09 नवंबर, 2008

हिंदी फिल्में –भाषा, साहित्य और संस्कृति की लोकदूत

फिल्में एक ऐसे कला माध्‍यम के रूप में हमारे सामने उपस्थित है, जिसमें अनेक कलाओं का पड़ाव दिखाई देता है। भाषाई और रूपकर कलाएँ तो फिल्में में हमेशा ही अपना दखल रखती आयी हैं, परंतु साहित्यिक कृतियों के सिनेमाई रूपांतरण, सिनेमा में बोलियों और आंचलिकता की अनुगूँज, गीतों का निर्माण एवं प्रसार, भाषाभाषी समाज की कलात्मक अभिरूचि एवं कला मानकों का विकास, सांस्कृतिक रंगो, ध्‍वनियों की उद्भावना और संदेश संप्रेषण तथा शिक्षण प्रक्रिया के द्वारा भाषा, साहित्य और संस्कृति का गठन फिल्मों का महत्वपूर्ण अवदान माना जा सकता है। हिन्दी फिल्में भी अपनी इस भूमिका में पीछे नहीं है।

हिन्दी फिल्में ;अध्किांशत: जिनका उत्पादन संगठित/औद्योगिक रूप में मुबंई में होता है, जिसे 'बॉलीवुड' भी कहा जाता है
हिन्दी भाषा (दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा ही नहीं, अपितु हिन्दी जाति ;जो मूलत: भारत के उत्तरी क्षेत्रों में निवास करती है) के जीवन सरोकारों, स्पंदन, भावात्मक संचार, आर्थिक स्थिति एवं वैचारिक बनावट को दर्शाती है। बॉलीवुड, जहाँ हिंदी फिल्मों का औद्योगिक निर्माण होता है, हिंदी फिल्मों का क्षेत्रीय सीमाओं, भौगोलिकों बाध्‍यताओं एवं भाषाई घेरेबंदी को चटखा देता है। हिंदी फिल्में के निर्माण व वितरण में हिंदीतर भाषाभाषी लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिल्म निर्माण एक सामूहिक कार्य है इसलिए हिंदी फिल्में भारत और कई बार भारत के बाहर से भी मानव संसाध्नों का उपयोग करती हैं। इसके चलते हिंदी फिल्मों की कुशलता, प्रभावोत्पादकता काफी बढ़ जाती है। अभिप्राय यह कि हिंदी फिल्म संसार भारतीय विविधता में एकता के सूत्र विकसित करता है। विभिन्न भाषाई भौगोलिक समूहों को इकट्ठा करके उनमें आपसी समन्वय स्थापित करता है। इस प्रकार हिंदी फिल्में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं बंगला, तमिल, कन्नड़ आदि की तुलना में अध्कि विस्तृत लक्ष्य को प्रस्तावित करती हैं। जहाँ हम बाकियों को क्षेत्रीय सिनेमा कह सकते हैं वहीं अपनी निर्माण प्रक्रिया और उद्यमी चरित्र के चलते तथा समस्त भारतीय प्रतिनिध्त्वि (अभिनय, संगीत, तकनीक, संपादन, वितरण) के समाहार होने के कारण हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय ;न कि केवल उत्तर भारतीय सिनेमा कहना पड़ेगा। हिंदी फिल्मों को राष्ट्रीय सिनेमा कहना सर्वथा समीचीन भी है क्योंकि इन फिल्मों के दर्शक भारतीय भूखंड के हर हिस्से में मौजूद हैं। वे लोग भी जिन्हें न तो ठीक से हिंदी लिखनी, पढ़नी, बोलनी आती है वे भी हिंदी फिल्में देखते हैं और उसका संदेश ग्रहण करने में सक्षम होते हैं। साथ ही, हिंदी फिल्में राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दों को लगातार गंभीरता और सहजता से उठाती है। भारत की राष्ट्रीय संस्कृति, सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक घटनाचक्र का बैरोमीटर बनकर हिंदी फिल्में भारतीय राष्ट्र की मुख्य चिंताधरा का उद्घाटन करती हैं। अपने इन्हीं गुणों के चलते हिंदी फिल्में सच्चे अर्थों में भारत के राष्ट्रीय सिनेमा से अभिहित किया जाता रहा है। फिर भी, अपनी भाषाई बनावट के चलते हिंदी फिल्में हिंदी भाषी समूहों में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

भाषा प्रसार उसके प्रयोक्तासमूह के संस्कृति और जातीय प्रश्नों को साथ लेकर चला करता है। हिन्दी फिल्में निश्चय ही हिन्दी भाषा के प्रचारप्रसार में अपनी विश्वव्यापी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं। उनकी यह प्रक्रिया अत्यंत सहज, बोधगम्य, रोचक, संप्रेषणीय और ग्राह्य हैं। हिन्दी ;हिन्दी यहाँ भाषा, साहित्य और जाति तीनों अर्थों में ली जा सकती है।द्ध के प्रचारप्रसार के मायम के रूप में जब हम हिन्दी फिल्मों पर दृष्टिपात करते हैं तो निम्नलिखित मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से उभरते हैं

1. भाषा का प्रचारप्रसार

2. साहित्यिक कृतियों का फिल्मी रुपांतरण

3. फिल्मी गीतों की लोकप्रियता

4. हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों का सिनेमा

5. कलात्मक आलोचनाशास्त्रा का निर्माण

6. सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में हिंदी फिल्मों का योगदान

हिन्दी फिल्मों में ध्‍वनि का आगमन हालांकि 1931 ई. (आलम आरा, आर्देशिर ईरानी) में होता है परंतु 1912 में ही दादा साहब फाल्के की फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (भारत की पहली फीचर फिल्म) में उपशीर्षकों की भाषा हिन्दी की उस विशिष्ट शैली (जो आज बोलचाल में प्रयोग होती है तथा जिसमें विश्वस्तर पर पनपने की संभावना है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भी स्वीकृत कराया जा सकता है) के दर्शन होते हैं, जो बाद में हिन्दी भाषी समूहों में लोकप्रिय होती चली गई। इस फिल्म के शीर्षकों को देखें तो हम पाते हैं कि इसमें लगभग 95 शब्दों का प्रयोग हुआ है, उनमें से 8 उर्दू में है बाकी संस्कृत और हिन्दी के है। 'साड़गता' शब्द मराठी भाषा का है। एकदो शब्दों में वर्तनी की अशुद्धता भी है। पहली फिल्म में ही भाषा की व्यापकता हमें दीखती है। हिंदी फिल्मों ने हिन्दी की ऐसी भाषाशैली विकसित करने और उसे गैर हिन्दी भाषी क्षेत्रों, भारतेत्तर जसमूहों में प्रचलित करने में मदद की जो आज हर जबान से फूटती हैं।

हिंदी फिल्मों की भाषा को लेकर भी भ्रम पैदा किया जाता रहा है। अपने हाल के ही एक लेख में प्रो. हरीश त्रिवेदी ने इस भ्रम का तर्कसंगत निराकरण किया है कि हिंदी फिल्मों की वास्तविक भाषा उर्दू है। फिल्मों के नामकरण, संवाद, लेखन और गीतों के विश्लेषण से कुछ फिल्म विचारकों ने सिद्ध किया था कि हिंदी फिल्मों को कायदे से उर्दू फिल्म कहा जाना चाहिए लेकिन न तो नामकरण और न ही संवादों के आधर पर यह सिद्ध किया जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में उर्दू का वर्चस्व है। गीतों में अवश्य ही उर्दू शब्दों की प्रचुरता दिखाई देती है लेकिन इस उर्दू को हिंदी के निकट कहा जा सकता है।

फिल्में भाषाई प्रचार को गति कैसे देती है? इस प्रश्न का उत्तर साफ है कि फिल्में मात्र मौखिक भाषा का ही आलंबन नहीं ग्रहण करती वरन् मौखिक भाषाओं के साथ दृश्य भाषा पूरक के रूप में साथसाथ चला करती है। हिंदी फिल्मों ने भी बड़े अनुभव के बाद अपनी दृश्य भाषा का निर्माण एवं गठन सुनिश्चित किया है। हम अपनी आम बातचीत के दौरान भी दृश्य भाषा का प्रयोग करते हैं। मसलन यहां या वहां बैठने के लिए तर्जनी के संकेत। 'यहां' के लिए तर्जनी क साथ अन्य अंगुलियां भी साथ जुड़ी होती हैं जबकि 'वहाँ' के संकेत में वह अकेली और तनी हुई होती है। यदि संदर्भ बैठने (स्वागतोपरांत आदि) का हो तो हम किसी भी भाषा में बोलते हुए इस तरह की देह भाषा का प्रयोग करते हैं। मौखिक भाषा को न जानने वाला या कम जानने वाल व्यक्ति संकेतों को ग्रहण करते हुए भाषाई आरोह और अवरोह के आधर पर पूरा अर्थ समझ जाता है। फिल्मों में दृश्य की ताकत मौखिक भाषा की बाधओं को दूर कर उसे अध्कि संप्रेषण बना देती है इसलिए वे निभाषी समूहों तक अपने अर्थ का प्रकाशन संभव कर पाती है। हिंदी फिल्मों की दृश्यता हिंदी भाषा के अर्थ प्रसार में सहायक रही है। भारत में प्रतीकों की प्रचुरता और प्राचीनता अर्थ संप्रेषणीय में कारगर सिद्ध हुई है। इन प्रतीकों उदाहरणत: 'शिवलिंग' या 'बांसुरी' की वर्तनियाँ भिन्न होने के बावजूद उन्हें पूरे भारत के लोग ग्रहण कर लेते है। हिंदी फिल्मों ने इस प्रतीकात्मकता को अपनाकर अपनी संप्रेषणीयता गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में सुनिश्चित की है। दृश्य भाषा के विकास और प्रतीकात्मकता बुनावट के सहारे हिंदी, हिंदी फिल्में के मायम से उन जनसमूहों में समादृत और लोकप्रिय हुई जो किसी अन्य मायम से संभव न थी।

हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी साहित्य को भी आम लोगों ;वे लोग भी जो निरक्षर है या फिर हिन्दी पढ़ नहीं सकते या पढ़ना नहीं चाहते, देशीविदेशी दोनोंद्ध तक पहुँचाने में सपफलता अर्जित की है। हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों शतरंज के खिलाड़ी, तीसरी कसम, चित्रलेखा, सूरज का सातवाँ घोड़ा, माया दर्पण, तमस, सारा आकाश पर फिल्में बनी हैं। हिंदी साहित्य का व्यापक प्रसार पूरे विश्व में फिल्मों के जरिए हुआ है।

साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण साहित्य को नई संचारात्मक और संप्रेषण शक्ति प्रदान कर देता है। निरक्षर लोग और गैर भाषाई लोगों तक भी साहित्य की पहुँच इसके पफलस्वरूप हो जाती है। यदि देखें तो हम पाते हैं कि साहित्यसंरचना का मूलाधर भाषा है जबकि वहीं साहित्य जब फिल्मी पर्दें पर आता है तो दृश्य उसके केंद्र में होता है। भाषाओं का भूगोल सीमित और दृश्यों का व्यापक होता है। जरूरी नहीं कि दृश्य हमेशा असीमित भौगोलिक विस्तार को संबोधित करने की क्षमता रखते हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अंडमान द्वीप के कई आदिवासियों ने अपने ऊपर से उड़ते हवाई जहाज को देखा तो उन्होंने इसे विराट पक्षी के रूप में परिकल्पित किया। दृश्य यथार्थ विम्बों के अभाव में अपना अर्थ संप्रेषण नहीं कर सकते हैं लेकिन भाषा कि तुलना में वे अधिक संप्रेष्य कहे जा सकते हैं। पहाड़, पेड़, पक्षियों के दृश्य पूरी मानवता को संबोध्ति कर सकते हैं लेकिन हवाई जहाज सीमित लोगों की पहुँच के चलते सीमित लोगों तक ही अपने अर्थ का प्रतिपादन करने में सक्षम होते हैं। माथे की विंदी एक सांस्कृतिक प्रतीक होने के चलते भारत के विभिन्न भाषाभाषी समूहों पर सहज ही अर्थ प्रकट कर सकती है परंतु पश्चिमी दुनिया के लिए उसका अर्थ व अभिप्राय लगाना कठिन होता है। संस्कृति विम्बों के द्वारा निर्मित होती है, भाषा उनकी सहायक होती है। हिंदी साहित्य की महान् कृतियों का फिल्म विध में रूपांतरण उनकी लोकप्रियता और पहुँच को सुनिश्चित करता है। 'तीसरी कसम' पफणीश्वरनाथ रेणु की महत्वपूर्ण कहानी है इसी पर बासु भट्टाचार्य ने जब फिल्म का निर्माण किया तो वह गैर हिंदी भाषियों के लिए भी सहजसप्रेष्य हो उठी। उसमें गानों ने अतिरिक्त ऊर्जा का समावेश करा दिया और उनकी व्यापकता को सुनिश्चित कर दिया। अभिनय, संगीत, दृश्यांकन ने मिलकर इस कहानी का कायाकल्प कर दिया। कहानी में अनेक मार्मिक स्थल ;स्टेशन पर हीरामन, हीराबाई का विछोह आदि भारतीय समाज के स्मृति पटल पर सदैव के लिए अंकित हो गए।

फिल्मी गीत अपनी संगीतात्मकता के चलते अध्कि संचारात्मक प्रकृति के होते हैं। हिन्दी फिल्मी गीत उन लोगों की जबान भी चढ़े दिखाई देते हैं जिन्होंने हिन्दी को कभी व्यवस्थित ढंग से पढ़ा नहीं। इन गीतों के मायम से हिन्दी दुनिया के विभिन्न भागों तक पहुँची। गीत आसानी से हमारी स्मृति का अंग बन जाते हैं इसलिए भाषाई प्रचारप्रसार का सहज, दीर्घजीवी मायम बनते हैं। हिन्दी फिल्मी गीतों में भी यह गुण विशेषतौर पर मौजूद है। कोई भी समाज या राष्ट्र अपने गीतों के मायम से अपने हृदय को खोलता है। पहले निम्न गीतों पर एक दृष्टि डालते हैं

जब दिल ही टूट गया (1946, शाहजहाँ)

वतन की राह में वतन के नौजवों (1948, शहीद)

लारा लप्पा, लारा लप्पा (1949, एक थी लड़की)

मेरे पिया गए रंगून, किया है (1949, पतंगा)

तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं (1950, बावरे नैन)

तू गंगा की मौज, मैं जमुना का (1952, बैजूवावरा)

दे दी हमें आजादी (1954, जागृति)

मेरा जूता है जापानी (1955, श्री 420)

डम डम डिगा डिगा, मौसम (1960, छलिया)

इंसाफ की डगर पर (1961, गंगाजमुना)

मेरा रंग से बसंती चोला (1965, शहीद)

सजन रे झूठ मत बोलो (1966, तीसरी कसम)

झूठ बोले कौवा काटे (1973, बॉबी)

मैं तो आरती उतारूं रे (1975, जय संतोषी माँ)

दीदी, तेरा देवर दीवाना (1990, हम आपके है कौन)

ईलू ईलू (1990, सौदागर)

उपरोक्त गीत बदलते सामाजिक परिदृश्य के साथसाथ अपनी लोकप्रियता का संकेत भी करते हैं। अपने संगीतात्मक विधन, खूबसूरत शिल्प और संचारधर्मी तेवर के चलते ये गीत भाषाई समूहों के साथसाथ विभाषाई जनों तक पहुँचे और उनका कण्ठहार बने। इन गीतों में निजी दर्द के साथ राष्ट्रीयता, अयात्मिकता, सामाजिक संबंध्, जीवनमृत्यु के प्रश्न, कॉमेडी और वनयात्मक सरंचनाओं को सहज ही देखा जा सकता है। गीतों को जब संगीत का आलंबन मिलता है तो उनकी यात्रा लंबी हो जाती है। वे अपने इतिहास और भूगोल का अतिक्रमण करने की क्षमता अर्जित कर लेते है। हिंदी फिल्मी गीतों ने देश और विदेश की लंबी यात्राएं करने में सपफलता पायी है। इनके मायम से हिंदी भाषा और संस्कृति भावपूर्ण प्रवाह के रूप में जनजन तक पहुँची।

आज हिन्दीजनसंचार के जितने भी माध्‍यम है उनमें हिंदी की उपभाषाओं/बोलियों का प्रयोग निरंतर क्षीण हुआ है। संभवत: यह माना जा चुका है कि बोलियाँ समूह के निजी संप्रेषण के लिए ही रह गई है। लेकिन, हिन्दी की बोलियों भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, राजस्थानी, बुंदेली, हरियाणवी, मैथिली में बनने वाली फिल्मों ने इन्हें नया जीवन प्रदान किया। हिन्दी की ये बोलियाँ फिल्मों के माध्‍यम से न अपनी अस्तित्व रक्षा कर रही है वरन् हिन्दी भाषा के वैविध्‍य को बचाए रखने, उसके शब्द भंडार मे इजाफा करने और हिन्दी की व्यापकता के सुनिश्चय में लगी हुई है।

हिंदी की उपभाषाओं में फिल्मी नजरिए देखे तो भोजपुरी सर्वाध्कि महत्वपूर्ण उपभाषा के रूप में उभरती है। आजादी के पहले ही मोतीलाल बी.ए. ने 'नदिया के पार' नामक फिल्म में भोजपुरी गीतों का समावेश करवा दिया था और फिर भोजपुरी भाषा संवादों और गीतों के मायम से हिंदी सिनेमा में लगातार बनी रही। भोजपुरी फिल्म का व्यवस्थित निर्माण 1962 में गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबे मे होता है, इसके बाद की अनेक महत्वपूर्ण फिल्म कृतियाँ 'लागी नाही छूटे राम', 'कब होई है गवनवा हमार', 'भौजी दंगल', 'गंगाकिनारे मोरा गांव', 'राखी की लाज', 'बलम परदेसिया', 'भईया दूज', 'तुलसी सोते हमार अंगना'। हमारे समक्ष आयी। भोजपुरी फिल्में न केवल भारत वरन् मॉरीशस और त्रिनिडाड में भी लोकप्रिय हैं और इस प्रकार हिंदी भाषा के ही एक रूप का विस्तार कर रही हैं।

मैथिली भाषा की फिल्मों के निर्माण का प्रयास 1964 में माना जा सकता है जब ममता गाबय गीत, (निर्देशक परमानंद) को बनने का उद्यम हुआ। मैथिली फिल्में अपनी शैशवावस्था में हैं लेकिन कन्यादान (1964) और 'सस्ता जिनगी महंगा सिनूर' (1999, बालकृष्ण झा निर्माता) मैथिल भाषा में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को रचते है। भक्ति और श्रृंगार के अनूठे कवि विद्यापति की भाषा फिल्मी पदें‍र् पर आकर अधिक लोकप्रिय व जन संप्रेषी हो सकेगी

हरियाणवी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी सिनेमा भी प्रकारांतर से हिंदी के प्रचारप्रसार को ही सुनिश्चित कररहे हैं। हरियाणवी सिनेमा की 'बहूरानी' 'सांझी', 'चंद्रावल', 'जर जोरू और जमीन' जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों ने हरियाणवी भाषी हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के कुछ हिस्सों में अत्यंत लोकप्रियता अर्जित की है। सन् 2000 में प्रदर्शित 'लाडो' को राष्ट्रीय पुरस्कार ;डेब्यू निर्देशक अश्विनी चौध्रीद्ध भी मिला। छत्तीसगढ़ी फिल्में के पितामह मनुनायक और किशोर साहू माने जाते है। छठवें दशक के अंतिम वर्षों में प्रदर्शित 'कवि देवे संदेश' ;मनु नायकद्ध एक महत्वपूर्ण तथा पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कही जा सकती है, 'घरद्वार', 'छइयाभुइया' (निर्देशक सतीश जैन, 2000) एक महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी फिल्म है जिने अपने अंचल के बाहर भी व्यवसाय किया। 'भोला छत्तीस गढि़या' 'मयाज भौजी' और 'परदेसी के गया' आदि फिल्मों के छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को बल प्रदान किया है।

हिंदी बोलियों का सिनेमा अपने सीमित संसाधन और तकनीकी अपरिपक्वता के चलते भले ही कोई राष्ट्रीय, अन्र्तराष्ट्रीय पहचान न बना पाया हो परंतु इन बोलियों की शक्ति को बचाए रखने की संभावना उसने जरूर दिखाई है। जरूरत है कि क्षेत्राीय बोलियों में अधिकाधिक सिनेमा बने जिससे हिंदी भाषा का वटवृक्ष और भी ऊर्जास्रोत विकसित कर सके। बोलियों में बनने वाला सिनेमा अन्तत: हिंदी भाषा को ही समृद्ध करता है और राष्ट्रीय एकता को दृढ़ता प्रदान करता है।

भाषा के भीतर संस्कृति का प्रच्छन्न प्रवाह बना रहता है। हिंदुस्तानी समाज के विभिन्न मुद्दे राष्ट्रीयता, आतंकवाद, सामाजिक ढाँचा, पारिवारिक रिश्तें, कृषिकिसान, औद्योगिकरण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण, प्रवासी जीवन आदि हिन्दी फिल्मों में उठते रहे हैं। अपने कथानक की बनावट और भाषाई अभिव्यक्तियों में हिन्दी फिल्में इन मुद्दों के प्रति हमारा यान आकर्षित करती रही हैं। हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचारप्रसार के साथ हिन्दी भाषी समुदाय की चुनौतियां, संघर्षसपनों और चाहतों को भी विश्व पफलक पर पहुँचाया है। हिन्दी भाषा का विश्वव्यापी प्रसार इस समुदाय के मुद्दों को संबोध्ति किए बिना अधूरा ही माना जाता, लेकिन हिंदी फिल्मों ने अपनी इस भूमिका का बखूबी निर्वाह किया है।

दुनिया की कोई भाषा नए माहौल से अनुकूलन किए बिना जिंदा नहीं रह सकती। समाज में नयी हलचलों को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए भाषा को अपना ताना बाना बदलना पड़ता है। जब समाज और राष्ट्र नयी तकनीकी, कलात्मक, सांस्कृतिक जरूरतों की अपरिहार्यता से गुजरते है तब सक्षम भाषाएँ उनका साथ देने के लिए अपने नए अवतार में उपस्थित हो जाती हैं। हिंदी भाषा भी नव्यतम् चुनौतियों के वहन के लिए नयी विधओं और नए रूपों में हमारे सामने आयी है। हिंदी भाषा में फिल्म निर्माण के साथ हिंदी ने उदू‍र् को प्रमुख सहायिका बनाया, गीतों और संवादों के लिए, दृश्यता का समावेश किया, भाषा और बिम्ब के अन्तर संतुलन की पहचान की, नई तरह की शैलियों मुबंइया को भी मानक बनाया, नए तरह के कोड, बिम्ब, प्रतीक, मितकथनों को ईजाद किया। पटकथा, संवाद और गीत लेखन जैसी नयी विधओं को सृजनकिया हिंदी भाषा को तकनीकी अनुकूलन के लायक बनाया इसलिए हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के सर्वथा नए रूप रंग, और संाचेढांचे को गढ़ा है। हिंदी साहित्य और भाषा पर हिंदी फिल्मों का गहरा प्रभाव पड़ा है। हिंदी फिल्मो हिंदी के आलोचना शास्त्रा के लिए कई मानक प्रदान किए हैं। इन मानकों को नयी विधओं के रूप में तथा दृश्यता, मित कथन, संवादधर्मिता आदि कई रूपों मे चिन्हित किया जा सकता है।

किसी भी भाषा, साहित्य का विकास उसके आलोचनाशास्त्रा के बिना संभव नहीं होता। आलोचना शास्त्रा के मानदंडों का निर्माण भाषाई समूह के विविध् कलारूप तय करते हैं। हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, वैज्ञानिक अध्‍ययन, जन संप्रेषणीयता, पटकथात्मकता के निर्माण, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता दृश्य भाषा, कोड निर्माण, संक्षिप्त कथन, विम्ब धर्मिता, प्रतीकात्मकता, भाषादृश्य की अनुपातिकता आदि मानकों को हिन्दी फिल्मों ने गढ़ा है। 'इंडियन डायसपोरा' विश्वस्तर पर एक नयी अवधरणा और सच्चाई है। हिन्दी फिल्में हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुँचने की दिशा में अग्रसर हैं।

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सधा हुआ एवं उम्दा आलेख, बधाई.

अनुनाद सिंह ने कहा…

पता नहीं कि 'लोकदूत' से आपका क्या तात्पर्य है, किन्तु मुझे हिन्दी के सन्दर्भ में आपके पोस्ट का शीर्षक अनुपयुक्त लग रहा है। हिन्दी फिल्मों में न तो लोक होता है, न भाषा, न संस्कृति। साहित्य का तो नाम ही मत लीजिये।

जितेन्द़ भगत ने कहा…

सुंदर आलेख।

vijay srivastava ने कहा…

इतना लंबा आलेख पढ़ते समय कहीं बोझिल नहीं लगा. शोध बहुत उम्दा है. बधाई.