05 जून, 2008

परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति

उस स्‍त्री ने बच्‍ची को नहलाया
कपड़े पहनाए
और फिर
आरती पर
साथ लेकर बैठ गयी उसे।

बच्‍ची ने हाथ जोड़े
प्रसाद खाया

और जैसे-जैसे माँ करती गयी
नकल उतारती रही वह

सुबह शाम
घंटी बजाने की जिद
धूप सुलगाने की ललक
बच्‍ची में

पनपती चली गयी माँ की तरह।
दिन बीते

अब वह बड़ी हो गयी थी
माँ से सोचती थी अलग
कुछ बताती थी
और ज्‍यादा छिपाती थी।

अलग अस्तित्‍व
पहचान की जिद
उसे लगा वह
बिल्‍कुल अलग है माँ से।
माँ की परंपरा
पुरानी सी जान पड़ती थी
मूल्‍य अधूरे

रूढि़यों से घिरी दीखती थी वह
माँ को।
फिर एक दिन वह खुद
बन गयी माँ
उसकी बच्‍ची की आँखों से
झाँक रहे थे अनेक सवाल
शायद उसी के अपने

सवाल।
उसने महसूस किया कि
माँए

हमेशा पुरानी अधूरी और अपर्याप्‍त होती हैं
पर, उनमें प्रवाह थमता नहीं
न रुकती है अपनों के प्रति प्‍यार और अनुरक्ति
माँए होती हैं
परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति।


 


 

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

हमेशा पुरानी अधूरी और अपर्याप्‍त होती हैं
पर, उनमें प्रवाह थमता नहीं
न रुकती है अपनों के प्रति प्‍यार और अनुरक्ति
माँए होती हैं
परंपरा,प्रवाह और संस्‍कृति।



-बहुत गहरी रचना है-जनरेशन गैप.

pravin ने कहा…

ap sachmuch ke kavi hain sir!!!!