31 अक्टूबर, 2010

मुक्तकेशी की प्रेमकथा-अंतिम भाग

अगला दिन। सुबह। वे सीधे कला संकाय पहँचे। उनके पास कविता, कलम और किताबें थीं। इन्‍हीं तीन अस्‍त्रों से वे नैना पर विजय पाना चाहते थे। राजकमल चौधरी और उनकी कृति ‘मछली मरी हुई’ बहुत कुछ सोचा, पढ़ा। अब दोपहर दो बजे का इंतजार था। उनके द्वारा निर्धारित समय। अभिलाषा अपने पूरे उठान पर थी। दो बजा। नैना टाकिया अभी न आयी थी। फिर तीन, फिर चार और फिर सात बज गए। नहीं आयी नैना। न कोई फोन न सूचना। दिमाग में गुस्‍सा भर गया। ‘मेरा कीमती समय लेकर भी बिना सूचना दिए न आना कहाँ की तमीज है।’मुक्‍तकेशी मन ही मन बड़बड़ाए। ‘मैं फोन क्‍यों करू, उसे ही करना चाहिए था।’वे खुद से जिरह कर रहे थे। भारी मन और खट्टे विचारों से भरे वे कमरे पर आ गए थे। खाने का मन न हुआ। भूखे पेट विस्‍तर पर पड़ रहे।

कई बार सुबह हुई और शामें बीत गयीं। चार महीने गुजर गए। नैना की छवि धुंधली पड़ गयी। फिर एक दिन वह अचानक दिखी और मुक्‍तकेशी के बिल्‍कुल सामने आ खड़ी हुई। बड़ी तहजीब से उसने अभिवादन किया। मुक्‍तकेशी मुस्‍कराए। पर, दिमाग में गुस्‍से और गुमान का कॉकटेल बन गया। नैना बोली-‘सर मैने अपना डिजर्टेशन सब्मिट कर दिया है। मैं बस आ ही नहीं पायी। पर उस दिन की बातचीत मेरे काम की थी‍।’

‘चलो मुबारक हो’ मुक्‍तकेशी ने झूठी हँसी हँसते हुए अपनी बात कही।

’थैक्‍यू सर।’ नैना ने निर्लिप्‍त भाव से और एक पोलीबैग से कागज निकालने लगी

’सर मेरी शादी का कार्ड, अगले सप्‍ताह है, लड़का बिजनेस मैन है, आइएगा ।’वह काफी जल्‍दी में दिख रही थी।

मुक्‍तकेशी ने कार्ड पकड़ा, नैना को संपूर्णता में देखा और तुरेत रुखसत हो लिए। कितनी रातों, सुबहों और शामों को देखे गए सपनें, नैना के प्रति की गयीं अनेक मधुर कल्‍पानाएँ, गृहस्‍थ जीवन के दूसरे पड़ाव पर पहुँचने की उनकी अभिलाषा- जैसे सब पर अचानक पूर्ण विराम लग गया हो। उन्‍होंने गुस्‍से में आकर वाल्‍मीकि को टक्‍कर देने वाली कविता के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अपने इस नए अनुभव को उन्‍होंने डायरी में दर्ज किया-‘कविता, कलम और किताबों से आज के युग में प्रेम संभव नहीं।’ वे कब सोए कुछ पता नहीं।

आजकल मुक्‍तकेशी परिसर में जीन्‍स की नीचे से फटी हुई पैंट,एक जोड़ी चप्‍पल और कुर्ता पहने चहल कदमी करते है। दिल टूटने का यह उनका तीसरा वाकया है।दुनिया बदल गयी है। यह बात उन्‍हें खूब पता थी, परंतु उदारीकरण के दौर में भी अपनी वेशभूषा और बातों के चलते वे आजादी के आंदोलन का मजा लेना चाहते थे। पढ़ा-लिखा होने के चलते वे जल्‍द ही नैना टाकिया को भूल गए। अब उनका परिसर में आना भी कम हो गया है। हाँ, फेसबुक पर वे बराबर ऑनलाइन रहते हैं और नित नई संभावनाओं को तलाशते मिटाते हैं।

हाल‍-फिलहाल एक दिन वे शोधतल की तीसरी मंजिल पर बनी कैंटीन में पहाड़ी की ओर मुखातिब चाय पीते देखे गए। उनके इस व्‍यवहार पर साथियों में गहरा मतभेद है। किशन कहता है कि वे जल्‍द ही पहाडि़यों पर चढ़ेंगे और अपनी पामेला एंडरसन के साथ डेढ़ लाख रूपये के नोट लहराते हुए नीचे उतरेंगे। सत्‍तू का मानना है कि वे अब आजन्‍म प्रेम के फेर में न पड़ेंगे। जो भी हो वे जब-जब पहाडि़यों की ओर देखते हैं तो करुणा और कराह उनकी आँखों में बिल्‍कुल साफ झलकती है, मानों पहाड़ी का पूजाघर और हस्‍पताल साक्षात उनकी दोनों आँखों में आकर पास-पास बस गए हों।

समाप्‍त

मुक्तकेशी की प्रेमकथा-भाग 2


शाम होने के साथ वे घर लौट आए। रात को नींद न आयी। नैना से वे पहली बार कब मिले थे, याद करने लगे। नौकरी के बाद आज दूसरी बार उन्‍हें अपने ज्ञान की सार्थकता का एहसास हो रहा था।सुबह बीती और फिर शाम हो गयी।तीन दिन बीते।सप्‍ताह बीत गया।नैना टाकिया का फोन नहीं आया। वे परिसर पहुँचे। साथियों के बीच चलते-फिरते रहे पर निगाहें नैना की ताक में रहीं और कान उसकी आहट सुनने को बेचैन।सूरज ढल गया, वह कहीं न दिखी। वे लौट आए।न जाने कहाँ से ‘चल खुसरो घर आपनो रैन भई चहुँ देस’पंक्तियाँ कौंध उठीं।अब तक वे अपने अहंकार और मर्यादा के चलते नैना को फोन करने से बचते रहे। पर उनकी बेचैनी थी कि बढ़ती ही जा रही थी। उन्‍होंने फोन लगा दिया। आवाज आयी-सर कैसे हैं।

’ठीक हूँ शोध कैसा चल रहा है’मुक्‍तकेशी ने शुभचिंतक की तरह बात शुरू की

’आपकी बतायी बुक्‍स पढ़ रही हूँ और आपसे मिलना भी है सर’

‘चलो ठीक है आ जाना और पहले फोन कर लेना’

’जी सर मैं मिलती हूँ ‘

’ओ के’

इस संक्षिप्‍त बातचीत से वे संदेश देना चाहते थे कि वे बड़े व्‍यस्‍त हैं परंतु अपने खास लोगों के लिए थोड़ा सा समय निकाल सकते हैं।

मुक्‍तकेशी की परिसर में रोज आमद रहती। निगाहें नैना की छवि ढूढते और कान उसकी आहट का इंतजार। कई दिन फिर बीत गए। मुक्‍तकेशी का ध्‍यान अब पहाड़ी पर जाता ही नहीं था। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि वे उस जगह को लगभग भूल ही गए थे।एक दिन वे शाम की चाय पी रहे थे अपने साथियों के बीच। फोन की घंटी बजी। स्‍क्रीन पर नाम जगमगा रहा था-नैना टाकिया। वे थोड़ा दूर हटे और मधुरता से बोले-‘ हेल्‍लो नैना, कैसी हो’

‘मैं ठीक हूँ सर, कल थेाड़ा समय चाहिए आपका’नैना ने काम की बात की।

’सुबह तो व्‍यस्‍त हूँ, दोपहर दो बजे आ सकती हो ’ मुक्‍तकेशी ने अपने महत्‍व को अपनी व्‍यस्‍तता के जरिए दिखाने की कोशिश की।

’तो फिर मैं कल मिलती हूँ आपसे’

‘बॉय सर’

‘बॉय’

मुक्‍तकेशी अपने दोस्‍तों के पास आए और अपनी आधी पड़ी चाय को खत्‍म करने लगे।चाय में मिठास बढ़ गयी थी। उन्‍होंने अपने दोस्‍तों पर एक नजर दौड़ायी। ज्‍यादातर नाकरी पाने की जद्दोजहद में थे फिर प्रेम की परिकल्‍पना तो उनसे कोसों दूर थीं। दोस्‍तों के मुरझाए चेहरे को देख उन्‍हें अजीब सा आनंद मिला। वे सोच रहे थे नैना से बात बनी तो इन सबको सरप्राइज दूँगा और उन्‍हें इस बात को पूरा भरोसा था कि मेरे इस सरप्राइज से ये मेरे दोस्‍त घनघोर दुखी होंगे। परपीड़ा में आनंद तलाशते वे घर लौट रहे थे। नैना टाकिया का शोध विषय ‘मछली मरी हुई-एक अध्‍ययन’ पर उनका चिंतन केंद्रित हो गया। नैना के वे शब्‍द कि-‘सर विषय तो मेरा है पर इस पर सोचा गहराई से आपने है’रह-रह कर बुलबुले की तरह उनके जहन में खदबदाता और उन्‍हें इस विषय पर सोचने की प्रेरणा, चाह और अभिमान पैदा करते।

सारा शहर सो रहा था।सड़क पर हैलोजन लाइट का विशाल स्‍तंभ चुपचाप रोशनी विखेर रहा था। अनेक प्रकार के कीट उस रोशनी में मडरा र‍हे थे। पेड़ों की दूर तक चली गयीं कतारें पंक्तिबद्ध प्रार्थना में खड़े स्‍थविरों के समान लग रहीं थीं। मुक्तकेशी ने घड़ी देखी रात के दो बज रहे थै। बारह घंटे और-सहसा उन्‍हें कल का इंतजार भारी लगा। वे काफी पढ़ चुके थे और बातचीत के लिए तैयार थे। इतनी मेहनत से उन्‍होंने अपने नौकरी के इंटरव्‍यू के लिए भी न पढ़ा था। रात के अंधेरे में नैना का चेहरा घूम गया और उसको स‍मर्पित पंक्तियाँ उभरने लगीं। उन्‍होंने कलमबद्ध करना आरंभ कर दिया-

शहर की

तपती धूप में

उबलती हवाओं से जूझता

एक आशियाने की तलाश में

जब पहुँचता हूँ तुम्‍हारे पास

अपनी केशराशि की सघन छाँव

देती हो विखेर

मेरे मुरझाए मुखमंडल पर

तपन मेरी कुछ कम हो जाती है

जब सूरज

उड़ा जा रहा होता है अपने सातों घोड़ों के साथ

धरती नदिया लहरें

तालाब और जंगल

मरुस्‍थल

पेड़ और परिंदे

सब हो जाते हैं श्रम बिंदुओं से सराबोर

तुम्‍हारी वाणी

स्रोतस्‍विनी बन जाती है-शीतलता देती हुई

जब पहुँचता हूँ तुम्‍हारे पास।

जब पहुँचता हूँ

पास तुम्‍हारे

प्‍यास उभरी होती है मेरे होंठों पर

आत्‍मा के पटल पर

ठंडे पानी का पारदर्शी ग्‍लास रख देती हो सम्‍मुख मेरे

अपनी मुस्‍कान के साथ

भरी शरारती आँखों से

परोस देती हो तुम-सर्वस्‍व अपना

बुझ जाती है प्‍यास

होंठों की

पर

आत्‍मा रह जाती है अतृप्‍त

एक बार पुन: खींच लेता है तुम्‍हारा आकर्षण

मुझे।

मुक्‍तकेशी को लगा आज उन्‍होंने वाल्‍मीकि को टक्‍कर दे दी है। आखिर उनकी यह कविता भी तो विरह-वेदना से ही फूटी है।

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मुक्तकेशी की प्रेमकथा


युवा प्रो0 मुक्‍तकेशी को जब स्‍थायी नौकरी मिल गयी तो उन्‍होने मान लिया कि दुनिया उन‍के ज्ञान का लोहा मानती है। अपने साक्षात्‍कार के दौरान उन्‍होंने सवालों के जववाब में एैसी दलीलें दी थीं कि उससे विशेषज्ञ समिति को उनकी नियुक्‍त्‍िा करना एक मजबूरी बन गयी। लेकिन इस बात को सिर्फ वे मानते थे। बाकी लोग कहते थे कि यदि उनके पी0एच0डी0 सुपरवाइजर नियुक्ति-समिति में बतौर एक्‍सपर्ट नहीं होते तो इनका ज्ञान, दलीलें और नजीरें सब कूड़ेदान की तरह किसी कोने में पड़े रहते और ये खुद भी।

खैर, अब वे विश्‍वविद्यालय की पहाडि़यों के नीचे बने कला संकाय में निश्चिंत विचरण करते हैं और फुर्सत के क्षणों में पहाड़ी के ऊपर बड़ी मार्मिक दृष्टि से से नजरें दौड़ा लेते हैं। उस पहाड़ी पर एक पूजाघर और एक हॉस्पिटल आसपास बने हैं। दर्द और दुआ का कार्यव्‍यापार वहाँ साथ-साथ चलता रहता है। यही बात मुक्‍तकेशी को आकर्षित करती होगी, ऐसा उनके दोस्‍तों का अनुमान था। लेकिन, एक दिन अनायास उनके मुँह से इसका भेद खुल गया। वे कहते नजर आए कि ‘ऊपर पहाडि़यों पर जो पूजा घर है उसकी तरफ से एक ऑफर है। वह यह कि यदि उनकी परंपरा में दीक्षित हो जाओ तो डेढ़ लाख रूपया और एक सुन्‍दर कन्‍या विवाह के लिए मुहैया करायी जाएगी। अपने गुरू की ही तरह मुक्‍तकेशी बाजार की वैल्‍यू समझते थे और डेढ़ लाख रूपया ज्‍यादा न होने के बावजूद एक छुटके पुरस्‍कार से कहीं अधिक था इसलिए वे इस प्रस्‍ताव पर शिद्दत से सोचते रहते। और यही कारण था कि पहाड़ी की ओर उनका ध्‍यान बरबस चला जाया करता था। एक बात और भी थी कि इस प्रस्‍ताव में सुन्‍दर कन्‍या के अनेक बिंब उनके मस्‍तिष्‍क में नाचते रहते। कभी-कभी यह कन्‍या अपने विदेशी स्‍वरूप में भी उभर आती और पामेला एंडरसन, शकीरा या केट विंसलेट कोई भी रूप धारण कर लेती। पर वे बौद्धिक थे और मुक्तिबोध की कविता से प्रभावित भी इसलिए खुद को ही तमाचा मारते और शिल्‍पा शेट्टी, ऐश्‍वर्या और तब्‍बू पर आ टिकते। यह सौदा भी उन्‍हें बुरा न लगता और इसके कारण बेचैनी और अनिद्रा उनके जीवन के साथ-साथ चलने लगे।

मुक्‍तकेशी खुद को कुजात कम्‍यूनिस्‍ट कहते थे इसलिए धर्म में उनकी कोई खास आस्‍था नहीं थी। वे धन और कन्‍या के लिए कोई भी धर्म अपना सकते थे।वे उधेड़बुन में रहते और सोचते कि एक दिन वे इन पहाडि़यों पर जरूर चढ़ेंगे और जीवन में नौकरी के बाद गृहस्‍थी का दूसरा अध्‍याय भी समाप्‍त कर देंगे।

अक्‍टूबर का आखिरी सप्‍ताह था। धूप गुनगुनी हो चली थी। मुक्‍तकेशी विश्‍वविद्यालय में राज की तरह ही अपने साथियों के साथ घूम रहे थे। तीसरे पहर अचानक बादलों का रेला आ गया। पूरे परिसर में अंधेरा छा गया। तूफानी बारिश शुरू हो गयी थी और मुक्‍तकेशी का पास ही बने कैफेटेरिया में कॉफी की चुस्‍की लेने का मन हो आया। उन्‍हों ने एक स्‍ट्रांग कॉफी आर्डर की और एक खाली टेबल पर आ जमें। उन्‍होंने कोशिश की कि पहाड़ी पर बना पूजागृह दिख जाय पर वह नहीं दिखा। उन्‍होंने कुर्सी को थोड़ा घुमाया भी पर असफल रहे। अब संतोष कर लेने और कॉफी के स्‍वाद में खुद को रमा लेने के सिवा उनके पास विकल्‍प ही क्‍या था। उनकी कॉफी आ गयी थी। वे अकेले थे और इसका पूरा लाभ उठाना चाहते थे। ऐसे ही एकांत क्षणों में उनका दिमाग सक्रिय होता और वे सर्वथा नए विचारों और विजन को जन्‍म देते। अभी वे विचारों की प्रसव पीड़ा से गुजर ही रहे थे कि सामने खाली पड़ी कुर्सी पर कॉफी के साथ शोधार्थी नैना टाकिया आ बैठी। उसने हेलेा कहा और मुक्‍तकेशी का ध्‍यान चिंतन और पहाडि़यों से उतरकर जमीन पर आ टिका। उन्‍होंने भी हेलो कहकर प्रतिउत्‍तर दिया। नैना ने मुक्‍तकेशी को थेाड़ा असहज पाया और शिष्‍टतावश पूछा-‘सर, मैने आपको डिस्‍टर्ब तो नहीं कर दिया।‘ मुक्‍तकेशी ने नैना को अब ठीक से देखा अपनी नीली टी-शर्ट में वह कतल लग रही थी। ‘कतल’ द किलर, बेपनाह सौन्‍दर्य की अभिव्‍यक्ति के लिए यह उनका पसंदीदा शब्‍द था। वे तसल्‍लीबख्‍स मुस्‍कराए और कहा- ‘नहीं, बिल्‍कुल नहीं।‘ साहित्‍य और समाज पर चर्चा शुरू हो गयी। मुक्‍तकेशी अपनी कॉफी ऐसे पीते मानो वे इलाहाबाद के कॉफी हाउस में बैठे कोई प्रख्‍यात साहित्‍यकार हों। वे बोलते रहे और जिज्ञासु भाव से सुनती रही।इस जिज्ञासा को वे नैना की ऑखों में पढ़ते और तृप्‍त होते चलते। उनकी मुद्रा ज्ञान के गुरूर से डबडबाई नजर आ रही थी। बाहर बारिश थम गयी थी। नैना चलने को हुई तो उसने कहा-‘ सर अपना मोबाइल नं0 दे दीजिए, जरूरत पडेगी तो इस मुद्दे पर आप से आगे भी बात करूँगी। विषय तो मेरा है पर गहराई से सोचा आपने है। मुक्‍तकेशी ने एक उदार विद्वान की तरह अपना नं0 दे दिया और नैना का नम्‍बर भी सेव कर लिया। वे विषय की गहराई के साथ नैना की समंदर सी गहरी आँखों में भी डूब गए थे

--------आगे भी जारी

21 अक्टूबर, 2010

मीडिया परिदृश्य : प्रेमचन्द और उनके बाद

इस विषय पर सोचते हुए मुझे लगा कि केवल कालक्रम से प्रेमचन्द परवर्ती पत्रकारिता के कुछ पत्र – पत्रिकाओं का उल्लेख और विश्लेषण ही समीचीन न होगा वरन् उन बिन्दुओं को छूना ज्यादा कारगर हो सकता है जो प्रेमचन्द और उनकी परवर्ती पत्रकारिता का रूपाकार, चुनौतियाँ संघर्ष के मसले और दबावों को जानने में मददगार सिद्ध हो सकते हैं. इसलिए यह आलेख दोनों दिशाओं (प्रेमचन्द और परवर्ती युग) में आवाजाही करता रहेगा. अपनी बात मैं रॉबिन जेफ्री के एक उद्धरण से शुरू कर रहा हूँ जो आंध्र प्रदेश से निकलने वाली तेलगु पत्रिका ‘स्वाति’ का सन्दर्भ लिए हुए है. रॉबिन जेफ्री जब आन्ध्र प्रदेश के कोडप्पा रेलवे स्टेशन पर पहुँचे तो एक पुलिस वाला ‘स्वाति’ के पुराने अंक को मुँह ढके सो रहा था. जब वह उठा तो जेफ्री ने बातचीत का सिलसिला शुरू किया. पुलिस वाले ने कहा –

अखबारों ने पुलिस का काम मुश्किल कर दिया है, क्यों के जवाब में वह कहता है कि - एक समय था जब कोई पुलिसवाला किसी गाँव में जाता था तो लोग थर्रा उठते थे. अब तो छह पुलिस वाले भी गाँव में चले जाएँ तो उनसे कोई भी नहीं डरता. अखबारों ने उन्हें यह अहसास करा दिया है कि पुलिसवालों को उन्हें मारने का कोई हक नहीं. क्योंकि वह मानता था निस्सन्देह मारपीट ही तो अंतिम उपाय है.

(रॉबिन जेफ्री, भारत की समाचार पत्र क्रांति, भारतीय जनसंचार संस्थान, पृ. 2).

अब एक दूसरा उद्धरण –

... सन् 47 के पहले की पत्रकारिता जिस तरह सामाजिक सुधार, आधुनिकीकरण, स्वाधीनता आन्दोलन, राष्ट्रीय एकता और साधारण किसान – मजदूर वर्ग के हितों की लड़ाई का अंग बनी, उसने अपने स्वतंत्रता के संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी लगातार विस्तृत किया, ’47 के बाद की पत्रकारिता, उस तरह का अपना कोई इतिहास खड़ा न कर सकी. वह क्षणजीवी हो गयी. नए दौर में उसके स्वतंत्रता के संघर्ष के पीछे न कोई व्यापक ऎतिहासिक चेतना है न किसी तरह की उत्सर्ग भावना.

शंभुनाथ, आलोचना, अप्रैल – जून 1987, पृ. 37

खबरों की कबड्डी रोज दिखती है. खबर में से खबर, महाखबर या फिर महान खबर कैसे निकाली – बनायी पकाई जाय, इसके लिए दिमागी दंगल होते हैं. लेकिन मीडिया का काम सिर्फ सूचना देना, शिक्षित करना या मनोरंजन की थाल मेज पर सजा देना भर नहीं है. वह दौड़ रहा है. दौड़ते हुए पीछे मुड़-मुड़कर देख भी रहा है कि पीछे वाला कहीं आगे तो नहीं निकल रहा. यह दौड़ टीआरपी की है. यहाँ मुट्ठी भर दर्शक हर शुक्रवार फैसला सुनाता है कि उसे क्या भाया, क्या नहीं;

- वर्तिका नन्दा, टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग, राजकमल प्रकाशन , 2010

रॉबिन जेफ्री , शंभुनाथ और वर्तिका नन्दा के उपरोक्त कथन मीडिया में आए विभिन्न पड़ावों के संकेतक हैं. लेकिन , इससे भी ज्यादा ये कथन मीडिया के प्रति हमारे नजरिए, सोच और संबोधन को रेखांकित करते हैं.

वर्तिका नन्दा का कथन जेफ्री की नागरिक सशक्तिकरण को मीडिया की भूमिका से आगे बढ़ता है और दिखाता है कि मीडिया की लीला भूमि उसका प्लेग्राउंड क्या है. प्रेमचन्द के उपन्यास ‘रंगभूमि’ का नायक सूरदास दुनियावी गतिविधियों को ‘खेल’ की संज्ञा देता है और जीवन की जय – पराजय को क्रीड़ा के एक परिणाम की तरह स्वीकारने पर जोर देता है. वर्तिका नन्दा भी मीडिया को एक खेल में शामिल मानती हैं जहाँ टीआरपी के तय शुदा ट्रैक पर दौड़ना होता है. समाज सुधार, स्वाधीनता के मूल्य, राष्ट्रीय एकता किस मजदूरे हितों की लड़ाई के बरक्स अपराध, सेक्स , क्रिकेट , फिल्म , धर्म और राजनीति की केन्द्रीयता आज के मीडिया का मुख्य सरोकार बन उठा है. मीडिया संवेदना का निर्माण नहीं अपितु हर गम्भीर मुद्दे को खेल की तरह एक फिल्मी दृश्य की तरह प्रस्तुत करने की दिशा में उद्धत है. इस बदलते परिदृश्य को जानना जरूरी है।

रॉबिन जेफ्री और शंभुनाथ के ये विचार प्रेमचन्द परवर्ती पत्रकारिता पर लगभग विरोधी एवं वास्तविक टिप्पणियाँ हैं. रॉबिन जेफ्री जहाँ समकालीन पत्रकारिता को शोषण से मुक्ति का औजार बता रहे हैं जिसमें पुलिस और प्रशासन – तंत्र की मनमर्जी पर अंकुश लगा है, वहीं, शंभुनाथ जी को आज की पत्रकारिता, ‘क्षणजीवी’, ‘ऎतिहासिक चेतना’ शून्य और ‘उत्सर्ग भावना’ दिखाई देती है. इन्हीं विरोधी सोचों एवं मूल्याकंन – स्थितियों के बीच मैं अपना विचार – सूत्र प्रस्तावित करना चाहता हूँ जिससे प्रेमचन्द और उनकी परवर्ती पत्रकारिता से संश्लिष्ट बिन्दुओं को समझा जा सके.

उपरोक्त दोनों विद्वानों की टिप्पणियाँ विरोधी होते हुए भी उनमें अपने-अपने ढंग से सत्य की आँच छिपी हुई है. शंभुनाथ जी को प्रेमचन्द परवर्ती पत्रकारिता के प्रति बनी समझ बौद्धिक – अकादमिक नजरिए का प्रतिफल है और रॉबिन जेफ्री सर्वेक्षक की तरह तथ्यों को ढूँढ़्ते, आँकड़ों का विश्लेषण करते तथा लोक अनुभव को संचित करते अपने निष्कर्ष पर पहुँचते है. शंभुनाथ जी हिन्दी पत्रकारिता पर विचार करते हुए एक ‘इंसाइडर’ की तरह सोचते हैं और रॉबिन जेफ्री भारतीय समाचारपत्रों पर विचार, बिल्कुल ‘आउटसाइडर’ की तरह करते हैं. हिन्दी पत्रकारिता को ‘महत परंपरा’ और स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान की बंदिशों का प्रतिवाद, साम्राज्यवादी ताकतों के विरूद्ध उसका संघर्ष , सामाजिक – राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति उसका तेवर और भंगिमा – जिसमें भाषाई भंगिमा भी शामिल है – ‘इनसाइडर’ होने के नाते शंभुनाथ की चिंता और सरोकार इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर रॉबिन जेफ्री के सामने एक ‘लघु परम्परा’ मौजूद है जिसमें लोकल समाचार – पत्र और स्थानीयता केन्द्र में है. वरन् भारत की अन्य भाषाई पत्रकारिता भी. ‘राष्ट्रभाषा’ हिन्दी के दायित्व और जिम्मेदारियाँ भी बड़ी है, राष्ट्रीय है, अन्य भाषाएँ तो इनसे मुक्त भी हो सकती है – वे स्थानीय किस्म की जवाबदेही का भार उठाएँ यही बहुत है. इसीलिए, प्रेमचन्द परवर्ती पत्रकारिता पर मंथन करते हुए शंभुनाथ जी का रोमानी, आवेगधर्मी होना स्वाभाविक है – (उनके शब्दों ‘क्षणजीवी’. ‘ऎतिहासिक चेतना’ और ‘उत्सर्ग भावना’ हित पर ध्यान दीजिए) रॉबिन जेफ्री चाहकर भी ऎसा न कर सकते थे. जेफ्री के लिए भारतीय भाक्षाई प्रेस के इस विस्फोटक युग में विज्ञापन , पूँजी प्रोद्योगिकी की भूमिका का विश्लेषण और भारतीय समाचार पत्रों के स्वामित्व, पत्रकारों की भर्ती और उनकी आजीविका, प्रेस को नियंत्रित करने वाली शक्तियों के संदर्भ में न केवल बौद्धिक- अकादमिक बहस चलाना था वरन् उनका तथ्य परक वैज्ञानिक अध्ययन करते हुए एक ठोस निष्कर्ष तक पहुँचाना था. हाँ. ऎसा करते हुए उन्होंने लोकसंवेदना को भी उतनी ही तवज्जों दी है जितनी कि अन्य अवयवों को. समकालीन परिदृश्य में हम प्रेमचन्द और परवर्ती पत्रकारिता पर उपरोक्त दोनों ढ़ंग से सोच सकते हैं- एक इनसाइडर – बौद्धिक उत्सर्ग भावना की तलाश करते हुए और एक आउटसाइडर – वैज्ञानिक, तथ्यपरक, प्रोफेशनल और लोक प्रभावों का मूल्यांकन करते हुए. मैं खुद को जेफ्री के अधिक करीब पाता हूँ, इसलिए प्रेमचन्द और परवर्ती पत्रकारिता के संदर्भ में मेरी स्थापनाएँ आउटसाइडर की तरह होगी. जो प्रेमचन्द के भक्तों के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं लेकिन , उनके अध्येयता और आलोचक से एक तार्किक संवाद और बहस कायम करें. आखिरकार , कोई भी स्थापना अंतिम नहीं होती.

कहा जाता है कि प्रेमचन्द फिल्म नगरी के जमने गए थे, लेकिन, वहाँ उनका मन नहीं लगा वे वापस लौट आए. मेरे मन में प्रश्न उठता है यदि प्रेमचन्द आज होते तो पत्रकारिता करते या नहीं? इस पेशे से उनका तालमेल कैसे बैठता? सन् ’30 के ‘विशाल भारत’ में उनकी एक घोषणा इस सिलसिले में द्रष्टव्य है. उन्होंने लिखा था – मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं. इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता संग्राम में सफल हो. मैं दौलत और शोहरत का इच्छुक नहीं हूँ.खाने को मिल जाता है. मोटर और बंगले की मुझे हविस नहीं है. हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो- चार उच्च कोटि की रचनाएँ छोड़ जाऊँ; लेकिन उनका उद्देश्य भी स्वतत्रता प्राप्ति ही हो. (प्रेमचन्द और उनका युग, रामविलास शर्मा, पृ0 122 पर पुनरउद्धत ) अपने वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालिए – खासतौर से पत्रकारिता जगत के – दौलत , शोहरत की कामना से रहित और मोटर व बंगले की हविस न रखने वाले कितने पत्रकार – विख्यात या स्ट्रिंगर – आपके ज़ेहन में आते हैं’ तो मैं अपना प्रश्न दोहरा सकता हूँ कि प्रेमचद्न आज पत्रकारिता करते या नहीं? इस पर सोचिए . प्रेमचन्द ने अपने उपरोक्त वक्तव्य में अपनी अभिलाषाओं को ‘बहुत सीमित’ और ‘सबसे बड़ी’ कहा है. यह सीमित और बड़ी अभिलाषा है स्वाधीनता प्राप्ति. हम अपने आज के समय को असीमित और छोटी, क्षुद्र अभिलाषाओं का समय कह सकते है. हमारा युग सूचना के विस्फोट का ही युग नहीं वरन् हमारी अभिलाषाओं के विस्फोट का भी युग है. तो क्या प्रेमचन्द पत्रकारिता के सबसे प्रभावशील क्षेत्र को अस्पृश्य मानकर अपनी साहित्यिक दुनिया में वैसे ही लौट जाते जैसे वे फिल्म नगरी को छोड़कर आ गए थे. अगर वे ऎसा करते तो सबसे अनर्थकारी बात होती और शायद, प्रेमचंद ऎसा करते भी नहीं. तब वे पत्रकारिता जरूर कर रहे होते पर वैसी नहीं जैसी ‘हंस’, ‘जागरण’ और ‘माधुरी’ में दिखाई देती है. उनके ऊपर पूँजी, विज्ञापन, तकनीक और भूमंडलीकरण से उपजी शक्तियों के अनंत दबाव होते. फिर भी, इनके बीच ही, वे जनता और अवाम की लड़ाई को अंजाम दे रहे प्रशासन और पुलिस की धौंसपट्टी का प्रखर विरोध कर रहे होते और सरकारी – तंत्र उनसे वैसे ही दु:खी होता जैसे रॉबिन जेफ्री का मुलकाती पुलिस वाला और संग्राम में उनकी सहायता पूँजी भी करती, विज्ञापन और तकनीक भी और संभवत: भूमंडलीकरण से पैदा हुई नवीन ऊर्जा भी.

प्रेमचन्द का युग सीधी मुठभेड़ों का युग था. सत्य , असत्य , नैतिक , अनैतिक , मूल्य और मूल्यहीनता की कसौटियाँ बिल्कुल साफ – सी थीं. इस संघर्ष में शहादत वांछनीय स्थिति थी जैसे मध्ययुग में आत्मा का परमात्मा में विगलन. सूरदास (रंगभूमि) उस युग का केन्द्रीय पात्र है. साम्राज्यवाद और प्रथानुगामी शक्तियाँ तथा उनके प्रतिरोधी स्वर साफ थे. अब स्थिति वैसी नहीं है. साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिक शक्तियाँ ‘प्लास्टिक सर्जरी’ करा कर मानवतावादी और साधु वेश के मुखौटे में उपस्थित हुई हैं. इसलिए प्रेमचंदकालीन पत्रकारिता के टूल आज के संघर्षों के लिए भोंथरे ही साबित होते. इसलिए पत्रकारों को नए औजार तलाशने पड़े हैं. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है, जो अचानक अपने विद्यार्थियों के प्रश्नों को सुलझाते हुए मेरे दिमाग में आया. जार्ज बुश की वर्तमान भारत यात्रा में महत्वपूर्ण समझौते होते रहे, अंतर्राष्टीय महत्त्व की बैठके भी. मीडिया ने इनकी खूब चर्चा की . आम जनता के लिए इन समझौतों / बैठकों/ सन्धियों का मतलब लगा पाना कठिन था. देश की वामपंथी पार्टियों ने दोनों देशों की सरकारों से इनके स्प्ष्टीकरण की माँग की . भारत के सिलसिले में अमेरिकी घोषणाएँ अक्सर छ्लपूर्ण होती हैं. इसे देश का बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनेता और आम आदमी सब जानते – महसूसते हैं. इसलिए ‘महत्वपूर्ण गतिविधियों’ के समानांतर एक दूसरी खबर भी मीडिया लगातार चलाता रहा वह थी

बुश साहब के कुत्तों की. कुत्तों की खबरों बॉक्स में छपती रही. बुश की इस यात्रा के दौरान मैंने अपने पड़ोस, विद्यार्थियों और शिक्षक साथियों के बीच महत्त्वपूर्ण संधियों की चर्चा कम और उनके कुत्तों से संबंधित चर्चा अधिक सुनी. भारतीय मीडिया ने बुश की यात्रा की ‘सीरियसनेस’ और ‘इम्पॉर्टेस’ को अपनी दूसरी खबर से ‘डायलूट’ कर दिया. मीडिया का यह तरीका बुश साहब की छवि एवं उनके महिमा मंडन में जुटी सरकार मशीनरी पर कालिख पोतने जैसा है. दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति की चर्चा उतनी भी न हुई जितनी उसके कुत्तों की . आज की पत्रकारिता ने अपने औजार ज्यादा पैने बनाए हैं – शहादत की उसके लिए एकमात्र विकल्प नहीं बचा है. बुश सरकार हैदराबाद भी आए थे. हल वैगरह उठाते उनकी छवियाँ दिखी थी लेकिन उनके कुत्तों की चर्चा यहाँ भी थी या नहीं, अगर आपमें से कोई बताए तो मैं उसका आभारी रहूँगा. अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए में अपने एक पत्रकार मित्र का हवाला देना चाहूँगा. अयोध्या चलने का आहवान करने वाली एक जनसभ हो रही थी. मेरे मित्र चाहते थे कि अखबार में इनकी रिपोर्टिग न हो लेकिन मालिकों तथा संपादक का दबाव था पूरी कवरेज का. मित्र को चार कॉलम में खबर छापने का निर्देश हुआ. इस खबर को कैसे डायलूट किया जाए इसका नायाब तरीका उन्होंने ढूँढ़ निकाला. खबर के ठीक बीचों-बीच उन्होंने ‘बॉक्स’ में ‘हनुमान भी पीछे नहीं’ की खबर शीर्षकों से छाप दी. इस पूरी खबर का हश्र यह हुआ कि नेताओं के वक्तव्य, आहवान की गम्भीरता जनसभा का औचित्य खबर में धूमिल हो गया और बन्दरों की खबर मुख्य स्थान पर आ चर्चा का विषय बन गयी. मालिक भी प्रसन्न थे. नेता भी और हमारे पत्रकार मित्र थी. कुछ ऎसी ही उक्तियों, और मीडिया कौशल के साथ प्रेमचन्द परवर्ती पत्रकारिता में उत्सर्ग भावना के बिना भी अनेक दबावों के मध्य जनसंघर्षों को जारी रखने का गुर हासिल कर लिया है.

प्रेमचन्द और गाँधी युग गद्य भाषा की शक्ति के विकास का युग था. वह भाषा जिसकी तलाश भारतेन्दु ने शुरू की थी वह प्रेमचन्द के यहाँ अपने प्रांजल रूप में उपस्थित होती है. प्रेमचन्द युगीन पत्रकारिता अपनी संचारात्मक क्षमता के लिए साहित्य पर आश्रित है. इसलिए उस युग की पत्रकारिता साहित्यिक पत्रकारिता ही प्रथमत: है और अन्य विषय – राजनीति, समाज चिंतन, अर्थशास्त्र, इतिहास इत्यादि आदि को भी साहित्यिक शिल्प में ही ढलना पड़ता है. परवर्ती पत्रकारिता में दो दिशाएँ बिल्कुल साफ दिखाई देती हैं – (क) साहित्यिक पत्रकारिता (ख) गैर साहित्यिक पत्रकारिता. साहित्यिक पत्रकारिता – जो प्रेमचंददीय परम्परा का विस्तार थी – बौद्धिक, विद्वानों, विचारकों और विश्वविद्यालयों तक सीमित हो गयी, उसमें अभी भी मिशनरी अनुगूँजे मौजूद हैं. उसमें उठाए गए मुद्दे और विचार अभी, भी दीर्घजीवी है लेकिन भ्रष्टाचार से लड़ने, मूलभूत सुविधाओं – बिजली, पानी, सड़क – की उपलब्धता सुनिश्चित करने, राजनीति और साम्प्रदायिकता पर अंकुश रखने, उपभोक्ता के हितों का संरक्षण करने, अवाम को स्वस्थ रहने की तजवीने बताने, और जनसामान्य की चेतना को निर्मित करने में इनकी भूमिका नगण्य है. इस दिशा में व्यवसायिक और गैर साहित्यिक पत्रकारिता ही सक्रिय है. प्रेमचन्द ने अपनी पत्रकारिता में वे सभी मुद्दे उठाए थे जो आज की व्यवसायिक पत्रकारिता कर रही है. मेरा अपना अनुमान है कि वे आज के ‘हंस’ साथ जुड़ने के बजाए स्व. राजेन्द्र माथुर की तरह ‘नवभारत टाइम्स’, प्रभाष जोशी की तरह ‘जनसत्ता’ या मृणाल पाण्डे की तरह ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ और चाहे तो कह सकते है कि नामवर जी की तरह ‘राष्ट्रीय सहारा’ से समबद्ध होना अधिक पसंद करते. ये सभी साहित्यधर्मी लोग हैं जो गैर साहित्यिक पत्रकारिता से जुड़े हैं. अपनी संचारात्मक क्षमता के चलते व्यवसायिक पत्रकारिता का वर्चस्व और वैभव समाज में स्थापित हुआ है. यह संचारात्मक क्षमता उसे केवल विचारों से अर्जित नहीं होती वरन् विज्ञापन, पूँजी, तकनीक और बाजारवादी शक्तियाँ उसका पोषण करती हैं. परिवर्तन की तीव्रगति से गुजरते राष्ट्रों, समाजों और मनुष्यों के लिए आज के समय में ‘दीर्घजीविता’ एक अवमूल्य है – आलस्य, अकर्मठता और सुस्ती का प्रतीक तथा ‘क्षणजीवी’ होना एक बड़ा मूल्य – स्मार्ट, एलर्ट और डायनेमिक होनी की निशानी. शंभुनाथ जी की मान्यता के बिल्कुल उलट जहाँ वे क्षणजीवी होनी को एक आरोप की तरह मढ़ते है. इस अर्थ में समसामयिक व्यवसायिक पत्रकारिता समाज के साथ अपनी रफ्तार बनाए हुए है और खुद को बचाए हुए भी. आप देखें तो पाएँगें कि एक मिनट में पूरी दुनिया में लगभग एक अरब खबरें निकलती हैं. इस तीव्रता से हमारा मर थर्रा उठता है लेकिन इससे बच पाना मुश्किल है.

पहले विचार और सूचनाएँ अखबारों के माध्यम से विभिन्न अवरोधों – अशिक्षा, आर्थिक और भौगोलिक – के चलते देरी से आम जनता तक पहुँचते थे. आज इन तीनों अवरोधों में कमी आयी है इसलिए अखबारों की पहुँच और प्रभाव में तेजी आयी है. अखबारों और पत्रकारिता के समक्ष नयी चुनौतियाँ भी पैदा हुई हैं जो प्रेमचन्द के समय न थी. उन्हें रेडियों, टेलीविजन, इंटरनेट से भी मुकाबला करना है. सूचनात्मक प्रसार में देरी समाचार पत्रों को बासी बना देती है. इसलिए उन्हें अपने वेब संस्करण निकालने पड़ रहे हैं. आज की पत्रकारिता के समक्ष सर्वथा नयी चुनौतियाँ है. तकनीकी विकास ने ही यह चुनौतियाँ उपस्थित की हैं तो तकनीक ही इनके निराकरण के लिए आगे आयी.

तुलसीदास को आज अपना मानस – प्रवचन किसी घाट पर करने के बजाय टी. वी. चैनल पर करना पड़ता, अन्यथा उनकी लोकप्रियता संदिग्ध होती और वे एक गुमशुदा संत भर बनकर रह जाते. पुस्तकों और अखबारों को बहुमूल्य विचारों से लैस करके पुराने छापेखाने से निकालिए उन्हें कोई न पढ़ेगा . प्रेमचन्द के बाद कथ्य और प्रस्तुति के संतुलन ने पत्रकारिता को नया आयाम प्रदान किया है. इस संतुलन के अभाव में समकालीन पत्रकारिता का अस्तित्व संभव नहीं. अपनी मुद्रण प्रणाली, पृष्ठ सज्जा, संपादन और फोटो चयन के सहारे समाचार – पत्रों ने पाठकों की रूचि को परिष्क़ृत और परिभाषित किया है. आप यह मानकर चलें कि पत्र – पत्रिकाओं के लिए केवल अन्य संचार माध्यम रेडियो, टी.वी., इंटरनेट, एस.एम.एस. और फिल्में – ही चुनौती बनकर खड़ी है बल्कि उसकी होड़ पिज्जा खाने, कोक पीने और समूचे पिकनिकी माहौल से है, जिसका अध्धयन एक स्वतंत्र और रोचक विषय है. इस समूचे परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के अस्तित्व और उनके वर्तमान स्वरूप का मूल्यांकन करना चाहिए.

डॉ. रामविलास शर्मा ‘सरस्वती’ और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रशंसा इसलिए करते थे कि उन्होंने कलात्मक साहित्य का ही प्रोत्साहन नहीं किया अपितु ‘ज्ञानकाण्ड’ को भी समृद्ध किया. आज का ज्ञानकाण्ड बहुपरती, विविध, व्यापक और विस्फोटक है . इससे जुड़े रहने और समृद्ध करने की हमारी प्रविधि और तौर तरीके पुराने नहीं हो सकते. 1931 में जब ‘हंस’ का एक साल पूरा हुआ तो प्रेमचन्द ने लिखा – हमें आर्थिक हानि भी हुई, राजनीतिक दण्ड भी भोगना पड़ा . पर हमने हिम्मत न हारी. हमने अपने सामने जो आदर्श रखा है, वह उत्साह बढ़ाते रहने के लिए काफी है. हम घाटे – नफे के कायल नहीं है. घाटे नफे का विचार किए बिना आज भी पत्रकारिता की जा सकती है और हो भी रही है लेकिन इनकी संचारात्मक क्षमता , सामाजिक प्रभाव और पहुँच और जवाबदेह प्रशासन के निर्माण , परिवर्तन में इनकी भूमिका क्या और कैसी होगी इसे सहज ही जाना जा सकता है. प्रेमचंद के बाद पत्रकारिता की यात्रा, साहित्य से व्यवसायिक, विचार से सूचना , दीर्घजीवी से क्षणजीवी , अभाव से वैभव , उत्सर्ग से युक्ति, सुस्ती से त्वरित एवं व्यापक तथा मिशन से मीडिया की दिशा में सक्रिय रही है.

आज भी बहुत सी पत्र- पत्रिकाएँ अपनी सीमित संसाधनों से समसामयिक विचारों के निरूपण में तत्पर हैं. वे राजनीतिक वितंडे से दूर – भुखमरी, सामंती जीवनमूल्यों , बाढ़ – अकाल , शोषण और गरीबी के निराकरण के लिए संघर्षरत हैं. वे प्रेमचंद की विरासत को बचाए हुए हैं लेकिन उन्हें संचारात्मक क्षमता का विकास करना पड़ेगा. तभी वे सामाजिक हस्तेक्षप का स्वर प्रभावशाली ढंग से बुलंद कर सकेगी. हम जानते है यह संतुलन खोज पाना आसान नहीं है इसीलिए संभवत: प्रेमचंद के पत्रकारीय दाय को संभालना तलवार की धार पर धावनो जैसा है. विज्ञापन, पूँजी, तकनीक, बाजारवाद और भूमंडलीयकरण के व्यूह – चक्र में फँसे विश्व के बीच समतामूल समाज का स्वप्न सुरक्षित रख पाने का दाय . भले ही मीडिया आज अपराध , हिंसा और सेक्स की खबरों को तवज्जों देते हुए परोस रहा है उअर टीआरपी के ट्रैक पर सरपट दौड़ने की कोशिश कर रहा है लेकिन जैसा एक जागरूक दर्शक समाज का उदय होगा वह अपनी जबावदेही खुद ब खुद तय करेगा. इस दिशा में लगातार रेगुलेटरी संस्थाओं का स्थापना भी की जा रही है और दर्शक अपने स्व अनुभव से खुद को शिक्षित भी कर रहा है. छोटे – छोटे वृत्तचित्र, मुड़ा आधारित कार्यक्रम आम सवालों को उठा रहे हैं और सरकारी जबावदेही को सुनिश्चित भी कर रहे हैं, माँग और आपूर्ति का समीकरण हमेशा एक जैसा नहीं रहता इसलिए मीडिया के विभिन्न माध्यम प्रेमचंद युगीय आदर्शों से भले ही परिचालित न हों पर उन्हें अपने आदर्श अवश्य ही तलाशनें होंगे.