10 अगस्त, 2008

स्‍त्री और समाज






भोर की ब्रह्म वेला में
फूटते हैं वीरान चौराहे
मेरे भीतर
हवाएँ अपने सलोने जिस्‍म से
करती हैं चहल कदमी
होती है देववाणी-
स्त्रियाँ ऊर्जा केंद्र होती हैं
व्‍यक्ति की।
दोपहर में
बरसती है आग
जलने लगती हे त्‍वचा धरती की
गीली हो जाती हैं काँखें
स्त्रियों की
यातना फूट कर बहने लगती है
सदियों की।
गोधूलि में
देखता हूँ
भर जाता हे चौराहा
माफियाओं, तश्‍करों और
जेबतराशों की जमात से।
रात में फिर
बरसता हैं अँधेरा
स्‍याह हो जाते हैं
शहर और समाज
नहा जाती हैं सड़कें
होटल और रेस्‍ट्रॉ
बहुमंजिली इमारतें, आतंकियों की आरामगाहें
लाल,पीली, हरी रोशनियों से
बाहर आती हैं-नर्तकियाँ
ध्‍वनियाँ
छवियाँ
परछाइयाँ डरावनी।
तब मन सोचता है
होगी एक और भोर
उगेगा सूरज
खत्‍म होगा यह भुतहा संसार
डरावनी परछाइयाँ
बोलेगा आदमी-
’स्त्रियाँ होती हैं शक्ति-स्रोत
समाज की’
इस मानव वेला में

5 टिप्‍पणियां:

जितेन्द़ भगत ने कहा…

अच्‍छी लगी ये पंक्‍ति‍यॉं -
मेरे भीतर
हवाएँ अपने सलोने जिस्‍म से
करती हैं चहल कदमी
;;;;;;
’स्त्रियाँ होती हैं शक्ति-स्रोत
समाज की’

काली की तस्‍वीर क्‍या यहॉं कोई प्रतीक है?

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।अपनें भावों को बखूबी अभिव्यक्त किया है।

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।अपनें भावों को बखूबी अभिव्यक्त किया है।

भावना ने कहा…

yahan ik stree din ke teen vakt ki numaindagi karti hai....samaj mein use kirdaron ke teen juda waqto ki khubsurat manjar niagari hai.

pravin ने कहा…

prakriti,stri,charoo pahar bahut bhayavah diKhaya hai aapne.....mughe jahaa tak yaad haiKAVITA KI YE TECNIC VIRAL HAI