14 सितंबर, 2009

पहाड पर बारिश

दूसरी अौर अंतिम किस्त
दिल्ली से दार्जिलिंग तक का वृतांत आप सुन चुके हैं।हमारी सहयोगी दीपिका महेंद्रू ने अपनी बेबाक टिप्पणी में कहा है कि कुछ गैर-जरूरी विवरण पुराने वृत्त में आ गए हैं,मसलन एअरलाइंस और होटल के नाम आदि। मैं उनसे सहमत होते हुए भी यह कहना चाहूँगा कि यह जिज्ञासा शमन का ही अतिरिक्त उपक्रम था। यानी, वृतांत को केवल भावना के धरातल के स्तर पर न छोड़कर सूचना से समृद्ध करने की सामान्य-सी कोशिश।

दार्जिलिंग से कलिमपोंग की ओर बढ़ते हुए हमने दो बड़े परिवर्तन देखे। एक तो यही कि सड़कों के किनारे पानी के झरनों की तादात बढ़ने लगी थी और दूसरी यह कि तीस्ता अब हमारे साथ-साथ चलने लगी थी।कहना न होगा कि आगे की यात्रा में यह हमारे साथ बनी रही। पूरे रास्ते मानसून की आहट साफ सुनी जा सकती थी। पहाड़ पर बारिश मेरी सदा से कमजोरी रहा है। मुझे याद है कि जब मैं अपने विद्यार्थियों (हिंदू कॉलेज) के साथ नैनीताल गया था तो टिफिन टॉप से लौटते वक्त दिन में ही अंधेरा हो गया और जोरदार बारिश शुरू हो गयी। लगभग बीस लोगों की टोली बीच सड़क पर गुम-सी हो गयी। हमें बस यह एहसास था कि हम साथ हैं। पहाड़ों की बारिश सहचर्य और अकेलेपन को एकसाथ बुनने में कुशल है। एकदूसरे से ऊब और आवश्यकता का सामंजस्य बिठाती हुई। खैर, तो हम कलिमपोंग की ओर बढ़ रहे थे और जंगल, नदी,पहाड़,झरने और वर्षा सब एकसाथ आ उपस्थित हुए थे। एक मोहक वातावरण । पर तभी मेरी नजर दूर पहाड़ी पर टंगी एक बस्ती पर गयी। मैंने ड्राइवर से पूछा वहाँ भी लोग रहते हैं, उसने संक्षिप्त उत्तर दिया-उससे भी आगे। सभ्यता के बीच अपने ही सपनों में जीते नागरिक समूह। रात में ढिबरी की रोशनी और दिन में सूरज का साथ,बस इतने से काम चलाने वाले लोगों का एक व्यापक समूह अभी है इस धरती पर। दिमाग देर तक गड्ड-मड्ड रहा। कलिमपोंग का कुछ हाल पहले ही बता चुका हूँ। वहाँ एक रात गुजारने के बाद हमारा अगला पड़ाव था-गंतोक। लगभग तीन बज रहे थे और हम अपने होटल पहुँच गये। थकान कुछ खास न थी पर आधा घंटा ठहरकर हम आसपास की कुछ जगहों को देख सकते थे। हमने तय किया कि हम रूमटेक जाएँगे। तिब्बत और भारत के बीच एक सेतु बनाता तीर्थ। तीर्थ – आज इस शब्द को कुछ राजनीतिज्ञों ने इतना विकृत कर दिया है कि लोग इसका प्रयोग करते हिचकिचाते हैं। रुमटेक में स्वर्ण-स्तूप का खासा महत्त्व है। सदियों से चली आ रही उपासना का केंद्र। पत्नी ने हवनकुंड से राख(भभूत)की एक मुट्ठी भर ली। आज भी वह हमारे पास सुरक्षित है-एक जीवंत स्मृति की तरह। बौद्धों ने जीवन को एक नए नजरिए से देखा है। अपने मठों में वे आज आत्म-संधान के बहुविध उपायों को खोजने में लगें हैं। रुमटेक में शाम की आरती प्रारंभ हो गयी थी। तेज ध्वनियों का मधुरतम संगम। अनेक वाद्ययंत्रों का सामूहिक उद्यम। आरती के शब्द भले ही समझ न आ रहे हों पर संगीत पूरी तरह संप्रेष्य था। एक ओर आदिवासी और दूसरी ओर ये भिक्षु – बहुत कुछ एकदूसरे की तरह जीवन जीते हुए,तनाव रहित और अपनी दुनिया में मगन।अंधेरा घिरने लगा था। हल्की फुहार अब भी पड़ रही थी। गंतोक का मुख्य शहर यहाँ से 20 कि.मी. दूर है। रास्ते अनेकों झरने शांतभाव से पहाड़ों से उतर घाटी की तलहटी में चुपचाप समा जा रहे हैं। तकरीबन आधे घंटे बाद गंतोक शहर की रोशनी दीखने लगी थी। यहाँ का माल रोड अनूठा है। बीच-बीच में फुहारे और दुकानों के बाहर बैठने का पर्याप्त स्थान। हम करीब दो घंटे वहाँ रहे और गाँधी की प्रतिमा से मेरा संवाद चलता रहा। जब खाने के बाद साने की बारी आयी तो दिमाग में विचारों का कॉकटेल बन चुका था।

सिक्किम को पवित्र भूमि भी कहा जाता है।दिल्ली में एक-एक बूँद पानी के लिये तरसते लोग अौर उसे बचाने के तमाम उपदेश । सिक्किम के अनंत निर्मल जल-स्रोत प्रवाह अौर निरंतरता सहज आख्यान हैं।पहाड़ों पर बैठे बादल अपनी गाथा स्वयं कह रहे थे।

अगली सुबह हमें जल्दी उठना था। चीन की सीमा को जो छूना था। हमारे परमिट तैयार हो चुके थे।ब्रेकफास्ट के साथ ही हम निकल पड़े अपने पहले गंतव्य छंगू झील की ओर। अभी हम निकले ही थे कि रास्ते में एक जनाजा निकलता दिखायी दिया। हमें पता चला कि तिब्बती और सिक्किम के मूल निवासी शवों को सीधा रखकर ही जलाते हैं। शवयात्रा भी मृत शरीर को बिठा कर ही निकाली जाती है। जहाँ शरीर को जलाया जाता है वहाँ सौ झंडे भी गाड़ दिए जाते हैं। झंडे काफी दिनों तक हवा में लहराते रहते हैं और फिर वातावरण में विलीन। चले गए व्यक्ति की तरह अपने पदचिह्न मानस-पटल पर छोड़कर।हम लगातार ऊचाइयाँ चढ़ते जा रहे थे।बादलों का रेला चला आ रहा था पर बारिश अभी न थी। एक जगह हमारे परमिट चेक किए गए और हम आगे बढ़ गए। आगे के पहाड़ दुर्धर्ष होते जा रहे थे।मौसम तेजी से करवट ले रहा था। हवा में ठंडक पसरती जा रही थी।बादल हमारी गड्डी के पास ही मडरा रहे थे ।
अब हम लगभग 11000 फीट की ऊँचाई पर पहुँच गए थे। सामने यांग्स्ला कैफे था। इसके साथ ही एक नाटिस बोर्ड लगा था जो इस बात कि चेतावनी दे रहा था कि बिना परमिट आप आगे प्रवेश न करें। हमने इस कैफे में ही अपना लंच किया और कुछ टॉफी जैसी चीजें खरीद लीं। आगे का रास्ता और भी कठिन था। अब बारिश भी मूसलाधार होने लगी थी। पहाड़ से लेकर घाटियों तक जल का साम्राज्य विस्तृत हो चुका था। सड़क पतली होती जा रही थी। कुछेक स्थानों पर निर्माण कार्य भी हो रहा था। बारूद से छोटे-छोटे विस्फोट कर सड़क को चौड़ा किया जा रहा था। चीन की सीमा के अब हम काफी करीब आ रहे थे और भारतीय फौज की सक्रिय गतिविधि को महसूस कर रहे थे । पगडंडी नुमा सड़क पर दौड़ती हुई हमारी गाड़ी दिल की धड़कन तेज कर रही थी। अब पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश का खेल चल रहा था। कभी बादल घनघोर अंधेरा कर देते तो कभी बिल्कुल उजाला हो जाता। सामने छंगू झील(Tsomgo Lake) का अद्भुत दृश्य था। इतनी ऊँचाई पर इतनी विशाल झील, कुदरत का नायाब कारनामा। याक की सवारी की। हैट और चश्मा भी लगाया। जून में भी फुल स्लीव का स्वेटर पहनना पड़ा।एक मनोरम झील ने अपने दृश्य मात्र से हमारे एहसास को समृद्ध कर दिया था। आगे बाबा मंदिर है। वही सिख सैनिक बाबा जिन्होंने चीन बार्डर पर एक मिथकीय छवि बना ली है। भारत का नाथू ला का बार्डर अपेक्षाकृत शांत है वहाँ पाकिस्तान जैसा चौकन्नापन नहीं मिलता। मन हुआ चीन की सीमा में भी घूम आऊँ पर इजाजत कहाँ। आदमी ने कितने बंधन बना लिए हैं अपने लिए,अनेकों कृत्रिम विभाजन।हम दिल्ली लौट रहे थे पर हमारे भीतर बहुत कुछ बदल चुका था।नयी यादों और ताजे बिम्बों के साथ हम वापस आ गए थे अपने शहर की जमीं पर।

3 टिप्‍पणियां:

Ram ने कहा…

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डॉ .अनुराग ने कहा…

dilchasp hai.....

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

کبھی ہمیں بھی لے چلے سر