31 अगस्त, 2009

दिल्ली से दार्जिलिंग

जून का महीना आते-आते दिल्ली की सड़कें,बस्तियाँ और चौराहे गर्मी से उबलने लगते हैं। इस बार मन था का भारत के दूरस्थ हिस्से की ओर प्रस्थान किया जाय। अक्सर अपनी यात्रा की रूपरेखा मैं मानचित्र को देखकर बनाता हूँ। इसमें मेरी सहायता राहुल सांकृत्यायन,कृष्णनाथ और प्रयाग शुक्ल का साहित्य करता है। जब-जब भारत का नक्शा हाथ में आता सिक्किम अलग से टंगा हुआ प्रदेश-रोमांच और कौतूहल पैदा करता। भोटिया जीवन के बारे में बड़े विस्तार से राहुल जी ने लिखा है। नाथू ला और पुराने सिल्क मार्ग के बारे में एक तीव्र जिज्ञासा ने बहुत दिन से घेर रखा था। तिस्ता का आकर्षण भी अनेक तरह से घेरे हुए था। तो निश्चय हुआ कि इस बार सिक्किम देखा जाय। परिवार के अन्य सदस्यों से बात हुई, एक लोकतांत्रिक तरीके से जिसमें छोटे-बड़े सबने अपनी राय रखी। तय हुआ कि पहले दार्जिलिंग और फिर सिक्किम चला जाय। एक मित्र ने सलाह दी तो कालिमपाँग भी जोड़ दिया गया। हवाई यात्रा का भी लुत्फ उठाना था और एक निश्चित समय भी तय करना था। मुझे पहाड़ों की बारिश उसी तरह लुभाती है जैसे पहला-पहला प्यार। सो, इसमें मैंने समय तय करने में अपनी चलायी और 15 जून को किंगफिशरसे दिल्ली से बागडोगरा की ओर उड़ जाने का निश्चय कर दिया गया।जून की शुरुआत ही थी।दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल में भयंकर तूफानआइला ने दहशत फैला दी थी। हमारी यात्रा भी आशंकाओं से घिर गयी थी।पर, 15 जून तक सब ठीक हो चला था। दोपहर 1 बजे हमारा विमान बागडोगरा विमानपत्तन पर उतर चुका था। दिल्ली जैसी ही डरावनी गर्मी। मेरा ग्रामीण सामंती बोध भी जागृत हुआ और टाटा सूमो से ही दार्जिलिंग की ओर रुख किया गया। थोड़ी दूर,तकरीबन आधा घंटे चले होंगे कि पहाड़ी राह चुकी थी। हम आगे बढ़ते रहे,मार्ग दुर्गम होता चला गया, गरमी छूटती चली गयी। फिर एक जगह ढेर से बादलों ने घेर लिया जैसे कि दिल्ली में दिसंबर-जनवरी की धुंध भरे माहौल में होता है। हम सब पुलकित हो उठे थे। छोटी बेटी वर्तिका अब चहचहाने लगी थी।उसके अनेक प्रश्न और जिज्ञासाएँ। उसकी बातें मुझे कविता-सी मालूम पड़ने लगी। प्रकृति मनुष्य को सहज ही कवि बना देती है।
हमारा पहला पड़ावमिरिक लेकथा।यह झील बादलों के बीच कभी गुम हो जाती तो कभी इसका लहराता पानी खिलखिलाने लगता। पास ही एक स्कूल से बच्चों का एक झुंड टहलता हुआ वहाँ चला आया था।पानी और बादलों के बीच हम जो महसूस कर रहे थे,उसका साझा करने के लिए मुकम्मल शब्द हमें नहीं मिले। ठंड महसूस हो रही थी और किस्मत से भुट्टे मिल गए और सबकी एक राय बन गयी कि एक-एक सब खाएँगे। कुछ ऐसी ही चीजों को खाकर हमारा पेट भर गया था। ड्राइवर ने आकर हमें आगाह किया कि अब आगे बढ़े क्योंकि हमें नेपाल की एक मार्केट भी देखनी है जो शाम पाँच बजे के बाद बंद हो जाती है। हम फटाफट वहाँ से निकल पड़े और अब पशुपतिनगर की ओर हम रुख कर चुके थे।मौसम अब भी खुशनुमा बना हुआ था।पश्चिम बंगाल की सीमा को छूता हुआ नेपाल का पशुपतिनगर दोनों तरफ आने-जाने के अत्यंत सुगम। वैसे ही जैसे आपको दिल्ली से नोएडा(.प्र.) जाना हो। मुझे लगा भारत और नेपाल सहज-स्वाभाविक मित्र हैं, तो इसके पीछे इनके भूगोल की बड़ी भूमिका है। हम नेपाल की मार्केट में प्रवेश कर चुके थे। एक सामान्य सा बाजार। पर परराष्ट्र की धरती का स्पर्श एक नया एहसास रच रहा था। परायापन कभी-कभी जरूरी होता है।अब हम नेपाल की सीमा के साथ-साथ दार्जीलिंग के रास्ते पर थे। एक जगह दो गाँव सड़क के इधर और उधर मिले ड्राइवर ने बताया कि बायीं ओर वाला नेपाल और दायीं ओर का भारत का है।एक कुत्ता सड़क पार कर रहा था। मेरे मुँह से बरबस निकला यह नेपाली है या भारतीय। हम सबका ठहाका छूट गया। धुँधलका होते-होते हम दार्जीलिंग के अपने होटल त्रेवरल्स इनमें पहुँच गए थे। हल्की फुहार पड़ रही थी दिल्ली परिजनों को फोन कर दार्जीलिंग पहुँचने की सूचना दी। इस सूचना में खुद के आनंद और दूसरों के दुख का साझा भी था और प्रकृति का धन्यवाद भी।

दार्जिलिंग में मौसम खुशगवार था। पर शहर के निचले हिस्से में पूरी धकमपेल थी। पहाडियाँ पूरी तरह बस्तियों से आच्छादित हो चुकी हैं। हाँ आसमान में बादलों का रेला जरूर लगा रहता है। यहाँ हमने चाय बागान देखें और उनमें सैर भी की। तिब्बती शरणार्थियों का एक शिविर भी यहाँ है। वे बड़े शानदार कालीन ऊनी कपड़ों का निर्माण यहाँ करते हैं। एक दृढ़ता और विराट संकल्प आज भी उन्हें अपनी आजादी का सपना संजोने के लिए प्रेरित किए हुए है। एक जापानी मंदिर भी हमने देखा, बुद्ध का शांति संदेश रचता हुआ।दो दिन दार्जिलिंग में व्यतीत कर हम कालिमपोंग की ओर निकल पड़े। इस शहर की चर्चा राहुल जी ने अपने यात्रा-वृतांतों में विस्तार कर रखी है। कालिमपोंग का मुख्य बाजार दिल्ली के सदर जितना ही भीड़भाड़ वाला है और लगभग उसी तरह की वस्तुओं की खरीद-बिक्री भी यहाँ होती है। देवलो की पहाड़ी यहाँ की सबसे शानदार और ऊँची जगह है। यहाँ से तिस्ता नदी का अद्भुत नजारा दिखता है। पहाड़ों के ऊपर छिपी बस्तियों उसमें रहने वाले लोगों का शांतिमय जीवन मेरे भीतर भय का संचार करता है मुझे हमेशा डर लगता हे कि मैं कभी वैराग्य धारण कर लूँ। एक बार शायद 12 वीं कक्षा में था तो हरिद्वार के सतपाल महराज के आश्रम में इसी उद्देश्य से पहुँच गया था। खैर, कालिमपोंग में बहुत से बौद्ध विहार हैं और फौज की छावनी भी। पर, लोग वैसे ही संघर्षरत हैं, जैसे कहीं और।
क्रमश: जारी

3 टिप्‍पणियां:

Neelima ने कहा…

खूबसूरत चित्र !घूमने आप जून में गए वृत्तांत अब सुनाया ! ज़े तो बहुत नाइंसाफी है...... !

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

मेरी पसंद का लेख, और लिखो ऐसे ही,

bannaram meena ने कहा…

sir bahut aacha laga