैसे ‘बैंडिट क्‍वीन’का।तो इसका थोड़ा-सा विस्‍तार कर दीजिए।अगर कुछ दर्शक जुटा पाए तो यह सिने अभिरुचि के विकास में आपका बड़ा योगदान होगा।
फिलहाल हम लोकप्रिय फिल्‍मों तक ही खुद को महदूद रखेंगे।

फिल्‍म की विधाएँ-
फिल्‍म के कई रूप होते हैं।रूप निर्धारण मूलत: दो आधारों पर हो सकता है।
(1) विषय-वस्‍तु (Content)
(2) टेकनीक (Technique)
विषय-वस्‍तु के आधार पर फिल्‍मों की निम्‍न लिखित विधाएँ देखने को मिलती हैं-
इन्‍हें ही मूलत: फीचर फिल्‍मों के विविध रूप कहते हैं। हम आज इनकी ही चर्चा करेंगे और जानेगे कि इन रूपों का फिल्‍म समीक्षा से क्‍या लेना-देना है।

रोमांस
कॉमेडी
ड्रामा
मेलोड्रामा
म्‍यूजि़कल्‍स
हॉरर
पीरियड सिनेमा
एक्‍शन
थ्रिलर
सस्‍पेंस
विज्ञान फंतासी आदि
जबकि टेकनीक के आधार पर हम फिल्‍मों के निम्‍न रूप देखते हैं।
फीचर फिल्‍म
वृत्‍तचित्र
वृत्‍तनाट्य
विज्ञापन
एनीमेशन आदि
यहाँ हम , जैसाकि पहले कहा गया है केवल फीचर फिल्‍म के विभिन्‍न प्रकारों की समीक्षा
पर ध्‍यान देंगे। समीक्षा करते हुए आपको यह बता देना चाहिए कि फिल्‍म किस विधा की है। इससे दर्शक उत्‍साह से फिल्‍म और समीक्षा दोनो की ओर मुखातिब होगा।
ये रोमांस क्‍या है अगर आप पहले ‘मांस’ को ले लें तो मैं कहूँगा कि शरीर से संबंधित भाव-बोध यानि जिसमें प्‍यार-मोहब्‍त हो। और अब ‘रो’ को ले लीजिए अर्थात जिसमें रोना-गाना खूब हो।खैर इस व्‍यंग्‍योक्ति को छोडि़ए। अच्‍छी रोमांटिक फिल्‍म में आप उसमें बुनी ऊर्जा की चर्चा करें।
कॉमेडी की समीक्षा करते हुए आप बताएँ कि फिल्‍म में हास्‍य और व्‍यंग्‍य का मिश्रण किस अनुपात में है। व्‍यंग्‍य अच्‍छी कॉमेडी की आत्‍मा माना जाता है। कॉमेडी- भाषा संवाद, भाव-भंगिमा, कास्‍ट्यूम्‍स, ध्‍वनि प्रभावों और एक्‍शन द्वारा सामान्‍यत: दिखायी जाती है। आप इन घटकों पर अपनी टिप्‍पणी कर सकते हैं।
ड्रामा/ मेलोड्रामा में कथानक की भूमिका सर्वाधिक महत्‍व की होती है। एक पंक्ति में कहें तो ड्रामा वह होता है जिसमें सत्‍य का उदघाटन उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए सबसे अंत में होता है। यह कॉमिक (सुखात्‍मक) अथवा ट्रैजिक(दुखात्‍मक) हो सकता है। अपनी समीक्षा आप कथा-प्रवाह के तनाव के बारे में बताएँ और ड्रामार्इ पहलू का विश्‍लेषण करें।
म्‍यूजिकल्‍स भारतीय सिनेमा की यह खास विशेषता है। निश्चित ही इसमें अन्‍य बातों के अलावा गीत-संगीत का सर्वाधिक महत्‍व होता है। यदि आप संगीत की बारिकियों से परिचित नहीं हैं तो किसी से जान लीजिए और अपनी टिप्‍पणी को गंभीर तथा रोचक बनाइए।
हॉरर ये फिल्‍में वातावरण निर्माण और अच्‍छे ध्‍वनि तथा विशेष प्रभाव पर टिकी होती हैं।इसलिए आप भी इनके इसी कंपोनेंट की चर्चा करें । फिल्‍म प्रदर्शन के उपकरणों से भी इसप्रकार के सिनेमा पर असर पड़ता है। चाहें तो उन थिएटरों का उल्‍लेख कर दें जहाँ ये फिल्‍में पूरी त्‍वरा के साथ देखी जा सकती हैं।
पीरियड फिल्‍में इन फिल्‍मों के लिए समीक्षा का प्रथम स्रोत हमें इतिहास में मिलता है। इतिहास से टकराए बिना आप इन फिल्‍मों की समीक्षा नहीं कर सकते। ऐतिहासिक कालखंड और समस्‍या को कितनी शिद्दत से प्रासंगिक बनाया गया है इस बात पर टिप्‍पणी आपकी समीक्षा को समृद्ध करेगी।
एक्‍शन ये फिल्‍में मारधाड़ से भरपूर होती हैं लेकिन एक कॉज़ इनमें मौजूद रहता है। इस कॉज़ की चर्चा किए बिना आपकी समीक्षा अधूरी रह जाएगी।
थ्रिलर/सस्‍पेंस इन दोनों में थोड़ा अंतर होता है। संस्‍पेंस बना रहता है और अंत में खुलता है। थ्रिलर हर हर क्षण अपना एहसास कराता है।
विज्ञान फंतासी ये फिल्‍में विज्ञान की दंत कथाओं पर आधारित होती हैं। मौलिक कल्‍पना, विशेष्‍-प्रभावों की अतिशयता और वैज्ञानिक तार्किकता इसके केंद्र में होते हैं। यानी फैंटेसी के साथ तर्क भी साथ-साथ चलता है। अब आपको इसी संरचना की चर्चा करनी है।

इन प्रकारों की एक खास मानसिकता होती हैं। दर्शक इनमें से कुछेक विधाओं में ज्‍यादा दिलचस्‍पी लेते हैं। ऐसा देश और समाज के स्‍तर पर भी होता है और वैयक्तिक रूप में भी। उदा‍हरण के लिए भारत में म्‍यूजिकल्‍स और चीन-जापान-हांगकांग में एक्‍शन फिल्‍में अधिक पसंद की जाती हैं। पूर्वी देशों में कथा प्रधान और पश्चिम में तकनीक प्रधान फिल्‍में अधिक लोकप्रिय होती रहीं हैं। ऐसा संस्‍कृति,परंपराओं,ऐतिहासिक संघर्ष की विरासत और बदलती जीवन शैली के कारण होता है।

तो रह गयी बात राष्‍ट्रीय रूपक(National Allegory) और फिल्‍म के कोडों (Codes) की तो उसे अगली कक्षा के लिए रखते हैं।

वायदे के मुताबिक और बेताल-पचीसी के वैताल की तर्ज पर 1000 शब्‍द पूरे हुए और मैं चला डाल नं0 09312276633 पर। जानकारी और सहयोग के लिए आप भी आइए ।

05 जून, 2008

परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति

उस स्‍त्री ने बच्‍ची को नहलाया
कपड़े पहनाए
और फिर
आरती पर
साथ लेकर बैठ गयी उसे।

बच्‍ची ने हाथ जोड़े
प्रसाद खाया

और जैसे-जैसे माँ करती गयी
नकल उतारती रही वह

सुबह शाम
घंटी बजाने की जिद
धूप सुलगाने की ललक
बच्‍ची में

पनपती चली गयी माँ की तरह।
दिन बीते

अब वह बड़ी हो गयी थी
माँ से सोचती थी अलग
कुछ बताती थी
और ज्‍यादा छिपाती थी।

अलग अस्तित्‍व
पहचान की जिद
उसे लगा वह
बिल्‍कुल अलग है माँ से।
माँ की परंपरा
पुरानी सी जान पड़ती थी
मूल्‍य अधूरे

रूढि़यों से घिरी दीखती थी वह
माँ को।
फिर एक दिन वह खुद
बन गयी माँ
उसकी बच्‍ची की आँखों से
झाँक रहे थे अनेक सवाल
शायद उसी के अपने

सवाल।
उसने महसूस किया कि
माँए

हमेशा पुरानी अधूरी और अपर्याप्‍त होती हैं
पर, उनमें प्रवाह थमता नहीं
न रुकती है अपनों के प्रति प्‍यार और अनुरक्ति
माँए होती हैं
परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति।


 


 

01 जून, 2008

राम प्रकाश द्विवेदी की क्लास-‍फिल्म समीक्षा(FILM Review)

राम प्रकाश द्विवेदी की क्लास-‍फिल्म समीक्षा(FILM Review)


 


 

आपने अखबारों और पत्रिकाओं में तो फिल्‍म समीक्षाऍं पढ़ी होंगी। ये समीक्षाऍं फिल्‍म–पत्रकारों द्वारा की जाती हैं। लेकिन आम पाठकों को ध्‍यान में रखकर इनको बड़े हल्‍के-फुल्‍के ढंग से ही लिखा जाता है । यदि आप भी फिल्‍म-समीक्षक बनना चाहते हैं तो आपका इस क्‍लास में स्‍वागत है। यह कक्षा उन्‍हीं के लिए अधिक उपयोगी है जो बिल्‍कुल नए हैं। यहॉ हम फिल्‍म के अनेक रूपों में से केवल फीचर फिल्‍म पर ही अपना ध्‍यान केंद्रित करेंगे।
आइए शुरुआत करें-

पहला
काम जो आपको करना है

समीक्षक बनने से पहले यह जरुरी है कि आपने बहुत सी फिल्‍में देख ली हों। यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो कोर्इ बात नहीं अब शुरू हो जाइए। अच्‍छी–बुरी जो भी मिलें देख डालिए फिल्‍में। क्‍योकि बुरे से ही अच्‍छे की पहचान होती है।

फिल्‍मोत्‍सव में भाग लें
आपके शहर में फिल्‍मोत्‍सव तो होते होंगे। इनमें शिरकत कर आप दो-चार दिन में ही विविध फिल्‍म विधाओं के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। अनेक भाषाओं समेत देश-विदेश की अच्‍छी फिल्‍में इन फिल्‍मोत्‍सवों में आपको आसानी से देखने को मिल जाती हैं।

टी0वी0 पर सिनेमा
लोकसभा टी0वी0 और वर्ल्‍ड मूवीज़ बेहतरीन फिल्‍में दिखातें हैं। इनके अतिरिक्‍त स्‍टार मूवीज़, स्‍टार गोल्‍ड, एच0बी0ओ0 , बिंदास , जी सिनेमा, सहारा फिल्‍मी, सोनी पिक्‍स आदि भी कभी-कभी अच्‍छी फिल्‍में प्रसारित करते हैं। इन चैनलों की फिल्‍में देखने के लिए आपको बाहर भी नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन कर्इ बार हमारा ध्‍यान घर में बँट जाता है और हम फिल्‍म के मर्म से दूर हो जाते हैं। इसलिए पूरी तरह फुर्सत में होकर ही टी0वी0 पर सिनेमा देखें।

फिल्‍म के मूल अवयव

फिल्‍में को बनाने में तकनीक और कल्‍पना का योग रहता है। निर्माण तकनीक की सामान्‍य जानकारी आपको बेहतर समीक्षक बनने में होगी। जैसाकि आप जानते हैं कि फिल्‍में -

(1)कैमरे से शूट होती हैं जिसके लिए स्क्रिप्‍ट उपलब्‍ध होनी चाहिए
(2)उनमें मानव चरित्र होते हैं

(3) इनकी एक कहानी होती है

(4) यह कहानी एक भाषा में होती है
(5)फिल्‍म का देश-काल होता है
(6) दृश्‍यों का संपादन होता है
(7) ध्‍वनियों का दृश्‍यों के साथ मिलान किया जाता है

(8) इसमें विशेष प्रभाव जोड़े जाते हैं

(9) गीत-संगीत

(10) फिल्‍म की रिलीज होने से पहले परख की जाती है

(11) इसे दर्शक समूह में देखते हैं , और
(12) अपना फीडबैक देते हैं

(13) यह फीडबैक हमेशा फिल्‍म की गुणवत्‍ता तय नहीं करता

इन अवयवों को जानकर हम आगे बढ़ सकते हैं। आइए देखें कि हमें समीक्षा की शुरुआत कैसे करनी चाहिए।

कहानी तो बताओ

समीक्षा शुरु करने से पहले जरुरी है कि फिल्‍म की कहानी संक्षेप मे अवश्‍य बता दें। इससे फिल्‍म संबंधी मूल जिज्ञासा शांत होती है। यह कुछ उसी तरह है जैसे आप किसी अजनबी से पहली बार मिलने पर नाम पूछने के बाद ही संवाद शुरू करते हैं।

यह मेरा हीरो वह तेरी हीरोइन

फिल्‍म के नायक/नायिकाऍं और वास्‍तविक जीवन के हीरो/हीरोइन दर्शकों के लिए एक दूसरे मे घुले-मिले होते हैं।इसलिए यह बता ही दें कि किसने क्‍या रोल निभाया है। अभिनय
पर गंभीर टिप्‍पणी यहॉं अवश्‍य करें।

तो कपड़े कैसे थे

अभिनय के बाद कास्‍टयूम्‍स और मेकअप के बारे में बता सकते हैं।

यह सब हुआ कहॉ
जो नायक/नायिकाऍं हैं उन्‍होने जो कुछ किया वह सब किस जगह घटित हुआ इसका खुलासा करें। यानि लोकेशन पर राय देना जरुरी है।

नाच गाने का क्‍या हुआ

यहॉं आप फिल्‍म के गानों और संगीत की चर्चा करें । अधिकांश फिल्‍में अपने गानों और संगीत की वजह से रिलीज होने से पहले ही लोकप्रिय होने लगती हैं।

हर शॉट कुछ कहता है

शॉट मूलत: तीन हैं
1. क्‍लोज अप 2. मिड , और 3. लांग
इनमें ही दो शॉट –एक्‍सट्रीम क्‍लोज अप तथा एक्‍सट्रीम लांग और जोड़े गए जिससे जोड़े गए जिनसे इनकी संख्‍या पॉच हो जाती है। वैसे देखे तो लगभग तीस शॉट फिल्‍म में बहुधा उपयोग में लाए जाते हैं।

ये शॉट फिल्‍म का व्‍याकरण रचते हैं। अर्थ को पैदा करने में इनकी गहरी भूमिका होती है।मसलन-

एक्‍सट्रीम क्‍लोज अप: सूक्ष्‍म भावों की सघनता दिखाता है।
क्‍लोज अप:चेहरे की भंगिमा को पकड़ता है

मिड शॉट: सामान्‍य भावों का प्रकटीकरण करता है
लांग शॉट: दुनियावी हलचल से रूबरू कराता है, तो

एक्‍सट्रीम लांग शॉट: पूरी प्रकृति के बीच इंसानी गतिविधि को दर्शाता है

एक समीक्षक के तौर पर आप शॉट संरचना, मीजा-अ-सीन और दृश्‍य-विधान पर अवश्‍य अपनी राय जाहिर करें। यह देखे की कैमरे ने अपना काम ठीक से किया है या नहीं।


 

रंग और रोशनी की जॉच

फिल्‍म में हरेक स्थिति के लिए रंग और रोशनी की अलग-अलग जरूरत पड़ती है। आप जानते ही है कि प्रेम का पंगा ज्‍यादातर फिल्‍मों में होता ही है। अब इसे दिखाने के लिए अगर तेज रोशनी और मरियल रंगों का इस्‍तेमाल किया जाय तो बात बनेगी कैसे। इसलिए देखे कहीं गड़बड़ तो नहीं रह गयी। और अगर यह काम बेहतर है तो हुजूर प्रशंसा भी तो कर दीजिए।


संपादन में लोचा

हर फिल्‍म एडिटिंग टेबल पर पुनर्निर्मित होती है। शूटिंग के ढीलेपन की कसावट यहॉ की जाती है। विशेष प्रभावों का करिश्‍मा यहीं पैदा किया जाता है।यह अंतिम मौका होता है फिल्‍म को गढने का। संपादन पर टिप्‍पणी कर आप फिल्‍म के मूल्‍य को घटा-बढा सकते हैं।

निर्देशक कहॉ गया

हर निर्देशक की एक फितरत होती है जो उसकी फिल्‍मों में दिखती है। निर्देशन के बारे में राय देकर आप दर्शक को फिल्‍म की परंपरा से जोड़ते हैं।

अरे ये भी तो हैं

फिल्‍म रिलीज होने से पहले सेंशरबोर्ड के पास जाती है। उसमें सामाजिक, संवैधानिक, सांस्‍कृतिक आपत्तियों का निराकरण कर लिया जाता है जिससे बाद में लफड़ा न हो। सेंशरबोर्ड की राय को भी आप अपनी समीक्षा में शुमार कर सकते हैं।

आप समीक्षक हैं दर्शक नहीं

कई बार फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर पिट जाती है। लेकिन बाद में वह एक महत्वपूर्ण फिल्‍म के रूप में याद की जाती है। इसलिए दर्शकों की प्रतिक्रया को तवज्‍जो देते हुए भी आप पूरी तरह उसकी गिरफ्त में आऍं और अपनी स्‍वतंत्र राय रखें।


 

बस हो गया- इतनी बातों से फिल्‍म समीक्षा शुरू कर दीजिए फिर भी कुछ जानना है तो फोन उठाइए और कॉल कर लीजिए नीचे लिखे नं0 पर, शाम 5.00 से 6.00 के बीच कुछ बता ही दूँगा। मेरा जाता ही क्‍या है।

फोन नं0 09312276633